लखनऊ (यूपी) : राजधानी गांव के राम चन्द्र इंटर कालेज परिसर में दूरदर्शन और आकाशवाणी के चर्चित लोकगायक राम प्रसाद साहेब ने सरोकारी प्रस्तुति दी। देशभक्ति से सराबोर पिंकी और प्रीति के नृत्य ने खूब तालियां बटोरी।

‘चौरी चौरा जन विद्रोह का शताब्दी वर्ष’ सेमिनार में बोलते हुए वरिष्ठ दस्तावेजी फोटो पत्रकार सुनील दत्ता ने कहा कि गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए दुनिया के अन्य देशों की भांति भारत का भी किसान मजदूर आंदोलित हुआ

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जिसकी असर चौरी चौरा एक्शन में देखने को मिलता है इसकी तुलना उन्होंने 14 जुलाई 1789 के फ्रांस के निरंकुशता के प्रतीक बास्टिल पर आंदोलकारियों ने कब्जा कर लिया था। उससे की जा सकती है।

क्रांतिकारी विचारक धीरेंद्र प्रताप ने कहा कि जहां भी शहीदों का नाम आता हैं। हम सर झुका कर नमन करते हैं। जब हम चौरी चौरा जाते हैं तो देखते हैं वहां ब्रिटिश पुलिस वालों का शहीद स्मारक बना है।

हम गुलामी के प्रतीकों को आजाद भारत में पीठ पर लादकर नहीं ढो सकते हैं।आज हमारे देश मे बहुत आंदोलन चल रहे हैं। पुलिस उनको मार रही हैं। ठीक वैसे ही जैसे 4 फरवरी 1922 को  अंग्रेजो के पुलिस मार रही थी। फिर कौन पुलिस देश के साथ गद्दारी कर रही थी यही सवाल हैं?

डॉक्टर धनंजय यादव ने संबोधित करते हुए कहा कि सन 1921 का दौर किसान मजदूर के आंदोलन का दौर रहा है इस समय का किसान अपने हक हकूक की लड़ाई ब्रिटिश हुकूमत के साथ स्थानीय जमीदारों के शोषण के खिलाफ भी गोलबंद थे।

देश के अन्य हिस्सों के साथ ही चौरी चौरा में अपने दीन हीन दशा के खिलाफ विद्रोह पर उतारू हो गया। जिसका आक्रोश का असर तत्कालीन चौरी चौरा थाना भवन पर हुआ था।

जंग ए आजादी आंदोलन पर शोध करने वाले रुद्र प्रताप ने कहा कि चौरी चौरा की जनता शराब, विदेशी कपड़े के खिलाफ स्वदेशी को समर्थन कर रही थी। ब्रिटिश पुलिसिया अत्याचार ने जनता के आक्रोश में घी डालने का काम किया। इतिहास बताता है कि अत्याचार चौरी चौरा जैसे क्रांतिकारी इतिहास को दोहरा सकता है।

क्रांतिकारी चिंतक अविनाश गुप्ता ने कहा कि आज हम सब लोग संकल्प लेते हैं कि चौरी चौरा कांड को हम कांड नही जन विन्द्रोह कहेंगे। क्योंकि यह कांड नही जन विद्रोह था। उन्होंने कहा कि यह जन आंदोलन किसी एक विशेष का नही इसमें सभी वर्ग के लोग शामिल हुए थे।

चौरी चौरा जन विद्रोह जन आंदोलन डुमरी खुर्द से निकल कर विश्व के इतिहास में दर्ज हो गया। हीरालाल यादव ने कहा कि आजादी मिली लेकिन हम आजादी को किस तरफ ले जा रहे यह समझना होगा। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि हम वीर सपूतों को याद करते हैं और उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर हम सभी को जरूर चलना चाहिए।

सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए सामाजिक विचारक परुषोत्तम त्रिपाठी ने अपने संबोधन के दौरान अध्यक्षीय भाषण में त्रिपाठी ने कहा कि “चौरीचौरा विद्रोह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की नींव है, उसे ही आधार बना कर आगे के आंदोलन होते रहे।

चौरी चौरा ऐसा संघर्ष जिसमें राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा दी। हमे अपने अंतर्विरोधों को दूर करने में शताब्दी वर्ष मदद करेगा।

डॉक्टर गरिमा ने अवाम के सिनेमा के पंद्रह वर्षों के सफरनामे में प्रकाश डाला। संचालन राम उग्रह यादव ने किया।

‘शहीद अब्दुल्लाह’ पर नाटक का हुआ मंचन

नाटक के जरिए जनपद के ब्रह्मपुर ब्लॉक अंतर्गत राजधानी गांव निवासी क्रांतियोद्धा अब्दुल्लाह के संघर्ष को उकेरा गया। अब्दुल्लाह टोकरी में कांच की चूड़ियां लेकर गांव-गांव बेचते थे। उसी से उनके परिवार का जीविकोपार्जन होता था। असहयोग आंदोलन की चर्चा शुरू हुई तो अब्दुल्लाह फ़रवरी 1921में महात्मा गांधी का भाषण सुनने भगवान अहीर,विक्रम और नजर अली के साथ गोरखपुर गए थे।

अब्दुल्लाह इसके बाद जल्द ही पत्नी तीलिया और 2-3 साल के बेटे रसूल को छोड़कर अहमदाबाद कमाने चले गए। दिसम्बर 1921 में वहां कांग्रेस अधिवेशन में स्वयं सेवक के रूप में मुस्लिम मेस में काम किया।

अब्दुल्लाह अधिवेशन में हुई चर्चा से प्रभावित थे।वहीं उन्हें रूसी क्रांति और मजदूरों किसानों के राज्य की स्थापना की जानकारी मिली।

मजदूर किसान के राज का स्वप्न लिए अब्दुल्लाह अपने गांव राजधानी आए।

विद्रोही विक्रम अहीर,भगवान अहीर और कोमल पहलवान थे। उस दौर के 40-50 किलोमीटर के पहलवानों में आपसी सम्बन्ध थे। डूमरी खुर्द के अखाड़े को नजर अली चलाते थे। सहुआकोल के कोमल पहलवान चौरी चौरा विद्रोह के समय थाने में थे।

कोमल पहलवान पहले व्यक्ति है जो जेल से भागने में सफल हो गए लेकिन पुनः मुखबिरी के बाद इनकी गिरफ्तारी हो गई। 1924 के गर्मियों में इनकी फांसी हो गई।

अब्दुल्लाह और कोमल की अपने अपने इलाके के जमींदारों से अदावत थी।ये लोग सामंतों के उत्पीड़न के शिकार थे। लाल मोहम्मद ,नजर अली ,भगवान अहीर सबसे पहले नेशनल वालिंटियर बन गए थे।

राजधानी मंडल के अध्यक्ष अब्दुल्लाह थे।13 जनवरी,1922 को डूमरी खुर्द में मण्डल स्थापना के बाद दूसरी मीटिंग 4 फरवरी शनिवार को होनी थी। भगवान अहीर की थानेदार गुप्तेश्वर सिंह से पिटाई के बाद स्वयं सेवक बहुत आहत थे।

विद्रोहियों की भीड़ 4 फरवरी को दोपहर 1 बजे किसानों के नेतृत्व में दो हजार से ज्यादा गांव वालों ने थाने को घेर लिया।ब्रिटिश सत्ता के लंबे अपमान और उत्पीड़न की प्रतिक्रिया में उन्होंने थाना भवन में आग लगा दी। जिसमें छुपे 24 सिपाही जल कर मर गए थे।

उसके बाद ब्रिटिश हुकमत ने जबरदस्त तांडव शुरू हुआ। फिरंगी सरकार का दमन चला जिसमें एक – एक करके  विद्रोही  गिरफ्तार हुए।

आदालती कार्यवाही के बाद 19 आंदोलनकारियों को सजा ए मौत के बाद विभिन्न जेलों में  फांसी दे दी गई। तमाम को विभिन्न सजाए हुई। मुकदमा अब्दुल्लाह व अन्य बनाम ब्रिटिश हुकमत के नाम से चला।

राजधानी निवासी अब्दुल्लाह के गिरफ्तारी के समय उनके बेटे रसूल की उम्र 4-5 साल की थी। पत्नी तीलिया की आंखो की रोशनी धीरे- धीरे चली गई। उनका और घर परिवार का जबर्दस्त उत्पीड़न हुआ। अब्दुल्लाह की फांसी बाराबंकी के जिला कारागार में 3 जुलाई 1923 को प्रातः 6 बजे हुई थी।

 बाराबंकी जेल में फांसी होने के बाद तीलियां बाराबंकी गई थी लेकिन शहीद पति की लाश अपने गांव न ला सकी। नाटक में ऐसे मार्मिक दृश्य देखकर लोगों के आखों में आंसू आ गए।

छठवें चौरी चौरा फ़िल्म फेस्टिवल में दिखाई जाने वाली फिल्में

अवाम का सिनेमा द्वारा राजधानी गांव में बनाए गए ओपन थियेटर में आजादी आन्दोलन से जुड़ी इंकलाब, मोमबत्ती, चिटगांव आदि फिल्में प्रदर्शित की गई। इसके इलावा भारत के अनन्त महादेवन द्वारा निर्देशित फ़िल्म :विलेज ऑफ अ लीसर गॉड, निलिमा अब्रम्स द्वारा निर्देशित फ़िल्म : द टेंट विलेज, हेमंत कुमार महाले की : काली मिट्टी, सुरेश  की कीर्ति आदि साथ ही इटली के फिल्म निर्देशक इलिशा पिरिया की फ़िल्म : मिलानो मिलानोवैक,

माल्टा के फ़िल्म निर्देशक मौरीक मैक्लेफ़ की फ़िल्म: द रोमंस, फिलिपींस के मॉक ऑर्थर एलेक्जेंडर की फ़िल्म क्रॉसरोड्स, यूनाईटेड स्टेटस के जॉएल टुयबेर की फ़िल्म:  द शेयरिंग प्रोजेक्ट्स, यूनाईटेड किंगडम के जोरसलोव गोगोलिन की फ़िल्म : वन्स ऑन ऑल हैलोज़ इव, लुथियाना के जॉन्स सीलरोलोनी की फ़िल्म: द स्काई कम्युनिकेशन आदि फिल्में फेस्टीवल के यूट्यूब पेज पर निःशुल्क प्रदर्शित की जा रही हैं।

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