नई दिल्ली : एनडीए से उसके सहयोगी दल अलग क्यों होते जा रहे हैं ? इनमें शिरोमणि अकाली दल और शिवसेना जैसे बीजेपी के सबसे पुराने सहयोगी दल भी शामिल हैं जिन्हें हर सुख-दुख में बीजेपी का साथी समझा जाता रहा था, दो दिन पहले ही कृषि विधेयकों पर एनडीए का साथ छोड़ने वाले शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल की मानें तो एनडीए में सहयोगी दलों की बात ही नहीं सुनी जाती है, बादल ने साफ़ तौर पर कहा है कि एनडीए सिर्फ़ नाम का है, कुछ ऐसे ही आरोप शिवसेना और टीडीपी ने भी तब लगाए थे जब उन्होंने एनडीए का साथ छोड़ा था, तो सवाल है कि क्या सहयोगी दलों के साथ बीजेपी ‘मनमानी’ करती है या फिर इन क्षेत्रियों दलों की अपनी कोई और सियासी मजबूरी है ?

कृषि विधेयकों के मुद्दे पर ही बीजेपी का सबसे पुराना साथी रहे शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल ने एनडीए छोड़ने के कारण बताए हैं, ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘पिछले 7, 8, 10 साल या इससे ज़्यादा समय से एनडीए सिर्फ़ नाम का है, एनडीए में कुछ भी नहीं है, कोई चर्चा नहीं, कोई योजना नहीं, कोई बैठक नहीं, मुझे पिछले 10 वर्षों में एक दिन भी याद नहीं है जब प्रधानमंत्री ने एनडीए की बैठक बुलाई, जिसमें उन्होंने चर्चा की कि उनके मन में क्या है, गठबंधन कागज पर नहीं होना चाहिए… इससे पहले, वाजपेयी के समय में बढ़िया संबंध हुआ करता था, मेरे पिता एनडीए के संस्थापक सदस्य हैं… यह दुखद है कि हमने एनडीए बनाया लेकिन एनडीए आज नहीं है.’

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बादल ने अकाली दल द्वारा राज्य में गठबंधन धर्म का पालन किए जाने की बात करते हुए कहा कि राज्य में अकाली दल बड़ी पार्टी है फिर भी वह बीजेपी को साथ लेकर चला, इस बात पर कि गठबंधन में उन्हें दूरदर्शिता दिखानी चाहिए थी, बादल ने कहा कि यह पार्टी की एकमत राय थी क्योंकि जब हरसिमरत कौर ने मोदी कैबिनेट से इस्तीफ़ा दिया था तो हमने पार्टी की बैठक बुलाई और उसमें एनडीए से अलग होने का फ़ैसला लिया गया, 12 दिन पहले ही अकाली दल ने मोदी मंत्रिमंडल से अलग होने का फ़ैसला लिया था और तब हरसिमरत कौर ने इस्तीफ़ा दे दिया था, विवादास्पद तीन कृषि विधेयकों पर असहमति व्यक्त करते हुए अकाली दल ने शनिवार देर शाम को एनडीए से अलग होने की घोषणा की.

हालाँकि, पार्टी पर तो आरोप ये लग रहे हैं कि अकाली दल इसलिए एनडीए से अलग हुआ है क्योंकि राज्य में उसके वोट बैंक के छिटकने का डर है, इन आरोपों में भी कुछ सच्चाई लगती है क्योंकि शुरुआत में जब कृषि विधेयक से महीनों पहले इस पर अध्यादेश लाया गया था तब अकाली दल ने इसका विरोध नहीं किया था, लेकिन जब किसानों ने ज़बरदस्त विरोध करना शुरू किया तो अकाली दल भी किसानों के साथ खड़ी हो गई, संसद में जब कृषि विधेयक लाये गये तो पार्टी एनडीए से अलग हो गई.

अब ऐसे में यह तर्क भी दिया जा सकता है कि यदि सहयोगी दल को उसके वोट बैंक के छिटकने का डर है तो गठबंधन की बड़ी पार्टी ने क्या इसका ध्यान रखा कि उसे विश्वास में लिया जाए, हरसिमरत कौर के इस्तीफ़े के बाद से ही अकाली दल आरोप लगाता रहा है कि कृषि विधेयक पर उसे विश्वास में नहीं लिया गया, और अब सुखबीर बादल ने यह आरोप लगाया है कि एनडीए में किसी मुद्दे पर चर्चा ही नहीं होती है.

रिपोर्ट सोर्स पीटीआई

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