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हिंसा और उग्रवाद के ख़िलाफ़ इस्लाम का रुख़ और युवाओं की बौद्धिक ज़िम्मेदारी

लेखक: ए. बी. नदवी
hinsa aur ugravaad ke khilaf islam ka rukh

मानव सभ्यता का अस्तित्व और उसका विकास शांति, सहिष्णुता (सहनशीलता) और न्याय पर निर्भर है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी समाज में उग्रवाद, चरमपंथ और पक्षपात ने सिर उठाया, उसने बस्तियों को राख के ढेर में बदल दिया और इंसान को दरिंदा बना दिया। वर्तमान दौर में वैचारिक टकराव और बौद्धिक बिखराव ने जिस बुराई को सबसे ज़्यादा बढ़ावा दिया है, वह उग्रवाद और हिंसा (Extremism) है।
इस्लाम बुनियादी तौर पर शांति और संतुलन (मध्यम मार्ग) का धर्म है। “इस्लाम” शब्द की मूल धातु (जड़) ही “सिल्म” है, जिसका अर्थ सलामती, सुलह और शांति है। क़ुरान-ए-करीम ने मुस्लिम समुदाय (उम्मत-ए-मुस्लिमा) की बुनियादी पहचान ही यह तय की है कि वह एक “उम्मत-ए-वसत” यानी मध्यम मार्गी और संतुलित समूह है। ईश्वर का फ़रमान है:
وَكَذَٰلِكَ جَعَلْنَاكُمْ أُمَّةً وَسَطًا لِّتَكُونُوا شُهَدَاءَ عَلَى النَّاسِ
(और इसी तरह हमने तुम्हें एक संतुलित समुदाय बनाया ताकि तुम लोगों पर गवाह बनो — सूरह अल-बक़रा: 143)

संतुलन का यह गुण केवल इबादत (पूजा-पाठ) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आचरण, राजनीति, सामाजिक मेलजोल और सोच-विचार के हर पहलू पर लागू होता है। इस्लाम ऐसे हर विचार या आचरण को पूरी तरह नकारता है जो मानव जीवन को सस्ता समझे, ज़ुल्म को बढ़ावा दे, या धर्म के नाम पर समाज में उपद्रव और दहशत पैदा करे।

क़ानून की सर्वोच्चता और व्यक्ति का दायरा

इस्लाम व्यक्तिगत भावनाओं और सामूहिक न्याय के बीच साफ़ फ़र्क करता है। किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह ख़ुद ही फ़ैसला करने वाला, सज़ा सुनाने वाला और सज़ा लागू करने वाला बन जाए। न्याय को लागू करना क़ानून के अनुसार स्थापित सक्षम संस्थाओं और अधिकृत प्रशासनों की ज़िम्मेदारी है।
यही वजह है कि इस्लाम ख़ुद से क़दम उठाने और क़ानून को अपने हाथ में लेने की कड़ी मनाही करता है। यह सिद्धांत समाज को अराजकता, बदले की कार्रवाइयों और अव्यवस्था से सुरक्षित रखने में मदद करता है और यह सुनिश्चित करता है कि फ़ैसले भावनाओं या अफ़वाहों के आधार पर नहीं, बल्कि सबूतों और क़ानूनी प्रक्रिया के अनुसार हों।

धर्म की समझ में विद्वानों के मार्गदर्शन का महत्व

धार्मिक शिक्षाओं को सही तरीक़े से समझना भी इस्लाम का एक महत्वपूर्ण नैतिक निर्देश है। पवित्र क़ुरान चिंतन-मनन, ज्ञान प्राप्ति और विद्वानों (अहले-इल्म) से मार्गदर्शन लेने की सीख देता है। इस्लामी इतिहास में विद्वानों (उलेमा) ने क़ुरान, हदीस, अरबी भाषा, फ़िक़्ह (न्यायशास्त्र) और इज़्तिहाद के नियमों में गहरी महारत हासिल करने के बाद ही समुदाय के मार्गदर्शन का दायित्व निभाया। यह ज्ञान परंपरा इस सच्चाई को स्वीकार करती है कि धार्मिक ग्रंथों को उनके ऐतिहासिक संदर्भ, भाषाई बारीकियों और इस्लाम के उच्च नैतिक मक़सदों की रोशनी में समझना बेहद ज़रूरी है।
हर युग में प्रामाणिक विद्वानों, न्यायविदों और धार्मिक संस्थानों ने समाज का बुद्धिमानी और संतुलन के साथ मार्गदर्शन किया है। उनकी ज़िम्मेदारी केवल धार्मिक सवालों के जवाब देना नहीं, बल्कि नैतिक चरित्र का निर्माण करना, मध्यम मार्ग का प्रचार-प्रसार करना, आपसी संवाद को बढ़ावा देना और सच्ची इस्लामी शिक्षाओं को ग़लत या अधूरी समझ से अलग करना भी है। विद्वानों के मार्गदर्शन का सम्मान हमेशा से समुदाय के लिए संतुलन और वैचारिक स्थिरता का बुनियादी ज़रिया रहा है।

भारत की इस्लामी परंपरा भी इन उच्च नैतिक मूल्यों की एक शानदार मिसाल पेश करती है। सूफ़ी संतों, विद्वानों, शिक्षकों और सामाजिक नेताओं ने ज्ञान, सेवा, दया और मानवीय गरिमा के सम्मान के ज़रिए समाज को मज़बूत बनाया। उनके जीवन से यह सबक़ मिलता है कि धर्म उस समय अधिक असरदार होता है जब वह ज्ञान, उच्च नैतिकता और सामूहिक भलाई की सेवा का ज़रिया बने। उनकी यह परंपरा आज भी नई पीढ़ियों को ज़िम्मेदार नागरिक बनने और समाज के सकारात्मक निर्माण में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करती है।

भारतीय समाज: विविधता, संविधान और ज़मीनी हक़ीक़त

भारत एक बहु-धार्मिक, बहु-भाषाई और बहु-सांस्कृतिक लोकतांत्रिक देश है। हमारा संविधान सभी नागरिकों को समानता, न्याय और बुनियादी आज़ादियों की गारंटी देता है। यह विविधता हमारे देश की सबसे बड़ी ताक़त है, हालाँकि अगर गंभीरता से इसकी वैचारिक सुरक्षा न की जाए तो यह बिखराव का कारण भी बन सकती है।

आज का निष्पक्ष विश्लेषण बताता है कि सामाजिक सद्भाव को कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है:
नफ़रत पर आधारित बातें और ध्रुवीकरण (Polarization):
सोशल मीडिया और डिजिटल संचार माध्यमों के ग़ैर-ज़िम्मेदाराना इस्तेमाल ने समाज में भावनात्मक उत्तेजना और दूरियाँ बढ़ाई हैं।
सामाजिक असुरक्षा और प्रतिक्रिया (रिएक्शन) की मानसिकता:

जब किसी वर्ग में असुरक्षा की भावना पैदा होती है, तो अनजाने में प्रतिक्रिया की राजनीति जन्म लेती है। इतिहास गवाह है कि “प्रतिक्रिया में की गई हिंसा” कभी समाधान नहीं बनती, बल्कि वह मूल हिंसा को और अधिक सही ठहराने का बहाना दे देती है।

लोकतांत्रिक और संवैधानिक संसाधनों का महत्व:

एक लोकतांत्रिक समाज में समस्याओं का समाधान क़ानून के दायरे में रहकर, बातचीत, क़ानूनी संघर्ष और शांतिपूर्ण जन-जागरूकता के ज़रिए ही संभव है। हिंसा, क़ानूनहीनता या किसी भी तरह का ग़ैर-क़ानूनी टकराव न केवल लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करता है, बल्कि ख़ुद पीड़ित वर्गों के लिए सबसे ज़्यादा नुक़सानदेह साबित होता है।
भारतीय मुसलमानों का इतिहास और उनकी परंपरा हमेशा देश के प्रति वफ़ादारी, संवैधानिक ज़रूरतों के सम्मान और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संरक्षक रही है। इसलिए लोकतांत्रिक मूल्यों को मज़बूत करना और सामाजिक न्याय के साझा संघर्ष का हिस्सा बनना समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
क़ुरान और हदीस की रोशनी में हिंसा का खंडन
इस्लामी शरीयत के बुनियादी मक़सदों में सबसे पहला मक़सद “हिफ़्ज़-ए-नफ़्स” यानी मानव जीवन की सुरक्षा है। क़ुरान और सुन्नत (पैगंबर की परंपरा) ने किसी भी अनुचित ख़ून-ख़राबे, क़ानूनहीनता और उग्रवाद के ख़िलाफ़ स्पष्ट और अंतिम आदेश जारी किए हैं:

1. एक इंसान की हत्या पूरी इंसानियत की हत्या है

पवित्र क़ुरान में मानव जीवन की पवित्रता का जो वैश्विक विचार दिया गया है, उसकी मिसाल कहीं और नहीं मिलती। ईश्वर का फ़रमान है:
مَن قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا(जिसने किसी इंसान को बिना किसी के ख़ून के बदले या ज़मीन में फ़साद (उपद्रव) फैलाने के अलावा नाहक़ मार डाला, तो मानो उसने सारे इंसानों की हत्या कर दी; और जिसने किसी एक जान को बचाया, तो मानो उसने सारे इंसानों को ज़िंदगी बख़्श दी — सूरह अल-माइदा: 32)
यह आयत साफ़ करती है कि इस अपराध का संबंध मारे जाने वाले के धर्म से नहीं, बल्कि उसकी इंसानियत से है। पीड़ित चाहे किसी भी धर्म या आस्था का हो, उसकी जान की रक्षा करना फ़र्ज़ है।

2. धर्म में अति और कट्टरता की मनाही

उग्रवाद की शुरुआत अक्सर वैचारिक अति (ग़ुलू) से होती है। पैगंबर मुहम्मद ﷺ ने धर्म में हद से आगे बढ़ने और कट्टरता अपनाने से सख़्ती से मना फ़रमाया: عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: «يَا أَيُّهَا النَّاسُ، إِيَّاكُمْ وَالْغُلُوَّ فِي الدِّينِ، فَإِنَّمَا أَهْلَكَ مَنْ كَانَ قَبْلَكُمُ الْغُلُوُّ فِي الدِّينِ»
(हज़रत इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “हे लोगो! धर्म में अति (हद से आगे बढ़ने) से बचो, क्योंकि तुमसे पहले के लोगों को धर्म में हद से आगे बढ़ने ने ही तबाह किया था” — सुनन अन-नसाई)

इसके अलावा, पवित्र क़ुरान ज़मीन पर दंगा-फ़साद मचाने और नागरिकों की शांति व चैन को छीनने को क़त्ल से भी ज़्यादा संगीन अपराध क़रार देता है: وَالْفِتْنَةُ أَشَدُّ مِنَ الْقَتْلِ (और उपद्रव (फ़ितना) फैलाना क़त्ल से भी ज़्यादा बड़ा गुनाह है — सूरह अल-बक़रा: 191)
इस्लाम ने अव्यवस्था फैलाने, आतंकवाद करने, आम नागरिक बस्तियों को निशाना बनाने और अफ़रातफ़री मचाने वालों के लिए पवित्र क़ुरान में सख़्त से सख़्त सज़ाएँ तय की हैं, जिसे इस्लामी न्यायशास्त्र में “हिराबा” (आतंकवाद या विद्रोह) कहा जाता है।

3. माफ़ी, दरगुज़र और पैगंबर के आचरण का व्यावहारिक उदाहरण

हिंसा के मुक़ाबले में नरमी, हिकमत (बुद्धिमत्ता) और बेहतरीन आचरण को जीत की निशानी बनाया गया। मक्का विजय की ऐतिहासिक घटना इसका सबसे बड़ा सबूत है, जहाँ बीस सालों तक ज़ुल्म ढाने वाले ख़ून के प्यासे दुश्मनों को बिना किसी बदले की भावना के यह कहकर माफ़ कर दिया गया:
«لَا تَثْرِيبَ عَلَيْكُمُ الْيَوْمَ، يَغْفِرُ اللَّهُ لَكُمْ» (“आज के दिन तुम पर कोई इल्ज़ाम या पकड़ नहीं, अल्लाह तुम्हें माफ़ फ़रमाए” — अल-सुनन अल-कुबरा लिल-बैहक़ी)पैगंबर मुहम्मद ﷺ ने हमेशा ताक़त के ग़लत इस्तेमाल के बजाय नैतिक श्रेष्ठता, सब्र और दिलों को जोड़ने की रणनीति को बढ़ावा दिया।

युवाओं के नाम संदेश:

भावनात्मक उत्तेजना से बौद्धिक नेतृत्व तक
किसी भी क़ौम की असली पूँजी उसके युवा होते हैं। उग्रवादी तत्व—चाहे वे किसी भी विचारधारा से जुड़े हों—सबसे पहले युवाओं की कच्ची भावनाओं, अपरिपक्वता और न्याय की चाहत का ग़लत फ़ायदा उठाते हैं।
इस संदर्भ में युवा पीढ़ी को निम्नलिखित सिद्धांतों पर अपना बौद्धिक और व्यावहारिक जीवन खड़ा करना चाहिए:

ज्ञान, जागरूकता और प्रामाणिक मार्गदर्शन:

इंटरनेट और सोशल मीडिया पर बिना जाँच-पड़ताल के चलने वाले भावनात्मक वीडियो, एकतरफ़ा लेखों और अप्रमाणिक लोगों के नारों से सावधान रहें। धर्म की समझ भरोसेमंद और संतुलित विद्वानों से हासिल करें। सतही समझ और भावनात्मक धर्मपरायणता उग्रवाद की सबसे उपजाऊ ज़मीन है।

धैर्य, बुद्धिमत्ता और क़ानूनी दायरा:

अन्याय या उकसावे का हल ग़ुस्सा, नारेबाज़ी या क़ानून तोड़ना नहीं है। इस्लाम ने हर हाल में न्याय और क़ानूनी सीमाओं के पाबंद रहने का हुक्म दिया है। ज़ुल्म और बुराई का मुक़ाबला सूझबूझ, संवैधानिक संघर्ष और नैतिक श्रेष्ठता से किया जाता है, न कि क़ानून अपने हाथ में लेकर।

शैक्षणिक, वैज्ञानिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता:

युवाओं का असली मैदान उच्च शिक्षा, आधुनिक विज्ञान और तकनीक, अर्थव्यवस्था और सिविल सेवाएँ हैं। समाज को ऐसे सक्षम नेतृत्व की ज़रूरत है जो उच्च कौशल से लैस हो, सामाजिक सुधार में मुख्य भूमिका निभाए और बातचीत की मेज़ पर अपना पक्ष दलीलों के साथ पेश कर सके। शिक्षा के बिना आर्थिक और वैचारिक स्थिरता संभव नहीं है।

बहु-सांस्कृतिक समाज में पुल की भूमिका:

समाज में अलग-अलग वर्गों के बीच की ग़लतफ़हमियों और दूरियों को ख़त्म करने के लिए आगे बढ़ें। आपस में रचनात्मक संवाद क़ायम करें, भलाई और सेवा के कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें और अपने अच्छे आचरण व चरित्र से इस्लाम की सच्ची शिक्षाओं—यानी दया और भलाई—से लोगों को परिचित कराएं।

निष्कर्ष यह है कि उग्रवाद एक ऐसी आग है जो सबसे पहले ख़ुद उसे लगाने वाले को जलाकर ख़ाक कर देती है। इस्लाम का रुख़ बिल्कुल साफ़ है कि आतंकवाद, उग्रवाद और अन्याय का इस्लाम की मूल आत्मा से कोई संबंध नहीं है। यह धर्म इंसान को गरिमावान, संतुलित और पूरी मानवता के लिए सरापा रहमत (पूरी तरह दया का रूप) बनाने आया है।
हिंसा और उग्रवाद के ख़िलाफ़ इस्लाम का नैतिक पक्ष केवल नकारात्मक रवैयों को नकारना नहीं है, बल्कि उच्च मानवीय मूल्यों को स्थापित करना भी है। इस्लाम मानव जीवन की सुरक्षा, न्याय की स्थापना, दया के प्रसार, क़ानून के पालन, प्रामाणिक विद्वानों के मार्गदर्शन और कथनी व करनी में समझदारी की दावत देता है। यही वे स्थायी नियम हैं जो परिवारों, समाजों और राष्ट्रों को स्थिरता प्रदान करते हैं। जब हम अपने दैनिक जीवन में इन मूल्यों को अपनाएंगे, तो न केवल वैचारिक व नैतिक ऊँचाइयाँ हासिल करेंगे, बल्कि एक शांतिपूर्ण, न्यायसंगत और आपसी सम्मान पर आधारित लोकतांत्रिक समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेंगे।

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