पुण्यतिथि विशेष: फिरोज ख़ान और विनोद खन्ना ने एक ही तारीख को मौत को गले लगाया

शमशाद रज़ा अंसारी
बॉलीवुड इंडस्ट्री में दुश्मनी के किस्से तो आये दिन सामने आते रहते हैं। यहाँ कब कौन किसका दुश्मन बन जाता है,इसका पता भी नही चलता। लेकिन ऐसा नही है कि बॉलीवुड में सिर्फ दुश्मनी ही होती है। बॉलीवुड की कुछ ऐसी दोस्ताना जोड़ियां भी रही हैं, जिनकी दोस्ती को उनके मरने के बाद भी याद किया जाता है।
इनमें से एक जोड़ी फिरोज खान और विनोद खन्ना की है। अभिनेता फिरोज खान और विनोद खन्ना की दोस्ती जगजाहिर रही है। अपनी अदाकारी से लोगों के दिलों पर राज करने वाले ये सितारे एक दूसरे के बेहद करीब थे। दोस्ती में लोगों को खुशियां और गम बांटते तो सुना होगा आपने, लेकिन इन दोनों ने तो मौत की तारीख भी एक ही चुनी, अंतर बस साल का रह गया।
फिरोज खान 27 अप्रैल 2009 को इस दुनिया से गुजरे तो विनोद खन्ना का निधन 27 अप्रैल 2017 को हुआ। इन दोनों दोस्त की मौत की वजह भी लगभग एक ही रही। दोनों ही सितारों की मौत कैंसर की वजह से हुई थी। फिरोज ख़ान को लंग कैंसर तथा विनोद खन्ना को ब्लैडर कैंसर था।

फिरोज ख़ान

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फिरोज खान का जन्म 25 सितम्बर,1939 को बंगलौर में हुआ था। उनके पिता पठान थे जबकि माता ईरानी। फिरोज ख़ान के अलावा उनका परिवार भी फिल्मों से जुड़ा रहा। उनके भाई संजय ख़ान तथा अकबर खान ने अभिनय में अपने हाथ आजमाए। तीसरे भाई समीर खान ने फ़िल्म निर्माण का क्षेत्र चुना।
फिरोज खान ने वर्ष 1960 में फ़िल्म दीदी से अपनी फ़िल्मी सफर शुरू किया। दर्जनों फ़िल्मों में अभिनय किया। कई फ़िल्में निर्देशित कीं। इसके अलावा भी कई भूमिकाओं से जुड़े रहे।
कुछ चुनिंदा फिल्मों में ही काम करके फिरोज खान ने इतना नाम कमाया, जिसके लिए कई अभिनेता सालों मेहनत करते रहते हैं। फिरोज हर रोल में फिट रहे फिर चाहे फिल्मों में एक हैंडसम हीरो की भूमिका हो या खूंखार विलेन का रोल। वो आखिरी बार फिल्म ‘वेलकम’ में नजर आए थे।
फ़िरोज़ ख़ान ने हम सब चोर हैं, जमाना, बड़े सरकार, मिस्टर इंड‍िया, सुहागन, आरजू, सीआईडी 909, आदमी और इंसान, सफर, धर्मात्मा, काला सोना, नागिन, जांबाज, यल्गार, जानशीं, एक ख‍िलाड़ी एक हसीना, वेलकम समेत कई फिल्मों में यादगार किरदार निभाए।

विनोद खन्ना

विनोद खन्ना का जन्म एक व्यापारिक परिवार में 6 अक्टूबर 1946 को पेशावर (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। उनका परिवार अगले साल 1947 में हुए विभाजन के बाद पेशावर से मुंबई आ गया था। उन्होंने अपने फ़िल्मी सफर की शुरूआत 1968 में आयी फ़िल्म “मन का मीत” से की। जिसमें उन्होंने एक खलनायक का अभिनय किया था। शुरूआती दौर में फ़िल्मों में उन्होंने सहायक और खलनायक का क़िरदार निभाया। 1971 में उनकी पहली एकल हीरो वाली फ़िल्म हम तुम और वो आई।


विनोद खन्ना के पुत्र अक्षय खन्ना एवं राहुल खन्ना भी अभिनेता हैं।
विनोद खन्ना ने ‘मेरे अपने’, ‘इंसाफ’, ‘परवरिश’, ‘मुकद्दर का सिकन्दर’, ‘कुर्बानी’, ‘दयावान’, ‘मेरा गांव मेरा देश’, ‘चांदनी’, ‘द बर्निंग ट्रेन’, ‘अमर अकबर एंथनी’ जैसी फिल्मों में यादगार भूमिका निभाई। उन्हें भारत सरकार ने 2018 में दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया।

दोस्ती

पहली बार 1976 में रिलीज हुई ‘शंकर शंभू’ में फिरोज खान और विनोद खन्ना ने एक साथ अभिनय किया था। इस फिल्म में दोनों की जोड़ी दर्शकों को बेहद पसंद आई थी। इसके बाद 1980 में ‘कुर्बानी’ में भी दोनों साथ नजर आए। इस फिल्म का निर्देशन फिरोज खान ने ही किया था। कुर्बानी बॉक्स ऑफिस पर बड़ी हिट साबित हुई थी। विनोद खन्ना, फिरोज ख़ान, जीनत अमान, अमजद ख़ान, अमरीश पूरी आदि के अभिनय तथा के कारण फ़िल्म ख़ूब चली। इसके गीतों ने धूम मचा दी थी।


1988 में रिलीज हुई फिल्म ‘दयावान’ में फिरोज खान और विनोद खन्ना को फिर साथ काम करने का मौका मिला। इसमें विनोद खन्ना और माधुरी दीक्षित मुख्य भूमिका में थे। फिल्म को फिरोज ने ही निर्देशित किया था। जिस समय विनोद खन्ना का कैरियर बुलन्दी पर था तो उस समय वो ओशो आश्रम चले गए, जिसके बाद 1986 में वो बॉलीवुड में वापसी करना चाहते थे। यहाँ पर फिर एक बार दोस्त ने उन्हें लेकर फ़िल्म बनाने का बीड़ा उठाया। फिरोज खान ने उनकी मदद की और ‘दयावान’ फिल्म बनाई।


फ़िरोज़ ख़ान के निधन से कुछ दिन पहले विनोद खन्ना धर्मेंद्र के साथ उनसे मिलने मुंबई के उस अस्पताल में गये थे, जहां वो भर्ती थे। बताते हैं कि मुलाक़ात के दौरान तीनों फूट-फूटकर रोये थे। धर्मेंद्र ने दोनों ही कलाकारों के साथ फ़िल्में की थीं।

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