
ए.बी. नदवी
पाकिस्तान का ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स 2026 में पहले स्थान पर आना केवल आतंकवादी घटनाओं की संख्या का मामला नहीं है। यह उस शासन व्यवस्था की सोच को भी दर्शाता है, जिसने वर्षों तक रणनीतिक उद्देश्यों के लिए सशस्त्र समूहों का इस्तेमाल किया, राजनीतिक समस्याओं को बलपूर्वक दबाया और अपने संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रभावी शासन स्थापित करने में विफल रहा।
इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (IEP) के अनुसार, 2025 में पाकिस्तान का ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स स्कोर 8.574 रहा। देश में 1,045 आतंकवादी हमले, 1,139 मौतें, 1,595 लोग घायल और बंधक बनाए जाने की 655 घटनाएं दर्ज की गईं। 74 प्रतिशत से अधिक हमले खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में केंद्रित रहे।
इस स्थिति की जड़ें मौजूदा वर्ष से कहीं अधिक पुरानी हैं। पाकिस्तान के शक्तिशाली सैन्य और खुफिया तंत्र ने दशकों से अफगानिस्तान का इस्तेमाल अपने रणनीतिक हितों के लिए किया है और अफगान तालिबान के साथ करीबी संबंध बनाए रखे हैं। उद्देश्य अफगानिस्तान में अपना प्रभाव बढ़ाना और अपनी पश्चिमी सीमा पर अनुकूल रणनीतिक माहौल तैयार करना था। लेकिन तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद पाकिस्तान को अपेक्षित रणनीतिक लाभ के बजाय TTP से बढ़ते खतरे का सामना करना पड़ा। इस्लामाबाद अब काबुल पर TTP को अफगान क्षेत्र का इस्तेमाल करने देने का आरोप लगाता है, जिसे अफगान अधिकारी खारिज करते हैं।
यह पाकिस्तान की नीतियों का स्पष्ट रणनीतिक बैकफायर है। जिस अफगान नीति को इस्लामाबाद वर्षों तक अपनी सफलता मानता रहा, वही अब उसकी अपनी सीमा पर अस्थिरता का स्रोत बन गई है।
बलूचिस्तान की समस्या अलग है, लेकिन राज्य की विफलता की प्रकृति कुछ हद तक समान है। राजनीतिक उपेक्षा, संसाधनों के बंटवारे को लेकर विवाद, विकास की कमी और जबरन गुमशुदगी के आरोपों ने प्रांत और संघीय सरकार के बीच अविश्वास को गहरा किया है। इस्लामाबाद ने इन शिकायतों के राजनीतिक समाधान के बजाय सुरक्षा उपायों पर अधिक भरोसा किया है। परिणामस्वरूप, BLA अब भी राज्य के लिए एक बड़ी चुनौती है, जबकि चीनी हितों और CPEC से जुड़ी परियोजनाओं को भी सुरक्षा खतरों का सामना करना पड़ा है। बलूचिस्तान में राज्य की कमजोरी केवल सुरक्षा नीति की विफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक शासन की भी विफलता है।
खैबर पख्तूनख्वा और पूर्व FATA इसी गलत दृष्टिकोण का एक और उदाहरण हैं। सैन्य अभियानों ने TTP को अस्थायी रूप से पीछे धकेला, लेकिन टिकाऊ राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक आधार पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं किए गए। परिणामस्वरूप TTP अपनी मौजूदगी फिर मजबूत करने में सफल रहा। इससे स्पष्ट होता है कि किसी क्षेत्र को सैन्य बल के जरिए नियंत्रित करना और वहां एक मजबूत शासन व्यवस्था स्थापित करना एक ही बात नहीं है।
पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था को भी इस संकट से अलग नहीं किया जा सकता। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान अब भी जेल में हैं, जबकि 2025 में किए गए संवैधानिक बदलावों ने सैन्य नेतृत्व की भूमिका और शक्तियों के महत्व को और बढ़ा दिया। आलोचकों का कहना है कि इन बदलावों ने नागरिक संस्थाओं पर सैन्य प्रभाव को और मजबूत किया है, जबकि सरकार इन्हें आवश्यक सुधार बताती है।
जब शक्तिशाली सैन्य और खुफिया संस्थान राष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा नीति पर असामान्य प्रभाव रखते हैं, तो लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर होती हैं और राजनीतिक असहमति को तेजी से सुरक्षा के मुद्दे के रूप में देखा जाने लगता है। ऐसे माहौल में राजनीतिक विवादों को बातचीत और संस्थागत सुधारों के जरिए हल करना और भी कठिन हो जाता है।
पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति को केवल बाहरी कारकों या TTP और BLA जैसे संगठनों की कार्रवाइयों के लिए जिम्मेदार ठहराकर पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। अफगान तालिबान के साथ लंबे समय से चले आ रहे संबंध, अतीत में इस्लामी सशस्त्र नेटवर्क के प्रति अपनाया गया रणनीतिक दृष्टिकोण, बलूचिस्तान में राजनीतिक उपेक्षा, पूर्व FATA में कमजोर शासन और नागरिक संस्थानों पर बढ़ता दबाव इस स्थिति के सभी महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

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