अब्दुल बासित निज़ामी

कोई है इस दयार मे इन मज़दूर, असहाय गरीब, बच्चे बूढे ओर मा बहनौ के आन्सू पूछने वाला। नही ह ये हालात कह रहें हैं की झुलसाती ये तेज़ धूप की तपिश मे शीद्द्त की भूक प्यास ओर हज़ारौ मील नापते सड़कें  तुम्हारे पैरौ के छालें शायद तुम्हे सोचने पे मजबूर कर्देंगे की तुमने इस देश को गलत रास्ते ओर गलत ताक़तो के हाथो मे सोंप दिया है जो इस बात के भी गवाह हैं की यह सरकारे तुम्हारे लिया ना थी ना ह ओर ना होंगी।

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तक़्दीर बदल्ने कि सुनहरी तारीख पर तुमने कुछ ना देखा, देखा तो बस एक झूट से लरजते हुए कुछ दावाखोरो, मौकापरसतो को देखा। देखा तो उनके घिसे पिटे अच्छे दिन लाने वाले वादो को। जो अपने ज़मीर ओर गिरेबां के तार बेच चुके हैं और जो खुद ठीक से अपने पैरो पे खड़े नही हो सकते और इस देश की जो हक़ीक़ी तस्वीर है उससे नज़रे नही मिला सकते वो तुम्हे कुछ ना दे पायेंगे। माफ करना। मुझे इस देश के नेताओ से ज़्यादा उमीदें कभी ना थी अगर होती कोई तवक़्क़ोव्तो टूट चुकी होती। इस देश की सड़के गरीब मज़दूर, गर्भवती मां बहनो के खून पसीने से लत पत हैं ये बहा हुआ खून कभी मत भूल जाना मेरे हिन्दुस्तान के गय्यूर नौजवानो जो सज़ा तुमको मिली है इसके हक़दार तुम बिल्कुल ना थे

जिस मुक़्द्दर पे तुम्हारा नाम लिख दिया गया। और जो कुछ तुमने झेला है  यही हक़िक़्त आने वाले दौर मे तुमको सही रास्ता चुनने के किये मजबूर करेगी। ये जो जात पात और धर्मे का भगवा गम्च्छा तुमको अपने तक़्दीर के निवाले बना रहा है इसे अपने मज़्बूत हौसलो से तुम्हे मिटाना होगा। और ज़ुल्म का जो ये इब्लिसी दौर है ये आने वाले हिन्दुस्तान की तक़्दीर के लिये अच्छा संकेत नही है ये भी सच है की इस मुसोलिनी शाही जिन्दगी को जिसे शायद तुमने जान बूझ्कर अप्ना मुकद्दर बना लिया है भुल कर नये फैसले लेने होगे।

याद रखना आने वाले हर वक़्त मे हिन्दस्तान का जो मज़्दूर, असहाय, गरीब, कमज़ोर ओर लाचार किसान जो भारत के विकास का अहम हिस्सा है  याद रखना तुमने अगर इस तारीख को भुला दिया तो फिर हमे कोई ना खालिश रहेगी सरकार से और फिर ना कोई उमीद बचेगी तुम्हारी लुटी ज़िन्दगी मे। और माफ करना तुम्हारे वोट का अधिकार सही सलामत वापस मिल जाय तो भी गनीमत समझो अपनी तक़्दीरो को सवारो। इस बेशकिमती जिन्दगी को गली के किसी भेड्यो के हवाले ना करो। 

चल उठ खडा हो एक नयी आग पैदा कर

हो भला जिस जाम से वो जाम पैदा कर।

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