Urdu

Epaper Urdu

YouTube

Facebook

Twitter

Mobile App

Home भारत लॉकडाउन: क्या अनुपम जैसे लंपट अंध भक्त PM मोदी की सबसे बड़ी...

लॉकडाउन: क्या अनुपम जैसे लंपट अंध भक्त PM मोदी की सबसे बड़ी ताक़त है?

 दुष्यंत कुमार का एक शेर है, 

मत कहो आकाश में कुहरा घना है

देश दुनिया की अहम खबरें अब सीधे आप के स्मार्टफोन पर TheHindNews Android App

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।

इस मुल्क में मध्यवर्ग का ऐसा कुत्सित अंध भक्त तबका पैदा हो गया है जो सरकार की हर सही-गलत नीति-काम का महिमा मंडन ही राष्ट्र सेवा मानता है और सरकार की कमियों की समीक्षा को देशद्रोह। बिना योजना के, बिना किसी तैयारी के लाखों लोगों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ की सरकार की योजना की आलोचना करे तो अनुपम खेर जैसे लंपट अंध भक्त नकारात्मकता का रोना रोने लगेंगे। परसों प्रधानमंत्री जी ने मन की बात में (वे जन की बात कभी नहीं करते, मन की ही करते हैं), लोगों से लॉक डाउन की माफी मांगी कि लोगों को तकलीफें हो रही हैं, खासकर गरीबों को। नोटबंदी के समय उन्होंने उप्र की चुनावी सभा में 50 दिन की मोहलत मांगी थी कि 50 दिन में सब ठीक न हो जाए तो उन्हें लोग चौराहे पर जूता मारें। 

अजीब प्रधानमंत्री हैं मार-काट की ही भाषा बोलते हैं, 100 दिन में काला धन वापस न लाने पर फांसी लगा देने की बात की थी। नोटबंदी का खामियाजा देश अभी तक भुगत रहा है लेकिन प्रधान मंत्री जी कभी जेड प्लस छोड़कर चौराहे पर आए नहीं। प्रधानमंत्री जी लॉक डाउन की आलोचना कोई नहीं कर रहा है, बिना सोचे, बिना योजना बनाए, संभावित प्रभावितों से बिना कोई विमर्श किए, राज्यों के साथ बिना किसी समन्वय के नोटबंदी की तरह लॉक डाउन की घोषणा से आपने मुल्क को अनिश्चितता की मझधार में डाल दिया। 

मन की बात में आपको पुलिस वालों से भी निवेदन करना था कि जो लोग बिना अन्न पानी के सामान और बीबी-बच्चों के साथ किसी यातायात के अभाव में सैकड़ों किमी की पैदल यात्रा पर निकल पड़े हैं उनके साथ पशुवत व्यवहार न करें। वीडियो में दिख रहा है कि पैदल जाते लोगों को पुलिस मुर्गा बना रही है। बरेली के एक वीडियो में दिल्ली से बरेली पहुंचे मजदूरों पर कीटनाशक छिड़क कर सैनिटाइज किया जा रहा है। राजस्थान के प्रवासी मजदूरों को मकान मालिकों ने घर से निकाल दिया है वे अधर में लटके हैं, हजारों मजदूर गुजरात से काम-काज बंद होने से भाग रहे हैं। 

सरकारी खर्च पर आप विदेशों से अमीर भारतीयों को स्वदेश वापस लाए, उसका साधुवाद, लेकिन गरीबों का भी कुछ ध्यान देना चाहिए, सुना है आप चाय बेचते थे लेकिन अडानी-अंबानी की सोहबत में गरीबी भूल गए होंगे। मैंने गरीबी और भूख पढ़ा ही नहीं जिया भी है, बहुत दिनों सुविधा संपन्न नौकरी में रहने के बाद भी गरीबी और भूख भूला नहीं हूं। 

प्रवासी मजदूर ही दिल्ली की ईंधन-पानी हैं। भूमंडलीकरण के उदारीकरण ने संगठित क्षेत्र खत्म कर दिया है ज्यादातर प्रवासी मजदूर ठेकेदारी प्रथा में हैं, दिहाड़ी करते हैं, निर्माण मजदूर हैं, रिक्शा चलाते हैं, रेड़ी-खोमचा लगाते हैं, रिक्शा चलाते हैं या छोटे-मोटे उद्योगों में काम करते हैं। वे दिल्ली या एनसीआर में 2500-5000 रुपए में 10 X10  के कमरे में 5-6 के परिवार के साथ रहते हैं या ऐसे रिक्शा चालक या दिहाड़ी मजदूर जो परिवार घर छोड़ अकेले कमाने आए हैं एक कमरे में 5-6 रहते हैं। लाक डाउन, काम-धंधा बंद। ज्यादातर रोज कुंआ खोदने-पानी पीने वाले हैं। 

केजरीवाल ने कहा वे सबके खाने का इंतजाम कर रहे हैं, लेकिन लोग बहुत ज्यादा हैं, वीडियो में केवल आनंद विहार बस अड्डे पर ही लाखों का हुजूम दिख रहा है। यह भीड़  सोशल-डिस्टेंसिंग (सामाजिक दूरी) का पालन कैसे कर सकती है?  जनवरी से ही चीन से चेतावनी मिल रही है लेकिन आपकी सरकार तो दिल्ली पुलिस के गुजरातीकरण से दंगा आयोजन में व्यस्त थी। काश! थोड़ा समय निकाल कर कोरोना प्रकोप से निपटने की पूर्व तैयारी करते। लॉक डाउन के पहले प्रभावित होने वाले पक्षों से बात करते, प्रदेश सरकारों से बात करते। लॉक डाउन घोषित करने के पहले प्रवासी मजदूरों के लिए डॉक्टरों और सेनिटाइजेसन सुविधा के साथ कुछ विशेष रेल गाड़ियां चलाते।

दिल्ली सरकार से कहते, वैसे उसे खुद ही यह करना चाहिए था कि डीटीसी की कुछ बसें चिकित्सा सुविधा के साथ प्रवासी मजदूरों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने के लिए लगा देते। राज्य सरकारों को कहते और उन्हें खुद करना चाहिए था कि शहरों से मजदूरों के घर वापसी का प्रबंध करते। सुना है झारखंड सरकार ने ऐसा किया है। मैं तो नास्तिक हूं तो इन गरीबों के उत्पीड़कों भगवान की सजा में यकीन नहीं करता, लेकिन इतना जानता हूं कि गरीब की आह बहुत खतरनाक होती है। सुनो घरों में सुरक्षित रामायण-महाभारत देख कर समय काटने वाले मध्य वर्ग तुम्हें मेरी बात बुरी लगे तो जितनी बददुआ देना हो दे लेना, शैलेंद्र के शब्दों में, “ये गम (कोरोना) के और चार दिन, सितम के और दिन ये दिन भी जाएंगे गुजर, गुजर गए हजार दिन”।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read

TIME वाली दबंग दादी हापुड़ की रहने वाली हैं, गाँव में जश्न का माहौल

नई दिल्ली : दादी बिलकिस हापुड़ के गाँव कुराना की रहने वाली हैं। टाइम मैगज़ीन में दादी का नाम आने से गाँव...

बिहार विधानसभा चुनाव : तेजस्वी यादव का बड़ा वादा, कहा- ‘पहली कैबिनेट में ही करेंगे 10 लाख युवाओं को नौकरी का फैसला’

पटना (बिहार) : बिहार विधानसभा चुनाव तारीखों का ऐलान हो गया है, 10 नवंबर को चुनावी नतीजे भी आ जाएंगे, पार्टियों ने...

हापुड़ : गंगा एक्सप्रेस-वे एलाइनमेंट बदला तो होगा आंदोलन : पोपिन कसाना

हापुड़ (यूपी) : मेरठ से प्रयागराज के बीच प्रस्तावित गंगा एक्सप्रेस-वे के एलानइमेंट बदले जाने को लेकर स्थानीय निवासियों ने विरोध जताया...

चाचा की जायदाद हड़पने के लिए “क़ासमी” बन्धुओं ने दिया झूठा हलफनामा, दाँव पर लगा दी “क़ासमी” घराने की इज़्ज़त, तय्यब ट्रस्ट भी सवालों...

शमशाद रज़ा अंसारी मुसलमानों की बड़ी जमाअत सुन्नियों में मौलाना क़ासिम नानौतवी का नाम बड़े अदब से लिया जाता...

पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह का निधन, बीते 6 साल से थे कोमा में, PM मोदी ने शोक व्यक्त किया

नई दिल्ली : दिग्गज बीजेपी नेता जसवंत सिंह का 82 साल की उम्र में निधन हो गया, पीएम मोदी ने उनके निधन पर...