….बर्क गिरती है तो बेचारे मुसलमानों पर

अमेरिका में रहने वाला अमेरिकी हुआ तो हिंद में रहने वाला हिंदी की जगह हिंदू कैसे?


अब्दुल माजिद निज़ामी
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने मुख्य रूप से चार बातें कही हैं, लेकिन उनकी बातों पर अगर ग़ौर करके उनसे सवाल किया जाये तो वह ख़ुद अपनी ही कही बातों में उलझ कर रह जायेंगे……
मोहन भागवत पहली बात कहते हैं ‘हमें मुस्लिम वर्चस्व के बारे में नहीं,भारतीय वर्चस्व के बारे में सोचना है’
उनकी इस बात का अर्थ है कि मुसलमान सिर्फ अपने वर्चस्व की बात ही सोचता है, देश के वर्चस्व में उसे कोई दिलचस्पी नही है।
जबकि स्थिति इससे एकदम उलट है। भारत का मुसलमान हमेशा से भारतीय वर्चस्व के बारे में ही सोचता रहा है और सोचता रहेगा। क्योंकि भारत मुसलमानों का वतन है और इस्लाम धर्म अपने मानने वालों को अपने वतन से मोहब्ब्त करने का हुक्म देता है, इसी लिए तो “काबा” भारत के मुसलमानों सहित विश्वभर के मुसलमानों के लिये सबसे पवित्र स्थल होने के बावजूद भारतीय मुसलमानो के लिए “सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा” ही रहा “सऊदी अरब” नहीं हुआ। भारतीय मुसलमान की पहली पसन्द भारत ही है और भारत ही रहेगा। अगर वर्चस्व की ही बात की जाये तो इस समय देश के जो हालात हैं, जिस प्रकार अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित किया जा रहा है, उनकी हत्यायें की जा रही हैं, उससे पता चलता है कि वर्चस्व के लिए ज़ुल्म हिन्दू कर रहे हैं या मुसलमान कर रहे हैं।

मोहन भागवत ने दूसरी बात कही कि ‘हिंदुओं और मुसलमानों के पुरखे एक ही थे और हर भारतीय ‘हिंदू’ है’
मोहन भागवत इस बात को कहने से पहले इतिहास को पढ़ लेते तो शायद ऐसा कभी नही कहते। पहली लाइन के जवाब में बता दें कि बहुत से मुस्लिम खानदान ऐसे भी हैं, जिनके पुरखे तिजारत करते हुए भारत आए और यहीं आकर बस गए।
यह सच है कि कुछ हिंदू मुसलमानों के पुरखे एक ही होंगे। लेकिन तब भी इस हिसाब से हर भारतीय “हिंदू” नहीं बल्कि हर भारतीय “हिंदी” या “हिंदुस्तानी” कहलाएगा। जैसे अमेरिका में रहने वाला अमेरिकी होता है, अमेरिकु नही, चीन में रहने वाला चीनी होता है,चीनू नही, जापान का निवासी जापानी होता है,जापानु नही,पाकिस्तान का रहने वाला पाकिस्तानी होता है, पाकिस्तानु नही। उसी तरह हिंद में रहने वाला हिंदी होगा,हिंदू नही। भागवत को समझना चाहिये कि हिंदू एक धर्म विशेष के व्यक्ति को कहते हैं, न कि देश के नागरिक को। हिंदू धर्म को मानने वाला पाकिस्तानी तो हिंदू हो सकता है, लेकिन हिन्दू धर्म को न मानने वाला हिंदुस्तानी हिंदू नही होगा।
मोहन भागवत ने तीसरी बात कही कि ‘इस्लाम आक्रांताओं के साथ आया। यह इतिहास है और इसे उसी रूप में बताया जाना चाहिए।’
तो श्रीमान भागवत जी ये इतिहास भी बताया जाना जरूरी है कि ब्राह्मण भारतीय मूलनिवासी नहीं बल्कि “युरोशियन” हैं। जिनका डीएनए वहां के अंग्रेज़ों से मिलता है और इसी बिना पर मोहन दास करम चन्द गांधी (वेश्य) ने अंग्रेजों से कहा था कि “हम भारतीय होने के साथ साथ युरोशियन हैं हमारी नस्ल एक ही है इसलिए अग्रेज शासक से अच्छे बर्ताव की अपेक्षा रखते है।”
अमेरिका के Salt lake City स्थित युताहा विश्वविधालय (University of Utaha’ USA) के वैज्ञानिकों द्वारा 1995 से 2001 तक लगातार 6 साल तक भारत के विविध जाति-धर्मो और विदेशी देश के लोगो के खून पर किये गये DNA के परिक्षण से एक रिपोर्ट तैयार की गई। जिसमें बता गया कि भारत देश की ब्राह्मण जाति के लोगों का DNA 99:96 %, क्षत्रिय जाति के लोगों का DNA 99.88% और वैश्य-बनिया जाति के लोगो का DNA 99:86% मध्य यूरेशिया के पास जो “काला सागर ’Blac Sea” है। वहां के लोगो से मिलता है।
अब बताइए अगर भारत छोड़ने का नंबर आयेगा तो पहले कौन जायेगा? ज़ाहिर बात है जो पहले आया है उसे ही पहले जाना होगा।
मोहन भागवत ने चौथी बात कही कि ‘समझदार’ मुस्लिम नेताओं को कट्टरपंथियों के खिलाफ मजबूती से खड़ा होना चाहिए।’
बेशक, लेकिन भागवत जी पहले ये बताइए कि कौन ‘समझदार’ हिंदू नेता उन ‘हिंदू कट्टरपंथियों’ के खिलाफ़ खड़ा होगा जो दिन दहाड़े इंसानों की जान ले रहे हैं? रेपिस्टों के लिए तिरंगा रेली निकाल रहे हैं, कभी ‘मस्जिदों’ की मीनारों पर तो कभी ‘अदालतों’ की गुंबद पर चढ़कर भगवा लहरा रहे हैं ?
क्या आपकी नज़र में ये सब कट्टरपंथी नहीं है? और क्या किसी ‘हिंदू ‘ समझदार नेता को इनके खिलाफ़ मजबूती से नहीं खड़ा होना चाहिए? या कोई हिंदू नेता समझदार ही नहीं है जो इनके खिलाफ खड़ा हो सके? आपकी ग़लती भी नही कह सकते, क्योंकि आप जिस शाखा से आते हैं, उसकी बुनियाद ही नफ़रत के ऊपर है। जब देश के दो मुख्य समुदायों के बीच नफ़रत फ़ैलाने के लिए देश के प्रधानमंत्री श्मशान और क़ब्रिस्तान की बातें करते हैं और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मंच पर खड़े होकर कहते हैं कि अब से पहले जन्माष्टमी नही मनाई जाती थी। तो फिर किस मुँह से आप कहते हैं कि समझदार मुसलमानों को कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ खड़ा होना चाहिए?
समझदार मुसलमान तो हमेशा ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा होता आया है। क्योंकि वो जानता है कि किसी एक बेगुनाह का क़त्ल पूरी इंसानियत का क़त्ल होता है।
भगवती जी आपकी गलती नहीं है, बस सारे कायदे कानून और समझदारियां मुसलमानों के लिए ही हैं।
बहुसंख्यकों की नफ़रत से भरी भीड़ कपड़े देख कर,नाम देख कर, दाढ़ी देख कर, फ्रीज में रखा गोश्त देखकर मुसलमानों को मार रही है। लेकिन किसी समझदार हिन्दू इनके ख़िलाफ़ बोलने को तैयार नही है। आप लोगों को मीलों दूर का अफगानिस्तान तो दिख रहा है, लेकिन पड़ोस में मरता इंसान नही दिख रहा। सार यह है कि ज़ुल्म की इन्तिहा तो आपकी तरफ़ से हो रही है,लेकिन बर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलामानों पर।

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