लखनऊ
कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन के कारण लोग आर्थिक तंगी का शिकार हो रहे हैं। भारत में अधिकांश आबादी ऐसी है जिनके घर में प्रतिदिन मेहनत मजदूरी करते हैं,तब उनके घर में चूल्हा जलता है। आज वह सबसे बुरी स्थिति से गुज़र रहे हैं। घर में रहते हैं तो बच्चों के भूख से बिलबिलाते चेहरे नही देखे जाते और बाहर निकलते हैं तो पुलिसिया कहर का सामना करना पड़ता है। यह बेबस लोगों को औलाद को भूख से तड़पते देखने से आसान पुलिस की मार खाना लगता है। इसलिये बच्चों के लिए दो रोटी की मजबूरी इन्हें सड़क तक ले आती है। लेकिन यहाँ सड़क पर वो लोग इनका इंतज़ार कर रहे होते हैं,जिन्हें हम रक्षक कहते हैं। पिछले लॉकडाउन में यह रक्षक मसीहा बनकर सामने आये थे। लेकिन इस बार इन्हें अमीरों के रक्षक और ग़रीबों के भक्षक की संज्ञा दी जा रही है। लॉकडाउन में जिस तरह पुलिसिंग चल रही है,उसे देखते हुये यह कहना अनुचित भी नही लग रहा है। अक्सर देखने में आ रहा है कि जो पैसे देने में सक्षम हैं उनके सब काम चल रहे हैं। परन्तु जो ग़रीब हैं उनके लिए दो रोटी कमाना भी दुश्वार हो रहा है। रोते हुये बच्चों का पेट भरने के लिए ठेली लेकर निकले लोगों की कहीं ठेली पलटी जा रही,कहीं बाट उठा कर ले जाए जा रहे हैं तो कहीं उन पर मुकदमा तक लिखाया जा रहा है। ऐसे ग़रीबों का उत्पीड़न देख कर आम जनता को तो दर्द हो रहा है लेकिन पुलिस का दिल नही पसीज रहा है। पुलिस का दिल वहाँ पसीजता है जहाँ पैसा बरसता है। ठेले वाले पर देने को कुछ नही होता तो वहाँ लॉकडाउन का उल्लंघन नज़र आने लगता है। उसे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता है।
पुलिस के ज़ुल्म की कहानी बयान करती दो तस्वीरें एक पत्रकार ने ट्विटर पर शेयर की हैं। जिनमें से एक तस्वीर में दो पुलिसकर्मी एक ठेले वाले के बाट उठा कर ले जा रहे हैं और दूसरी तस्वीर में वो ठेले वाला रोता हुआ जा रहा है। तस्वीर में देखने वाली बात यह भी है कि पुलिसकर्मी ने मास्क भी मुँह से नीचे लगाया हुआ है।
मामला प्रदेश की राजधानी और तहज़ीब का शहर कहे जाने वाले लखनऊ के थाना हजरतगंज गोमतीनगर समतामूला चौराहे का है। जहाँ पर शनिवार को दीपू गुप्ता नामक युवक ठेले पर आम बेच रहा था। तभी वहाँ दो पुलिसकर्मी आये और दीपू गुप्ता के बाट उठा कर के जाने लगे। दीपू पुलिसकर्मियों के सामने रोता गिड़गिड़ाता रहा,लेकिन पुलिसकर्मियों का दिल नही पसीजा और वह उसके बाट लेकर चले गये। यह पूरा मामला वहाँ उपस्थित एक पत्रकार के कैमरे में क़ैद हो गया।
दीपू की तस्वीरें वायरल होने के बाद थाना हजरतगंज प्रभारी श्यामबाबू शुक्ला पुलिस टीम के साथ रविवार को पुराना लखनऊ सिटी स्टेशन के पास स्थित दीपू गुप्ता के घर पँहुचे। वहाँ उन्होंने दीपू को डिजिटल तराजू भेंट किया। श्यामबाबू शुक्ला और उनकी टीम ने दीपू से आम भी खरीदे।
श्यामबाबू शुक्ला ने कहा कि मुझे जबसे इस मामले का पता चला मैं तभी से दीपू को तलाश कर रहा था। दीपू का नुकसान हुआ था। इसकी भरपाई के लिए मैं इनसे मिला। मैं ध्यान रखूंगा कि इस प्रकार आगे कोई प्रताड़ित न हो पाए।
तस्वीरें अपलोड करने वाले पत्रकार परवीन सिंह ने लिखा है
“लखनऊ में आम बेचने वाले का बाट छीनने वाले वर्दीधारियों में से एक ने तो मास्क तक मुँह से दूर कर रखा है, इस पर भी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए”
इन तस्वीरों पर यूज़र्स की कड़ी प्रतिक्रिया आ रही है।
रोहित कुमार नामक यूज़र ने लिखा
“कुछ लोग आम चुरा कर भागते थे और ये बाट उठाकर। गरीबो पर अत्याचार शुरू हो चुका है एक बार फिर बीएसपी को आना चाहिए”
गुफरान ने पुलिस को धन्यवाद देते हुये लिखा
“पुलिस वालों के इस पुलिसिया बर्ताव के लिए धन्यवाद। पुलिस वाले वर्दी के नीचे इंसान तो होते ही होंगे।”
पुलिसवालों को सज़ा की माँग करते हुये शशांक श्रीवास्तव ने लिखा
“इन बेशर्म पुलिस वालों को तुरंत सजा मिलनी चाहिए”
दिनेश ने इसे मानवता पर तमाचा बताते हुये लिखा
“यह बेबसी , मानवता के मुँह पर तमाचा है।”
सुनील गुर्जर ने लिखा
“इनका सारा जोर गरीबों पर ही चलता है”
इनके अलावा भी ट्विटर पर बेहद कड़ी प्रतिक्रिया आ रही हैं।
हालाँकि ऐसा नही है कि समस्त पुलिस विभाग ही अमानवीयता का प्रदर्शन कर रहा है। इसी विभाग में ऐसे भी हैं जो बेसहारों की मदद कर रहे हैं। जब लोग अपनों की लाशें नही ले रहे थे, तब इसी विभाग के लोगों ने लावारिस लाशों का रीति रिवाज से अंतिम संस्कार किया। लेकिन जहाँ कुछ लोग मानवता का प्रदर्शन करके जी जान से विभाग की छवि चमकाने में लगे हैं तो वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो ग़रीबों पर ज़ुल्म जैसा घृणित कार्य करके विभाग की छवि धूमिल कर रहे हैं।
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