नई दिल्ली : गोरखपुर अस्पताल त्रासदी के डॉक्टर कफ़ील ख़ान ने डीआरओआई (DROI ) यूरोपीय संसद की मानव अधिकारों पर उपसमिति को पत्र लिखा है। इस पत्र में डॉक्टर कफ़ील ख़ान ने कहा है कि इलाहबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद मैं तो जेल से बाहर आ गया हूं लेकिन अभी भी बहुत सारे लोग बेगुनाह होने के बावजूद जेल में बंद हैं। कफ़ील ने इस पत्र में कहा है कि सरकार की आलोचना करने वाले छात्र, समाजिक कार्यकर्ताओं को सरकार द्वारा यूएपीए एंव एनएसए जैसी संगीन धारा लगाकर अभी भी जेल में बंद किया हुआ है।

जानकारी के लिये बता दें कि यूरोपीय संसद की मानव अधिकारों पर उपसमिति द्वारा भारत के गृह मंत्री को 28 मई को एक पत्र लिखा गया था। इस पत्र में उन छात्रों, एंव एक्टिविस्टों की रिहाई की मांग की गई थी जिन्हें सीएए के विरोध में आंदोलन करने के ‘जुर्म’ में गिरफ्तार करके जेल में डाला हुआ है। इतना ही नहीं इस पत्र में बाकायदा उन लोगों के नाम भी लिखे हुए थे जो सीएए के खिलाफ आंदोलन करने के बाद गिरफ्तार किये गए हैं। इसमें ख़ालिद सैफ़ि, शर्ज़ील इमाम, मीरन हैदर, अखिल गोगोई, गौतम नवलखा, प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े और डॉक्टर कफ़ील की रिहा करने की मांग की गई थी।

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ग़ौरतलब है कि एक सितंबर को डॉक्टर कफ़ील ख़ान को इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद मथुरा जेल से रिहा कर दिया गया था। अब डॉ. कफ़ील ने यूरोपीय यूनियन की समिति को पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने उमर ख़ालिद और प्रशांत कन्नोजिया का नाम भी जोड़ दिया है। कफ़ील ने इस पत्र में लिखा है कि भारत की सरकार यूएपीए, और देशद्रोह जैसी धाराओं का दुरुपयोग कर रही है। उन्होंने कहा कि यूरोपीय यूनियन के दख़ल के बाद भी जेल में बंद संजीव भट्ट, ख़ालिद सैफ़ि, शर्ज़ील इमाम, मीरन हैदर, अखिल गोगोई, स्टेन स्वामी, गौतम नवलखा, प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े को रिहा नहीं किया गया है। बल्कि उमर ख़ालिद और प्रशांत कन्नोजिया को भी गिरफ्तार करके जेल भेज दिया है।

डॉक्टर कफ़ील ने कहा कि भारत में हाशिये पर पड़े समाज की आवाज़ उठाना अब जुर्म जैसे हो गया है। आवाज़ उठाने वालों के खिलाफ सरकार द्वारा पुलिस बल का प्रयोग करके एनएसए तक लगा दिया जाता है। यह अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार मानकों का उल्लंघन करता है। डॉक्टर कफ़ील ख़ान ने कहा कि जेल में मुझे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया, कई दिनों तक भोजन और पानी से वंचित रखा गया, और मथुरा जेल में सात महीने के उत्पीड़न के दौरान अमानवीय व्यवहार किया गया। सौभाग्य से, माननीय उच्च न्यायालय द्वारा मेरे ऊपर उत्तर- प्रदेश सरकार द्वारा लगाये गये NSA और तीन बार NSA की अवधी बढ़ाने को भी खारिज कर दिया गया और एनएसए की पूरी प्रक्रिया को भी अवैध करार दिया गया।

उन्होंने कहा कि मेरा विश्वास है जब हमारे देश में COVID-19 कहर ढा रहा है, बोलने की स्वतंत्रता को दबाने के लिए विवेकाधीन शक्तियों का उपयोग करने के बजाय महामारी से लड़ने के लिए वास्तव में सभी शक्ति और साधनों को शामिल करना आवश्यक है। उन्होंने इस पत्र में कहा कि मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मै इस शासन द्वारा बनाई गई बाधाओं की परवाह किए बिना मेरी पवित्रता, भक्ति और मेरे देशवासियों की सेवा के लिए दृढ़ संकल्प रहूँगा।

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