मुकुल सरल

केंद्र सरकार, 8 दिसंबर के भारत बंद को लेकर ज़रा भी चिंतित नहीं दिख रही है, किसानों को मनाने की कोई कोशिश नहीं कर रही है, बल्कि जब कल किसानों ने कहा कि 9 दिसंबर को बात करेंगे तो मंत्रियों ने मान लिया कि हां 9 दिसंबर को बात करेंगे, क्यों नहीं मंत्रियों ने ये अपील की कि आप बंद में मत जाइए, हम आपकी बात उससे पहले ही सुनने या मानने को तैयार हैं। हम 6 या 7 को फिर बैठते हैं। लेकिन नहीं मंत्रियों ने कहा ठीक है भारत बंद के बाद 9 तारीख़ को बैठते हैं। ऐसे जैसे भारत बंद कोई प्रतिरोध, कोई आंदोलन न होकर कोई पिकनिक या शादी-ब्याह का मामला हो कि चलो पहले ये निपटा लो फिर बात करते हैं।

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इसी बात से शक़ पैदा होता है। इसी बात को वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश जी ने भी रेखांकित किया, यही बात मुझे लगातार परेशान और चिंतित कर रही है कि सरकार की मंशा आख़िर है क्या? उसका मंसूबा क्या है, क्या प्लान है, क्या परियोजना है? क्या सरकार अब तक नहीं समझी कि किसान क्या चाह रहे हैं या यह नहीं समझी की किसानों को पूरे देश का समर्थन हासिल है या फिर कोई और ही योजना है?

क्या सरकार भारत बंद के बहाने किसानों की ताक़त और समर्थन को तौलना चाहती है कि उसके अनुसार ही समझौते के लिए आगे बढ़ा जाएगा या फिर किसी ग़लती की तलाश में है, कि कोई ग़लती हो या कराई जाए यानी ‘ग़लती प्लांट’ की जाए और फिर किसानों का आंदोलन को बर्बरता से कुचल दिया जाए। जैसे पिछले कई आंदोलनों में हो चुका है। दलित-पिछड़ों, छात्रों के आंदोलन और सीएए विरोधी आंदोलनों को इसी तरह कुचला या पीछे धकेला गया। दिल्ली दंगें तो सबको याद ही होंगे। जिनपर सबसे ज़्यादा हिंसा हुई, जिनका सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ, वही आज उस हिंसा के आरोपी हैं। तमाम आंदोलनकारी, समाजसेवी थाना-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं या फिर जेलों में हैं। भीमा-कोरेगांव मामले में भी यही हुआ। हमारे देखते ही देखते तमाम बुद्धिजीवी, लेखक, कवि, पत्रकार जेलों में डाल दिए गए। एक बूढ़े मानवाधिकार कार्यकर्ता को एक स्ट्रा, एक सिपर के लिए भी किस कदर परेशान किया गया। कोई सोच सकता है कि किसी बीमार बुजुर्ग को पानी आदि पीने के लिए एक स्ट्रा, एक सिपर उपलब्ध कराने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देनी पड़े।

ये सब गुज़रे ज़माने की बातें नहीं हैं, हमारे आंखों के सामने ये सब हो रहा है। हमने देखा कि किस तरह बीमार लोगों को कोरोना जेहादी बता दिया गया और हत्या के प्रयास के तक के मामले दर्ज कर लिए गए। या फिर कोरोना और सुप्रीम कोर्ट की आड़ लेकर कुछ किया जाएगा। क्योंकि कोरोना और आम आदमी की परेशानी के नाम पर रोड खाली कराने के लिए फिर ‘उनके’ कई सिपाही सुप्रीम कोर्ट का रुख कर चुके हैं। हो सकता है कि सोमवार, मंगलवार तक कोई ‘चिंता भरा’ आदेश भी आ जाए। या फिर यहां या वहां कहीं भी कुछ अच्छा-बुरा हो जाए या करा दिया जाए। कुछ ऐसे किसान नेताओं को ही मैनेज कर लिया जाए, जो अब तक इस आंदोलन का पूरी तरह हिस्सा नहीं बने हैं, या किसानों के प्रति जिनकी प्रतिबद्धता पहले भी संदिग्ध रही है, उन्हीं के नाम पर एक बड़ी बाज़ी लगाए जाए। कुछ तोड़फोड़, कुछ बदनामी कर इस आंदोलन को सिर्फ पंजाब का आंदोलन बताकर एक बार फिर कुचलने की कोशिश हो।

क्योंकि बात तो बहुत आगे बढ़ चुकी है और सरकार को समझ नहीं आ रहा कि वह अब इससे कैसे बाहर निकले। इतना तो लगभग तय है कि सरकार तीनों कानूनों को वापस तो लेने नहीं जा रही। अगर ऐसा होता तो मोदी जी अभी तक किसान की दशा को लेकर आंसू बहा चुके होते। कह चुके होते कि उनका दिल हमेशा किसानों के लिए धड़कता है, या मैं हमेशा से किसान बनना चाहता था…आदि…आदि लेकिन नहीं वे एक तरफ बातचीत के लिए अपने मंत्रियों को भेजते हैं दूसरी तरफ अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी से लाइव टेलीकास्ट के जरिये ये बताने की कोशिश करते हैं कि ये कानून तो बहुत बढ़िया हैं, किसान हित में हैं, बस किसान ही नहीं समझ रहे, वे भ्रम में हैं, उन्हें कोई गुमराह कर रहा है, आदि..आदि।

कानून वापसी या बड़े संशोधन की कोई मंशा होती तो कल, पांचवें दौर की बातचीत से पहले वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ये बयान न देती कि इन कानूनों को सभी हितधारकों से बातचीत करके बनाया गया है और कानून बहुत अच्छे हैं। ख़ैर, कई कारण हैं कि हमें सरकार की नीयत पर शक़ है। क्योंकि हम देख चुके हैं कि किसान आंदोलन के शुरू होते ही उसके मंत्री, उसकी ट्रोल आर्मी और उसका समर्थक गोदी मीडिया किस तरह इसे कभी विपक्ष की साज़िश, कभी खालिस्तानी और कभी विदेशी साज़िश बताकर बदनाम करने की कोशिश कर चुका है और आज भी प्रयासरत है यह कहकर कि सरकार तो नरम पड़ गई है, लेकिन किसान ही अड़े हैं।

केंद्र सरकार यानी भारत सरकार, हमारी भारत सरकार अगर भारत बंद को लेकर ही सीरियस नहीं है, नहीं चाहती कि किसान बंद न करने पर मान जाएं, इस दिशा में कोई कोशिश ही नहीं कर रही है तो फिर वो चाहती क्या है, हमें शक़ है कि यक़ीनन कुछ गड़बड़-घोटाला है। इसलिए आंदोलनकारियों को अब बहुत सावधान रहने की ज़रूरत है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, यह लेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है)

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