विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष लेख: उद्योगों में पर्यावरण प्रबंधन

हम सभी विश्व पर्यावरण दिवस के बारे में अच्छी तरह जानते हैं लेकिन हमें इस दिन को मनाने के उद्देश्यों के बारे में भी पता होना चाहिए। इसका उद्देश्य लोगों को पर्यावरण की रक्षा करने और जागरूकता पैदा करने के लिए प्रेरित करना है।

इस लेख में विशेष रुप से उद्योगों में पर्यावरण प्रबंधन के बारे में चर्चा होगी।

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प्रदूषण विश्व स्तर पर स्तर पर आज का ज्वलंत मुद्दा है। प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सभी सरकारी एजेंसियों, उद्योगपतियों, कृषकों और आम आदमी द्वारा संयुक्त प्रयास किया जाना चाहिए।

प्रदूषण को नियंत्रित करने की आवश्यकता पर जोर देने के लिए 1971 में स्टॉकहोम में मानव पर्यावरण पर एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था।

उद्योग आर्थिक विकास और रोजगार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उद्योगों में पर्यावरण प्रबंधन औद्योगिक गतिविधियों के प्रबंधन को इस तरह से संदर्भित करता है कि पर्यावरण पर प्रभाव को स्वीकार्य स्तर तक कम किया जा सके। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं।
पर्यावरण प्रबंधन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा पर्यावरणीय स्वास्थ्य को नियंत्रित किया जाता है। साथ ही साथ यह पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव डालने के लिए कदम उठाने और व्यवहार विकसित करने की प्रक्रिया है। इन पर्यावरणीय प्रभावों के जोखिम को कम करने के लिए प्रयास जरूरी है । हम स्पष्ट रूप से उद्योगों में उद्देश्य और लक्ष्य निर्धारित करते हैं।
औद्योगिक विकास से आर्थिक विकास होता है। यह उत्पादन रोजगार और निर्यात आदि को बढ़ाता है। यह औद्योगीकरण का सकारात्मक पक्ष है।

पर्यावरणीय प्रभाव
औद्योगीकरण का नकारात्मक पक्ष है । प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों की कमी औद्योगिक विकास के नकरात्मक प्रभाव हैं।
अधिक उत्पादन के लिए अधिक प्राकृतिक संसाधन की की ज़रुरत होती है । संसाधनों का ज़यादा इस्तेमाल प्रकृति पर असर डालता है, और उसका असर पारिस्थितिकी तंत्र पर होता है।

औद्योगिक प्रदूषण एक चिंता का विषय है, जिससे अत्यधिक पर्यावरणीय क्षति होने का खतरा होता । जल प्रदूषण,ठोस अपशिष्, विकिरण, शोर और उद्योगों द्वारा जारी कंपन पर्यावरण पर प्रभाव डाल रहे हैं।

प्रदूषण नियंत्रण उपाय
सरकार द्वारा चलाये जाने वाले सिद्धांत: जैसे प्रदूषक भुगतान सिद्धांत एवं
औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण कानूनों सहित पर्यावरण कानून पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा पारित किए जाते हैं। इनमे से कुछ विशेष कानून निम्नलिखित है:

  1. जल (रोकथाम और प्रदूषण नियंत्रण) अधिनियम 1974
  2. वायु (रोकथाम और प्रदूषण नियंत्रण) अधिनियम 1981
  3. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986
  4. जल (रोकथाम और प्रदूषण नियंत्रण) उपकर अधिनियम 1977
  5. वन संरक्षण अधिनियम 1980 आदि ।

प्रदूषण नियंत्रण कानून केंद्र में सीपीसीबी /केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य स्तर पर एसपीसीबी / राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा लागू किए जाते हैं। प्रदूषण मानदंडों का उल्लंघन करने पर विभिन्न प्रकार के दंडों का प्रावधान है – जैसे जुर्माना, मुआवजे का भुगतान, इकाइयों को बंद कराना आदि।

औद्योगिक प्रदूषण को कम करने के लिए स्वैच्छिक उपाय

उद्योगों को अपने पर्यावरणीय प्रभावों की जिम्मेदारी लेने के लिए कहा जाता है। विभिन्न उपाय अपनाए जाते हैं जैसे सीएसआर/कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व, स्रोत पर कचरे को कम करना, स्वच्छ उत्पादन विधियां, अपशिष्ट न्यूनीकरण, पुनर्चक्रण, अपशिष्ट और पानी का ट्रीटमेंट आदि ।

उद्योगो में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए एमिशन स्टैंडर्ड्स का पालन करना होता है, जैसे नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स, नॉइज़ स्टैंडर्ड्स, अपशिष्ट प्रबंधन नियम और अपशिष्ट जल मानक आदि ।

अधिक जनसंख्या और प्रदूषण — पर्यावरण की गुणवत्ता को प्रभावित करके मनुष्य पर प्रभाव डालने वाली शक्तिशाली पारिस्थितिक शक्तियाँ हैं। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम पृथ्वी की रक्षा करें, अपने और आने वाले पीढ़ी और असंख्य अन्य प्रजातियां जो पृथ्वी पर विकसित हुई हैं के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करें। पर्यावरण प्रदूषण को कम करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीवन शैली में बदलाव लाना चाहिए।

✒️ मोहम्मद तौहीद आलम
( लेखक विगत कई वर्षों से उद्योगों में पर्यावरण प्रबंधन/संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत हैं । फिलहाल वे कानपुर स्थित एक प्रसिद्ध खाद्य प्रसंस्करण राजस्थान में Environment Health Safety प्रबंधक हैं । लेखक विगत में केमिकल, फार्मास्यूटिकल्स और एफएमसीजी उद्योगों के साथ EHS विशेषज्ञ के तौर पर जुड़े रहे हैं)

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