रवीश कुमार
आर्थिक मदद की अपील के आग्रहों को लेकर आपसे कुछ बातें कहना चाहता
हूँ

मुझे हर दिन आर्थिक मदद के लिए आग्रह आते हैं। फलां बीमार हैं। इलाज के लिए तीस लाख से लेकर दो करोड़ तक का खर्चा है। मेरे लिए मदद की अपील कर दें। इस तरह के मैसेज की संख्या कोरोना की दूसरी लहर के बाद काफी बढ़ गई है। उस दौरान भी मैं इस बात को लेकर सचेत था। मैं नहीं समझता कि इस पेज से जुड़े लोगों की आर्थिक क्षमता इतनी है कि मैं इस तरह की अपील कर हर दिन उन पर किसी तरह का नैतिक दबाव डालूं और वे अपराध बोध में जीने लगें। इस काम के लिए इस मंच का इस्तमाल अपवाद स्वरुप ही किया जा सकता है। यह ऐसा मामला है कि इसे लिखते हुए ख़ुद ही अपराध बोध से गुज़र रहा हूं। लेकिन हर बार ऐसे मैसेज देखकर चुप रहने से अच्छा है कि एक बार आपके बीच अपनी बात रखूं। देखूं कि आप क्या सोचते हैं।

मैंने सोचा है कि आर्थिक अपील नहीं करूंगा। हर दिन करना मुमकिन नहीं है। इससे यह मेरा अलग काम हो जाएगा। मैं अपने काम की छोटी बड़ी ग़लतियों की आशंकाओं में ही इतना सहमा रहता हूं कि उसके अलावा कोई और जवाबदेही नहीं ले सकता कि जिसके लिए अपील कर रहा हूं वो सही है या ग़लत। क्या उसने बीमा से लेकर सरकार की तमाम योजनाओं के विकल्पों का इस्तमाल कर लिया है। यकीन जानिए कि चुप रह जाने का मतलब यह नहीं कि मुझे फर्क ही नहीं पड़ा। जवाब न देकर भी संदेश दिमाग़ में गूंजता रहता है जिसका असर मेरी सेहत से लेकर नींद तक पर प़ड़ता है। दिन के 24 घंटे और साल भर आप इस तरह अचानक आ जाने वाली उम्मीदों के बोझ तले नहीं जी सकते हैं। उम्मीदों की समझ क्षमता और संसाधनों की वास्तविक समझ के आधार पर होनी चाहिए न कि असीमित रुप से उम्मीद की जानी चाहिए। मैं एक व्यक्ति हूं। सरकार नहीं हूं।
इन दिनों ऐसे आग्रहों की संख्या बहुत बढ़ गई है। काम के धुन में इतना वक्त नहीं होता कि सभी को जवाब दूं लेकिन सभी के लिए कुछ न कर पाने की निराशा घर करने लगती है। मैं ख़ुद को इस तरह की अपील से अलग रखना चाहता भी हूं। इस एक काम के अलावा मेरे और भी निजी दायित्व हैं। उसी के लिए पांच मिनट का समय नहीं बचता है। कई बार लोग मेरे ऊपर अपराध बोध डाल कर किसी कैफे में कॉफी पी रहे होते हैं और सोशल मीडिया पर तस्वीरें डाल रहे होते हैं। और मैं केक, अचार, किताब, कविता, कहानी और वीडियो लिंक पोस्ट न कर पाने के अपराध बोध में बुझा बुझा सा रहता हूं। किताब भेजते हैं अच्छी बात है, लेकिन भेजने के बाद कभी फोन तो कभी ई-मेल भेज कर पीछा करने लगते हैं।जो काम करता हूं उसका सामाजिक ऑ़डिट कर सकते हैं। आप देख सकते हैं कि यह बंदा सुबह सात बजे से लेकर रात के दस बजे तक काम ही करता रहता है। हवा में यह बात नहीं लिखता। जो किया है उसी को देख सकते हैं। उसी काम को मैं अच्छे से नहीं कर पाता जिसका अफसोस अगली सुबह तक रह जाता है।
मैं आपका दुख समझता हूं लेकिन इसका समाधान मेरे पास नहीं है।बीमारी के समय में आर्थिक मदद के लिए अब कई मंच बन चुके हैं। सरकार की नीतियां हैं। लोगों को उनकी तरफ देखना चाहिए और प्रयास करना चाहिए। इसलिए आर्थिक मदद की अपील नहीं करूंगा। यह कोई अंतिम शर्त जैसी बात नहीं लिख रहा लेकिन अपनी बात कहने का कोई दूसरा तरीका समझ नहीं आया। कई दिनों से इस अपराध बोध से गुज़र रहा हूं लेकिन यह एक या दो की बात नहीं है। हर दिन इस तरह के दस दस अपराध बोध से लाद दिया जाऊंगा तो कैसे काम चलेगा। ग़रीब लोगों की चिकित्सा का आर्थिक समाधान सरकार को करना चाहिए और इसके लिए अपने कार्यक्रमों में आवाज़ उठाता रहा हूं। उतना काफी है।
मेरे आस-पास के मित्र भी हर दिन ईमेल कर देते हैं। उनका उद्देश्य सामाजिक ही होता है। लेकिन यह मेरे बस की बात नहीं है कि किसी की एक लाख रुपये की फीस भर दूं या उसकी छात्रवृत्ति दे दूं। मैं तब भी यह काम करता हूं जिसका ज़िक्र ही कर दिया तो उस काम का क्या मतलब रह जाएगा। लेकिन यह संभव नहीं है कि मैं इस तरह के असीमित खर्च का वहन कर सकूं। मुझे नहीं पता कि कौन सा मित्र दूर बैठा सामाजिक मकसद के लिए योजना बना रहा होगा और फिर मुझे मेल भेज कर अपराध बोध में डाल देगा कि मुझे एक लाख रुपया देना चाहिए और मैं रोता रहूँ कि मेरी प्रतिबद्धता कम है।
एक दो मेल नहीं हर दूसरे दिन इस तरह के मेल आते हैं कि एक लाख रुपये दे दो या पचास हज़ार दे दो। उस मेल में एक लाइन लिख दिया जाता है कि तुम्हीं से उम्मीद है। अच्छी बात है कि उम्मीद है लेकिन उम्मीद मेरे लिए फंदा नहीं होना चाहिए।उम्मीद की इतनी ही समझ है तो फिर कुछ नहीं किया जा सकता। मुझे लगता है कि उम्मीद की राजनीतिक समझ होनी चाहिए। मैं अपने सीमित आय से इस तरह की उम्मीद पर खरा नहीं उतर सकता। हर बार मुमकिन नहीं होता है कि किसी को इतना लंबा जवाब लिखूं। उम्मीद है इसे पढ़ते हुए आपको ठेस नहीं लगी होगी और आप इसे व्यापक संदर्भ में समझने का प्रयास करेंगे।

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