राज्य सरकार की ओर से कोरोना वायरस के खतरे को बढ़ने से रोकने के लिए लगाए गए कर्फ्यू का आज पांचवां दिन है। सरकारी दावों-घोषणाओं के बावजूद अवाम की दुश्वारियों में लगातार इजाफा हो रहा है। शहरों, कस्बों और गांवों में जिंदगी मुसलसल पटरी से उतर रही है। किसानों, व्यापारियों और छोटे-बड़े दुकानदारों को चौतरफा मार पड़ रही है। संपन्न तबके ने रोजमर्रा की चीजों की खरीदारी जुनून की हद तक जाकर आज भी की। चोर- दरवाजे खुले हैं जो उनके भंडार घरों के लिए अनाज से लेकर शराब तक, मोटी कीमत वसूल कर, मुहैया करा रहे हैं। दूसरी तरफ आम आदमी है जो 5 दिनों में ही ऐसी चक्की के पाटों में पिस रहा है, जिसकी रफ्तार रुकने की कोई उम्मीद हाल-फिलहाल नहीं दिखती।                                     

शनिवार अल सुबह का आलम: 4:00 बजे। इसे हम प्रातःकाल कहते हैं। जालंधर के वेरका रोड पर पुलिस एक 65 वर्षीय बुजुर्ग करतार सिंह को पीटती है। वह अकेले अपने घरेलू कुत्ते को रूटीन में घुमाने के लिए उसी सड़क पर गए, जहां अक्सर जाते हैं। ‘पाठ’ के साथ शवान को घुमाने की सैर उनकी रोजमर्रा की आदत में शुमार है। नाके पर तैनात पुलिस बगैर कुछ पूछे बुजुर्ग की टांगों पर लाठियां बरसाती है और कुत्ते की भी! दोनों कराहते हैं लेकिन रहम सिरे से गायब है। एक पत्रकार ( नाम जानबूझकर नहीं दिया जा रहा) अपने चैनल के लिए रिपोर्टिंग करते हुए हस्तक्षेप करते हैं और इस शर्त पर करतार सिंह को बचाते हैं कि इसकी खबर नहीं चलाएंगे/दिखाएंगे। पुलिस मुलाजिमों (जिनकी अगुवाई उनका एक अफसर कर रहा है) को आश्वस्त करने के लिए उन्हें सब कुछ अपने कैमरे से मौके पर डिलीट करना पड़ता है।                

देश दुनिया की अहम खबरें अब सीधे आप के स्मार्टफोन पर TheHindNews Android App

सुबह 8:00 बजे: गुरदीप भट्टी नाम का एक दुकानदार, जो एक कॉलोनी में राशन की दुकान करता है, रेलवे रोड स्थित थोक किराना मंडी जाता है ताकि 300 घरों के लिए आवश्यक राशन की आपूर्ति के लिए संभव हो तो वहां से खरीदारी कर पाए। 51 साल के इस गुर सिख शख्स के कंधों पर पुलिस की अंधाधुंध लाठियां चलती हैं और अब वह जेरे-इलाज है।                   

11 बजे: जालंधर के ही ज्योति चौक के पास बाप-बेटे की पुलिसिया थप्पड़ों से फजीहत की जाती है क्योंकि वे घर की बीमार महिला के लिए दिलकुशा मार्केट में आवश्यक दवाई की तलाश में आए। इसके लगभग आधा घंटा बाद एक रिक्शावाला रामलाल यादव लाठियों का प्रहार सहता है क्योंकि वह भी अपने पड़ोसी के लिए दवाई लेने आने का गुनाह करता है!                       

दोपहर 1:00 बजे: कपूरथला रोड पर एक महिला को पुलिस घर-वापसी का सख्त आदेश देती है लेकिन बेशर्म गालियों के साथ। उक्त महिला ठीक-ठाक घर से हैं और अपराध यह कि स्थानीय जोशी हॉस्पिटल जा रही थीं। अपने निकटतम परिजन की मिजाज पुर्सी के लिए।                   

दोपहर 2:30 बजे: झुग्गी-झोपड़ियों के दायरे में आने वाले एक इलाके में लोग खड़े हैं कि उन्हें ‘लंगर’ (खाना) पहुंचाने के लिए सरकारी अमला आने की घोषणा 3 घंटे पहले की गई थी। इन पंक्तियों को लिखे जाने तक उनका इंतजार बरकरार था और शायद वे नहीं जानते थे कि आला अफसरों को इसी काम के सिलसिले में तस्वीरें और कई जगह भी खिंचवानीं हैं। बेशक वे इससे भी अनजान थे कि ऐसे कतारबद्ध खड़े होकर वह वायरस का भी शिकार हो सकते हैं। संभवत: उन्हें खाना मिल गया हो लेकिन चेतना नहीं! अगर खाना नहीं मिला होगा तो खाने के लिए डंडे जरूर मिले होंगे। आजकल पंजाब की पुलिस या तो खाना देती है या मार।

शाम 4:00 बजे: अफवाहें तेज हैं। कई लोग कहते मिलते हैं कि केंद्र और पंजाब सरकार की सख्ती कोरोना वायरस से भी खतरनाक साबित हो रही है। पुराना टेलीविजन धारावाहिक ‘रामायण’ किसी काम नहीं आ रहा! पॉश कॉलोनी अर्बन स्टेट (फेज-दो) के ललित शर्मा पूछते हैं, “क्या नेट पर यह सीरियल नहीं देखा जा सकता? बच्चे तक इसे नेट पर ही देख लेते हैं। आप मीडिया वाले क्यों सरकार के इशारे पर इस बात का प्रचार कर रहे हैं?”                                                   

शाम 5:00 बजे: इन पंक्तियों का लेखक देखता है कि कुछ लोग शराब की होम डिलीवरी लेने और देने के लिए सक्रिय हैं। पुष्टि नहीं है। हाव-भाव बहुत कुछ बताते हैं। कर्फ्यू के बीच बहुत सारी चोर गलियां हैं जो इस आपदा में भी बंद नहीं हुईं। आप लाख कर्फ्यू लगाइए कैप्टन साहब! न पुलिस का छुट्टापन कहीं गया है और न ही माफिया का। कमोबेश ‘महाराजा’ (मुख्यमंत्री) कैप्टन अमरिंदर सिंह के वजीर और विधायक, जिन्हें अवाम को अपना प्रतिनिधि होने का भ्रम टूटते-टूटते टूट रहा है, वे भी मैदानी स्तर पर लगभग गायब हैं। कई तो सिरे से लापता।                                            

तो यह कोरोना वायरस के चलते पंजाब में जारी अनिश्चितकालीन कर्फ्यू के पांचवें दिन की रिपोर्टर डायरी है। सब कुछ बंद है। जिंदगी उनके लिए जरूर खड़ी हो गई है बल्कि कहिए कि स्थगित जो कहीं न कहीं रोज या हफ्ते की मेहनत के एवज में रोजी-रोटी का जुगाड़ करते हैं।                              

इस बीच रेल की पटरियों पर पैदल चलते हुए लोग भी आ-जा रहे हैं। इनमें से कइयों ने सैकड़ों किलोमीटर का फासला अपने कामकाजी मुकाम से घरों की ओर लौटने के लिए तय किया है। जाहिरन, ये वे लोग हैं जो सरकार की बुनियादी चिंता में कहीं नहीं है और जिनकी चप्पलें फटी हुई हैं। वे पत्थरों पर कैसे चलते जा रहे हैं? यह सवाल इसलिए कि तमाम विकास के बावजूद रेल की पटरियों के बीचों-बीच पत्थर होते हैं, वे भी खासे नुकीले। इन्हें क्या पता पंजाबी कवि सुरजीत पातर की पंक्तियां हैं: ‘अब घरों को लौटना मुश्किल बड़ा है/ मत्थे पर मौत दस्तक कर गई है!!’ (जाहिर है इनमें से कइयों को मौत और नीयत किसी न किसी रूप में चपेट में जरूर लेगी)। जो जिसका ईश्वर, अल्लाह-खुदा, वाहे गुरु और तमाम धर्मगुरु इनकी हिफाजत करें-इल्तजा है। इन्हें सबसे ज्यादा जरूरत प्राथमिक सुविधाओं और विज्ञान की है। यकीनन। 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here