नई दिल्ली : लेखक द्वय दिलीप पाण्डेय व चंचल शर्मा की बच्चों पर लिखी गई किताब ‘टपकी और बूँदी के लड्डू’ का उर्दू अनुवाद हो चुका है और जल्द ही ये किताब उर्दू में भी प्रिंट होने जा रही है। सदब फातिमा ने ‘टपकी और बूँदी के लड्डू’ किताब का उर्दू में अनुवाद किया है। बुधवार को संजय सिंह, प्रसिध्द हिंदी लेखक अशोक पाण्डेय, उर्दू के महान साहित्यकार व ‘गुल बूटे’ मैगजीन के संपादक फारूख सैयद साहब और लेखिका पूनम शर्मा की मौजूदी में कांफ्रेस कॉलिंग के जरिये लेखक दिलीप पाण्डेय और सह-लेखिका चंचल शर्मा की किताब ‘टपकी और बूँदी के लड्डू’ पर चर्चा की गई और साथ ही इसके उर्दू संस्करण के विमोचन की भी घोषणा की गई। ‘अंजुमन तरक्की उर्दू’ के फेसबुक पेज से तालीफ हैदर ने कार्यक्रम का संचालन किया।

बाल साहित्य पर चर्चा करते हुए राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि ये दुनिया बच्चों की मासूमियत और निश्छलता से बची हुई है। तमाम उलझनों, मुश्किलों और उठापटक के बीच तुतलाती आवाज़ में खनकते शब्द हमें इंसान बनाये रखते हैं। कहानियों की दुनिया के किरदार असल जिंदगी के ये छोटे-छोटे मासूम से बच्चे ही हैं, जो सच-झूठ, अच्छा-बुरा, सही-गलत की भूल-भुलैया से दूर अभी भी मुस्कुराते हैं। छोटी-छोटी बातों पर रो देते हैं, मामूली सी बातों पर हंस देते हैं। टपकी भी आपकी और हमारी दुनिया के बच्चों की तरह आम सी बच्ची है। वो गलतियों से अछूती नहीं है। बहाने भी बनाती है और मुंह भी। हँसती भी है और हंसाती भी है। 15 कहानियों में न सिर्फ टपकी, बल्कि इस दौर के हर एक बच्चे के जीवन को टटोला गया है। दिलीप पाण्डेय और चंचल शर्मा को बहुत-बहुत बधाई।

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लेखक दिलीप पाण्डेय ने ‘अंजुमन तरक्की उर्दू’ कांफ्रेंस कॉल में शामिल सभी साथियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि सितंबर 2019 में राजकमल प्रकाशन द्वारा यह किताब हिंदी में प्रकाशित हुई थी। औपचारिक रूप से घोषणा करते हुए मुझे खुशी हो रही है कि तालीफ हैदर जी और सदब फातीमा जी के सहयोग आज इसका उर्दू अनुवाद हो चुका है और ये किताब उर्दू में भी प्रिंट होने जा रही है। उन्होंने कहा कि बच्चों की किताब लिखने के लिए हमें अपने अतीत की यात्रा करनी पड़ती है, या कह ले हमे बच्चा बनना पड़ता है। अगर आप उस अनगढ़-पन को नहीं बचा पाये तो आप बच्चों के लिए नहीं लिख पायेगें। इस किताब को लिखने के लिए

15 से भी ज्यादा बच्चों से हमने बातचीत की, उनके विचारों को जाना और फिर ये किताब हमने गढ़ी। लेकिन फारूक साहब की बात की जाये तो वो इस तरह की किताबों को बहुत मजे से लिखते है। फारुख साहब को दिल से सलाम है मेरा। दिलीप पाण्डेय ने बताया कि ‘टपकी और बूंदी के लड्डू’ में बच्चों के लिए छोटी-छोटी कहानियों को संकलित किया गया है। इसका मुख्य किरदार टपकी है। जिसके जरिए समाज के बीच से कुछ सवालों को जवाब देने की कोशिश की गई है। यह किताब सिर्फ बच्चों के लिए नहीं बल्कि पेरेंट्स के लिए भी है। हम टपकी के किरदार को यहीं नहीं रोकेगें, हम इस किरदार पर आने वाले समय में और भी किताबें लिख रहे है।

चंचल शर्मा ने बताया कि हमारे यहां बच्चें बहुत है और हम हमेशा बच्चों के बीच में घिरे रहते है। उनसे बात करने पर हमने देखा कि बच्चें को परफेक्ट व इम-परफेक्ट के डेफिनेशन में बंध नहीं सकते। उनकी खासियत उनकी कमियों में ही छिपी होती है। जो टपकी का किरदार है हमने इसी पर रखा है कि कोई एक दम परफेक्ट बच्चा नहीं है, कोई सुपर पावर जैसी चीज नहीं होती है। उसमें भी परफेक्शन व इम-परफेक्शन है। खासकर हमने जेंडर इक्विलिटी पर विशेष ध्यान दिया है। एक बच्चें को हमें किसी भी एक्सपेक्टेशन में नहीं दबाना चाहिए। कहानियों के जरिये हमने बच्चों को ये सारी बातें बताने की कोशिश की है।

तालीफ हैदर ने कहा कि मैंने ये किताब पढ़ी मुझे बहुत अच्छी लगी। आज के समय में बाल साहित्य पर बहुत कम किताबें लिखी जा रही है। दिलीप पाण्डेय औऱ चंचल शर्मा ने बच्चों और बड़ों दोनों अदबों पर बहुत अच्छी किताब लिखी है। और बच्चों के अदब को इन्होंने नजरअंदाज नहीं किया है ये बहुत बड़ी बात है। ये यदि उर्दू औऱ हिंदी के अदबों में पैदा हो कि बड़ों के साथ-साथ वो बच्चों के लिए भी लिखे तो हमारी सोसायटी में बहुत बड़ी तब्दीली आयेगी।

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