वसीम अकरम त्यागी

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के एक शादी हॉल में आईएसआईएस के आतंकवादी ने घुसकर खुद को बम से उड़ा लिया। इस हमले में 63 लोगों की मौत हो गई जबकि 182 लोग जख्मी हो गए हैं। जिस हॉल में लोग खुशी खुशी एक दूसरे से मिल रहे थे वहां पल भर में मातम छा गए, फर्श पर खून के धब्बे और दीवारों पर मांस के चिथड़े चिपक गए।

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जिस इलाक़े में यह घटना हुई वह शिया बहुल इलाक़ा है। खुद को बम से उड़ा लेना आसान काम नही है. सोचिए जिस इंसान ने जिस्म पर बम बांधकर इस घटना को अंजाम दिया है उसे ब्रेन वॉश किस स्तर पर तक किया होगा? जिस वर्ग के लोगों का क़त्ल किया गया है उस वर्ग के ख़िलाफ कितनी नफरतें और प्रोपगेंडे फैलाए गए होंगे ताकि उस वर्ग के लोगों के क़त्ल को तर्कसंगत ठहराया जा सके।

अगर कोई मुसलमान सिर्फ यह समझ रहा है कि काबुल में मरने वाले शिया है, और यह हमला शियाओं पर है तो वह शतप्रतिशत गलत है, यह हमला किसी शिया या सुन्नी पर नही बल्कि इस्लाम पर है। मुस्लिम समाज को ऐसे लोगों, ऐसे फिरकों को चिन्हित करना होगा जो एक दूसरे के ख़िलाफ लोगों को ज़ेहन में नफरतें भरते हैं। भारत इस तरह की लड़ाई से अभी तक सुरक्षित है मगर सवाल है कि कब तक ? यहां भी एक दूसरे फिरकों को काफिर कहने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है, पहले काफिर, फिर मुर्तद और उसके बाद वाजिबुल क़त्ल तक की नौबत आ जाती है। अफगान हो या पाकिस्तान इन देशों में तो ऐसा ही हुआ है।

सवाल यह है कि एक दूसरे को काफिर कहकर कत्ल करने की आज़ादी भी क्या इस्लाम ने किसी को दी है ? नहीं… तो फिर पूरी दुनिया के वे उलमा जिन पर मुसलमानों की ज़िम्मेदारियां हैं वे आगे आकर इसका खंडन क्यों नहीं कर रहे हैं? क्या उन्हें फिरकों के नाम पर आईएसआईएस के लड़ाकों के हाथों मरते हुए इंसान दिखाई नहीं देते?

(लेखक हिन्द न्यूज़ से जुड़े हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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