उबैद उल्लाह नासिर

अफगानिस्तान प्रति दिन एक गहरी अँधेरी खाई में गिरता जा रहा है तालिबान जिस तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं और एक के बाद एक सूबों पर कब्जा करते जा रहे है उसको देखते हुए वह दिन दूर नहीं दिखाई पड़ता जब काबुल पर भी उनका कब्जा हो जाएगा I अमरीकी विशेषज्ञों का अनुमान है की अगके तीस दिनों के अन्दर अन्दर ही काबुल पर तालिबान का कब्जा हो जाएगा उधर सुरक्षा परिषद् में अफगानिस्तान की समस्या पर होने वाले इजलास में जिसकी अध्यक्षता भारत ने की थी संयुक्त राष्ट्र संघ सहायता मिशन की अध्यक्ष डेबोराल्यांस ने कहा है कि अफगानिस्तान एक खतरनाक दो राहे पर खडा है या तो ईमानदारी से शान्ति वार्ता द्वारा वहां शान्ति और स्थायित्व लाया जाए या फिर एक अत्यंत भयावह युद्ध द्वारा लायी गयी तबाही बर्बादी और मानव त्रासदी के लिए दुनिया तैयार रहे I

अफगानिस्तान की सरकारी सेना अमरीकी सैनिकों के साथ मिल कर एक हारी हुई जंग लड़ रही है इस महीनें के बाद अमरीकी फौजी अफगानिस्तान से चले जायेंगे और लड़ाई अफगानिस्तान की सेना और तालिबान के बीच सीधी टक्कर वाली हो जायेगी लेकिन सच्चाई यह है कि अफगानी सेना बेदिली से यह लड़ाई लड़ रही है क्योंकि वह जानती है कि वह तालिबान को पराजित नहीं कर सकती Iउधर अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी अफगानिस्तान के हालात को ले कर चिंतित है लेकिन उसकी चिंता अफगानिस्तान के अवाम के भविष्य को लेकर कम अपने हितों को ले कर अधिक है Iवह  चिंतित है कि अगर दुनिया के इस अत्यंत महत्वपूर्ण भूभाग पर तालिबान की सरकार वापस आ गयी तो उनके हित सुरक्षित नहीं रहेंगे क्योंकि चीन सेंट्रल और west एशिया तक पाकिस्तान और अफ्गानिस्तान के रास्ते आपनी सीधी पहुँच बना लेगा और शक्ति संतुलन उसकी ओर झुक जाएगा Iचीन ने इस उभरती हुई भौगोलिक स्थिति को समझते हुए तालिबान से अपने सम्बन्ध सुधारना शुरू कर दिया और विगत दिनों चीनी विदेश मंत्रालय के बड़े अफसरों से तालिबान के एक नेता की बात चीत हो चुकी है चीन ने तालिबान को एक महत्वपूर्ण सैनिक और राजनैतिक शक्ति के तौर पर स्वीकार करने की बात कही तो तालिबान ने भी उगर मुसलमानों के मसले पर चीन को कटघरे में खडा न करने का आश्वासन दिया है।

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तालिबान भारत के लिए एक खतरा रहे है अपनी धर्मान्धता कट्टरता और क्रूरता के चलते उन्होंने ने न सिर्फ इस्लाम की गलत तस्वीर पेश की बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसकी बदनामी का कारण भी बने हैं Iअपनी इस कट्टरता के कारण वह अन्तराष्ट्रीय बिरादरी में अलग थलग पड़ गए और अपना तथा अपने देश का भारी नुकसान करा चुके हैं I भारत की विवधता और सर्वधर्म समभाव का या तो उन्हें इल्म नही या वह पाकिस्तान के बहकावे और उक्सावे में आ कर वह भारत को ले कर पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं,उधर भारत को चिंता है की यदि तालिबान फिर सत्ता में आ गए तो वह कश्मीर में उग्रवादी सरगर्मियां बढाने  और आतंकवादियों की मदद करने का सिलसिला फिर शुरू कर देंगे दुसरे भारत एक लोकतांत्रिक देश है और सैनिक शक्ति द्वारा किसी भी देश में सत्ता पर कब्जे को स्वीकार नहीं करता I युद्ध के द्वारा किसी भी देश पर कब्जा करने के दिन लद गए हालांकि अमरीकी राष्ट्रपति बुश ने इराक पर कब्जा कर के दुनिया के बहुत ही विकसित देश को कब्रिस्तान में बदल के इस युग को वापस लाने की कोशिश की लेकिन इराक में सत्ता परिवर्तन के अलावा अमरीका कुछ हासिल नहीं कर सका उलटे खरबों डालर का आर्थिक बोझ और हज़ारों अमरीकी सैनिकों की लाशें ही उसका मुक़द्दर बनी I जॉर्ज बुश ने अफगानिस्तान का इतिहास समझे बगैर उस पर हमला तो बोल दिया  था लेकिन आज बीस साल की इस बे मतलब जंग के बाद अंततः उसी तरह उसे वहां से भागना पड़ रहा है जैसे इराक या उस से पहले वियतनाम से  उसे भागना पडा था Iजिस प्रकार अमरीका ने अफगानिस्तान की सेना को तैयार किया है वैसे ही उसने वियत्कांग की सेना को तैयार किया था आआऔर ठीक उसी तरह जिस तरह वियत्कांग की सेना हो ची मिंह की सेना के सामने पोरस का हाथी साबित हुई थी वैसे ही अफगानिस्तान की सेना तालिबान के सामने नहीं टिक पा रही है।

इतिहास गवाह है की सिकंदर से लेकर बुश तक कोई अफगानिस्तान को गुलाम नहीं बना सका है I तालिबान की धर्मान्धता कट्टरता क्रूरता की अवश्य ही खूब भर्त्सना की जाए लेकिन अपने देश की आज़ादी को बरक़रार रखने के लिए उन्होंने पहले सोवियत यूनियन और अब अमरीका को जिस प्रकार मार भगाया है वह काबिले तारीफ़ है Iचीन ने इतिहास से सबक लेते हुए  तालिबान की हकीकत को स्वीकार कर लिया है यह उसके राष्ट्रीय हित में है I भारत को भी इस मामले में सच्चाई को कुबूल करना पड़ेगा और चीन के ही पद्चिन्हों पर चलते हुए तालिबान से बात चीत का सिलसिला शुरू करना  चाहिए यही देश हित में होगा I दुसरे अटल जी के समय जब कंधार में अगवा  भारतीय जहाज़ को आतंकवादियों ने उतारा था तो अपने नागरिकों की रिहाई के लिए भारत सरकर को तालिबान से मदद लेनी ही पड़ी थी और यह ज़रूरी व दूरदृष्टि वाला फैसला था क्योंकि सैकड़ों भारतीय नागरिको की जान बचाने का इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था I आज भी कमो बेश वैसी ही ज़रुरत है हमें अपने हितों की रक्षा और पाकिस्तान की शरारत की काट के लिए तालिबान की ओर दोस्ती का हाथ बढाने में हिचकिचाना नहीं चाहिए Iहालांकि पाकिस्तान आसानी से तालिबान और भारत के बीच बात चीत नहीं होने देगा उसने रूस और चीन के साथ मिल कर भारत को अफगानिस्तान की शांति प्रक्रिया से दूर रखा है लेकिन भारत इस समय सुरक्षा परिषद् का अस्थायी अध्यक्ष है विगत दिनों सुरक्षा परिषद् में अफगानिस्तान पर हुए इजलास में तालिबान भी शरीक थे हालांकि इस इजलास से कोई हल नहीं निकला क्योंकि सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य इस मसले पर एक राय पर नहीं हैं सबको अपने अपने हितों की चिंता है उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की अफगानिस्तान पर तालिबान की हुकूमत होगी या किसी और की I भारत के अफगान राष्ट्रपति गनी से भी मधुर सम्बन्ध है अगर वह तालिबान से भी सम्बन्ध स्थापित कर ले तो अफगानिस्तान के भविष्य पर होने वाली बातचीत में वह एक महत्वपूर्ण किरदार भी अदा कर सकता है I अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में अपनी अलग पहचान बनाने के लिए आवश्यक है की भारत ऐसे मामलों में एक प्रोएक्टिव किरदार अदा करे किसी देश का पिछलग्गू बन कर हम वैश्विक मामलों में नेत्र्तिव नहीं कर सकते Iअफगानिस्तान की मसले पर दोहा में हो रही बातचीत से भारत को अलग रखना भारत जैसे विषाल और अफगानिस्तान के नवनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले देश के लिए बेईज्ज़ती की बात है I भारत की विदेश नीति निर्माताओं को इस पर गहराई से गौर करना चाहिए।

चीन पाकिस्तान की मदद से इस क्षेत्र में अपनी पैठ बढ़ा रहा है उसे रूस की भी हिमायत हासिल है ब्रिटेन के भी पाकिस्तान विशेषकर उसकी सेना से गहरे सम्बन्ध है इस लिए वह भी पाकिस्तान की ही हाँ में हाँ मिलाएगा इस प्रकार देखा जाए तो अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन और तालिबान की सत्ता में वापसी का सब से अधिक प्रभाव भारत पर ही पड़ेगा I पाकिस्तान इस मामले में दोगला खेल खेल रहा है वह शान्ति वार्ता में भी शामिल है और तालिबान को सैन्य तथा दूसरी आवश्यक मदद भी  दे रहा है I संयुक्त राष्ट्र में अफगानिस्तान के दूत गुलाम मोहम्मद असकज़यी ने कहा है की तालिबान के साथ दस हज़ार से अधिक विदेशी लड़ाके भी अफगानिस्तान की सेना से लड़ रहे है ख्याल है कि इनमें अधिकतर पाकिस्तानी है और दुसरे आतंकवादी संगठनों के लड़ाके भी शामिल हैं।

इन सब हालात और सच्चाइयों को ध्यान में रखते हुए भारत को अपनी अफगान नीति पर नए सिरे से गौर करना चाहिएI किस देश में किस प्रकार की सरकार होगी यह हमारा दर्दसर नही होना चाहिएI अफगानिस्तान बुनियादी तौर से एक कबीलाई कल्चर वाला देश रहा है वहन क़बीलों के बड़े बूढ़े ही मिल बैठ कर या फिर एक बड़ी पंचायत जिसे लोया जिरगा कहा जाता है उसी में सब फैसले होते है तालिबान इसी कल्चर को जीवित रखना चाहते हैं कोई ज़रूरी नहीं की उन पर पश्चिम जैसी जम्हूरियत ही थोपी जाये हाँ उन्हें कट्टरता से दूर लाया जाय मानवाधिकारों का पाबंद बनाया जाए महिलाओं के सम्बन्ध में उनकी  दक़ियानूसी सोच को बदला जाए आदि मामलों पर तालिबान को सही ढर्रे पर लाने के लिए उनसे दुश्मनी के बजाय दोस्त बना कर उनकी सोच को बदलने का प्रयास किया जाना चाहिये Iक्या भारत सरकार ने अपने ही देश की अलगाववादी संगठनों से बात चीत नहीं की है और उन्हें मेंन स्ट्रीम में लाने में सफलता नहीं हासिल की है फिर ऐसी ही कोशिश तालिबान के साथ करने में क्या हर्ज है ?राष्ट्रहित और क्षेत्र में शान्ति व स्थायित्व के लिए भारत को यह पहल करनी चाहिए I

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