शमशाद रज़ा अंसारी

कुम्हार का पहिया उसकी रोजी-रोटी है, जिसके घूमने पर ही उसके सपने पलते-बढ़ते हैं। चाक पर कुम्हार की कलाकारी देखने लायक होती है। चाक पर चलते कुम्हार के हाथ की कला अद्भुत होती है। लेकिन चिंता इस बात की है कि कुम्हार का पहिया अब थमता जा रहा है। एक समय ऐसा था कि दीये से लेकर सुराही तथा मटका खूब बिका करते थे। कुल्हड़ के दूध के स्वाद का आज भी कोई तोड़ नही है। खाने पकाने के लिए भी मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग होता था। इनके अलावा कुम्हार द्वारा बनाये गये मिट्टी के खिलौने भी बच्चों की पसन्द हुआ करते थे। हर घर में मिट्टी की गुल्लक हुआ करती थी। जिसमें बच्चों से लेकर बड़े तक पैसे जमा किया करते थे। आहिस्ता आहिस्ता बाजार में चाइना की घुसपैठ होनी शुरू हो गयी।

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लोग दीपवाली पर दीये की जगह रौशनी के लिए चाइना की लड़ियाँ लगाने लगे। बच्चों के लिए भी चाइनीज़ खिलौने बाजार में आ गये। सुराही एवं मटके, फ्रीज़ तथा पानी के प्लांट की भेंट चढ़ गये। कुल्हड़ की जगह डिस्पोजल गिलास प्रयोग होने लगे। तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी में मिट्टी के बर्तनों में खाना बनने की देरी से बचाने के लिए प्रेशर कूकर बाज़ार में आ गये। हालाँकि चिकित्सकों द्वारा सेहत के लिये मिट्टी के बर्तनों की सलाह के बाद मटके तथा कुल्हड़ का प्रयोग फिर से होने लगा है। लेकिन यह अभी उस स्तर तक नही पँहुचा है कि कुम्हार का जीवन फिर से पटरी पर आ सके।

रही सही कसर कोरोना वायरस के कारण लगे लॉक डाउन ने पूरी कर दी। सभी के रोज़गार की तरह कुम्हार का चाक भी लॉक डाउन में रुक गया। लॉक डाउन खुलने के बाद भी कोई खरीदार आने को तैयार नही है। ऐसे में कुम्हार बदहाली के दौर से गुज़र रहे हैं। कुम्हारों के आँसू रुकने का नाम नही ले रहे हैं।

कबीर दास ने कुम्हारों के लिए एक दोहा कहा था

“माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय,

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय।”

हालाँकि कबीर दास ने यह दोहा कुम्हार के मरने के बाद मिट्टी में दफ़न होने को देखते हुये कहा था। लेकिन वर्तमान में यह दोहा कुम्हार के जीवन में ही सटीक साबित हो रहा है।

ग़ाज़ियाबाद के कुम्हारों की अगर बात की जाये तो नगर कोतवाली क्षेत्र में कुम्हारों की बस्ती है। यहाँ के कुम्हारों की आर्थिक स्थिति बेहद खस्ताहाल है। किसी नेता या प्रशासनिक अधिकारी ने इनकी कोई सुध नही ली है।

हमने जब यहाँ बैठे कुम्हार से बात की तो उसने बताया कि मेरी पूरी ज़िन्दगी इस काम में गुज़र गयी। आज तक कभी ऐसा बुरा दौर नही देखा। मिट्टी के बने बर्तन और खिलौने सूख कर खराब होने या टूटने लगे हैं। हमारी हालत तो पहले से ही खराब थी। धार्मिक आयोजन तथा शादियाँ होती थीं तो उनमें मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग होता था। लेकिन धार्मिक आयोजन तथा शादियाँ बन्द होने से हालात अब और ज़्यादा खराब हो गये हैं। कोई हमारी सुध लेने वाला नही है। गुज़ारे के लिए ईंटों के भट्टे पर जाकर काम करना पड़ रहा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि सभी को रोज़गार और आर्थिक मदद देने का वादा करने वाली प्रदेश की योगी सरकार इन कुम्हारों एवं इनकी दम तोड़ती कला को जीवित रखने के लिए क्या कदम उठाती है। जिससे इनका जीवन फिर से पटरी पर आ सके।

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