रेशे रेशे होते आपसी रिश्तों को जोड़ने के लिए कितनी ख़ूबसूरत बात कह गये हफ़ीज़ किदवई

शमशाद रज़ा अंसारी

अपने से अलग धर्म वालों को उनके त्यौहार पर बधाई या मुबारकबाद ज़रूर देनी चाहिए । ख़ासकर उस वक़्त जब दो धर्मों के बीच कटुता के बीज बोने के मौके छोड़े नही जा रहे हों । आम दिनों में आप इस झमेले से बच सकते हैं । जब कटुता को उभारा न जा रहा हो तब तो आप इन कामों को फालतू समझकर छोड़ सकते हैं मगर जब माहौल में मीठापन न हो तो ऐसा करना हमारी ज़िम्मेदारी हो जाती है ।

कुछ लोगों को लगता है यह बधाई वधाई की ड्रामेबाज़ी क्यों,आख़िर हम यह फ़ालतू चीजों में क्यों पड़ें या आख़िर फॉरमैलिटी क्यों करें ,वह समझ लें सुनसान इलाकों में मुश्किल वक़्त में जब आप फँसे हों तो लोगों की आवाज़ें भी सुक़ून देती हैं ।

जो दिन चल रहे हैं, वह आम दिन नही हैं । बीमारी और बीमार सोच वाले सभी इस दौर में हावी हैं, ऐसे लोग सब जगह हैं,सभी धर्मों में हैं । आपका एक बधाई संदेश,वह चाहे कितना ही फॉर्मल हो,हमें उम्मीद देता है कि आपकी नज़र में हम और हमारे त्यौहार की क़द्र है । यह सन्देश बताते हैं कि जब अपने बधाई के लिए फोन उठाया होगा,तो चंद नामों में मेरा नाम भी होगा,जिन्हें आपने यह सन्देश भेजा । मेरे लिए यह बहुत अहमियत का होता है, जब कोई किसी दूसरे धर्म के त्यौहार पर अपनी ज़िंदगी के कुछ पल खर्च करके बधाई देता है,यह पल हमारे होते हैं, यह एहसास हमे जिलाता है ।

लोग सैकड़ों सन्देश भेजें,इससे उकताना नही चाहिए,सबको उत्तर न दे सकें तब भी सार्वजनिक रूप से बधाई और जवाब दिए जा सकते हैं । यह ज़रूर कीजिये अगर आपको ठीक लगता हो,क्योंकि आपकी एक कोशिश किसी को मुस्कुराने की वजह बनेगी ।

जब आपसी मोहब्बत के रेशे रेशे तोड़े जा रहे हों तब ऐसा करना एक एक रेशे को जोड़ने की तरफ एक कदम है । हम हो सकता है त्यौहार न माने,धर्म न माने मगर यह तो मानेंगे की किसी के होंठ पर एक मुस्कान ला सकें ।

हम ईद,बकरीद,होली,दीवाली,क्रिसमस, प्रकाशोत्सव, लोहड़ी वगैरह की मुबारकबाद इसीलिए तो देते हैं कि देखो हम धर्म की उस खिड़की से तुम्हें बधाई भेज रहे हैं, जिसे त्यौहार कहते हैं । किसी की खुशी या उसके सहयोग के कोई भी मौके नही छोड़ने चाहिए ।
कितना अच्छा लगता है जब कोई अपना मज़हब देखे बिना बकरीद की मुबारकबाद भेजता है और कोई रक्षाबंधन की बधाई । यह फॉरमैलिटी नही है, जिन्हें लगता है लगे,यह एक उम्मीद है कि जिसने हमे बधाई दी है, कम से कम मेरे मुश्किल वक़्त में मेरा धर्म देखकर यह साथ तो नही छोड़ेगा ।

शासक या जिसको नेतृत्व करना है, उसे तो अपनी जनता को हमेशा त्यौहारों पर बधाई देनी चाहिए,इससे उसके हृदय की विशालता और सबपर छाँव का एहसास होता है । जो शासक इससे घबराता या कतराता है या अपने से अलग धर्म के त्यौहार पर बधाई भी नही देता,वह कागज़ी शासक ज़रूर हो सकता है मगर वास्तविक नही हो सकता,जिस दिल से मुबारकबाद भी न निकल सके, सोचिए वह हृदय कितना दरिद्र होगा ।

आप सबसे अनुरोध है, जब तक सामान्य दिन न आ जाएं या जबतक नफ़रत कमज़ोर न हो जाएं,आपस मे एक दूसरे को त्यौहार पर खूब बधाई दें बिना उत्तर पाने की लालसा लिए,क्योंकि आपको यह गैर जरूरी या फालतू लग सकता है मगर हमे नही,उकताइये नही बल्कि जिंदादिल बनिये,दिल खोलकर मुबारकबाद दीजिये और लीजिये,क्योंकि वह बेहद तरस खाए जाने लायक लोग हैं,जिन्हें कोई मुबारकबाद भी देने वाला नही ।
आप सबको 1 अगस्त की बकरीद और 3 अगस्त के रक्षाबंधन की अग्रिम बधाई।