नई दिल्ली : आम आदमी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि भाजपा शासित एमसीडी परमिट राज खत्म नहीं करना चाहती है, इसलिए वह रेस्तरां मालिकों को हेल्थ ट्रेड लाइसेंस देना जारी रखना चाहती है। जबकि इस संबंध में दो दिन पहले सीएम अरविंद केजरीवाल ने तीनों एमसीडी के कमिश्नर के साथ बैठक कर कहा था कि रेस्तरां संचालकों को एमसीडी से हेल्थ ट्रेड लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं है, इसे रद्द किया जाए। उन्होंने कहा कि दिल्ली में प्रत्येक रेस्तरां मालिक को हेल्थ ट्रेड लाइसेंस का नवीनीकरण कराने के बदले एमसीडी के अधिकारियों को एक से पांच लाख रुपए रिश्वत देनी पड़ती है। केंद्र सरकार ने भी एमसीडी को पत्र लिखा था। इसके बावजूद भाजपा शासित तीनों एमसीडी अपने ही केंद्र सरकार के आदेश के खिलाफ जबरदस्ती हेल्थ ट्रेड लाइसेंस थोपने पर आमादा हैं। ‘आप’ जानना चाहती है कि क्या भाजपा दिल्ली प्रमुख आदेश गुप्ता जानते हैं कि फूड ट्रेड लाइसेंस के नाम पर भाजपा नेता और एमसीडी के अधिकारी दलाली करते हैं और अगर जानते हैं, तो उसे रोकना क्यों नहीं चाहते हैं? सौरभ भारद्वाज ने कहा कि यह शर्मनाक है कि भाजपा शासित एमसीडी डॉक्टरों के वेतन का भुगतान नहीं कर रही है, भाजपा शासित एमसीडी भ्रष्ट और अक्षम हैं। बीजेपी को तत्काल एमसीडी से इस्तीफा दे देना चाहिए। ‘आप’ एमसीडी बेहतर तरीके से चलाएगी और बिना कोई टैक्स बढ़ाए वेतन देगी।

आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता और विधायक सौरभ भारद्वाज ने शुक्रवार को पार्टी मुख्यालय में प्रेस कांफ्रेंस की। सौरभ भारद्वाज ने कहा कि कोरोना के चलते लगभग सभी लोगों का बिजनेस और कामकाज बुरे दौर से गुजर रहा है। दुनिया की सभी सरकारें कारोबार को फिर से पटरी पर लाने के लिए लोगों की मदद कर रही हैं। उसी को ध्यान में रखते हुए दिल्ली सरकार ने भी दो-तीन दिन पहले रेस्तरां एसोसिएशन के साथ मीटिंग की और यह फैसला लिया कि हेल्थ ट्रेड लाइसेंस जो हर साल सभी रेस्तरां और खाने-पीने की दुकानों को एमसीडी से लेने पड़ते हैं, अब उनकी जरूरत खत्म हो गई है। दिल्ली सरकार ने मीटिंग में इन लोगों की प्रताड़ना को रोकने के लिए इस लाइसेंस को खत्म करने का फैसला लिया। दो दिन पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तीनों नगर निगमों के कमिश्नरों को बुलाकर कहा कि अब हेल्थ ट्रेड लाइसेंस की जरूरत नहीं है।

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सौरभ भारद्वाज ने कहा कि कोई रेस्तरां और दुकान या फूड बनाने वाली कंपनी हेल्थ और सुरक्षा का पूरा ख्याल रख रही है या नहीं इसके लिए उन्हें हर साल हेल्थ ट्रेड लाइसेंस लेना पड़ता है। पहले यह मैनुअल होता था लेकिन अब इसे ऑनलाइन कर दिया गया है। ऑनलाइल लाइसेंस के लिए आवेदन करने के बावजूद वेबसाइट पर लाइसेंस का काम प्रगति पर दिखाया जाता है। जब तक लाइसेंस के लिए आवेदन करने वाला व्यक्ति फोन न करे तब तक यह मामला आगे नहीं बढ़ता। जब व्यक्ति एमसीडी को फोन करता है तो उसे कहा जाता है कि एक अधिकारी आपके यहां आएगा और वह आपसे मिलेगा। यह मिलने की जो प्रक्रिया है वो एक मुंह दिखाई की रस्म यानी रिश्वतखोरी है।

उन्होंने आगे कहा कि आवेदन करने वाले को रेस्तरां का लाइसेंस का नवीकरण कराने के लिए एमसीडी के अधिकारी को एक लाख से लेकर पांच लाख रुपये तक की रिश्वत देनी पड़ती है। होली, दीवाली, नए साल और हर डेढ़ से दो महीने में हेल्थ अधिकारी रेस्तरां में जाता है और कहता है कि कुछ खर्चा दे दो। हर रेस्तरां वाले को यह रिश्वत का पैसा देना पड़ता है नहीं तो वो अधिकारी उस रेस्तरां के खाने, सफाई और अन्य चीजों में कमी निकालने लगता है। अधिकारी का जब मन आता है वो किसी भी रेस्तरां को फोन करता है और कहता है कि आज हमारे 15 आमदी खाना खाने आ रहे हैं उनसे पैसे मत लेना।

सौरभ भारद्वाज ने आगे कहा कि जब दिल्ली सरकार ने इस लाइसेंस को खत्म करने का फैसला लिया, तो भाजपा शासित एमसीडी ने इसका विरोध किया। वो नहीं चाहते कि दिल्ली में लाइसेंस राज खत्म हो। भारत सरकार के परिवार और स्वास्थ्य कल्याण मंत्रालय की एक चिट्ठी दिखाते हुए उन्होंने कहा कि 7 सितंबर 2020 को केंद्र सरकार की तरह से एक चिट्ठी दिल्ली के नगर निगमों के लिए लिखी गई थी। 2011 में एक कानून बनाया गया था, जिसमें सारे देश के अंदर खाद्य सुरक्षा और मानकीकरण को एक साथ कर दिया गया था। इसके अनुसार, रेस्तरां और खाना बेचने स्टॉलों को सीधे एफएसएसआई के अंदर रजिस्टर्ड किया जाता है और उन्हें पांच साल के लिए एक लाइसेंस दिया जाता है। यह प्रक्रिया जारी है। इसके बावजूद दिल्ली के तीनों नगर निगम रेस्तरां मालिकों को हर साल लाइसेंस लेने पर मजबूर कर रहे हैं।

केंद्र सरकार की तरफ से दिल्ली नगर निगमों को भेजी गई चिट्ठी में कहा गया है, हमें जानकारी प्राप्त हुई है कि एफएसएसआई के लाइसेंस के बावजूद आप दिल्ली के रेस्तरां के मालिकों को हर साल लाइसेंस लेने के लिए प्रताड़ित कर रहे हैं और उन्हें परेशान कर रहे हैं। कोरोबार में गिरावट के चलते सरकारों की यही कोशिश रही है कि कोरोबारियों और दुकानदारों के कोरोबार को आसान किया जाए। उसी कड़ी में दिल्ली सरकार भी यही चाहती है कि कारोबारियों का बिजनेस आसान किया जाए, उनको राहत दी जाए और उनकी प्रताड़ना रोकी जाए। लेकिन एमसीडी इससे बाज नहीं आ रही है और केंद्र सरकार के खिलाफ जाते हुए फूड लाइसेंस लोगों पर थोपने के लिए आमादा है।

उन्होंने कहा कि दिल्ली के भाजपा अध्यक्ष से मेरे कुछ सवाल हैं। आदेश गुप्ता हमेशा कारोबारियों की बात करते हैं। क्या आदेश गुप्ता जानते हैं कि लाइसेंस के नाम पर भाजपा के नेता और एमसीडी के अधिकारी दलाली कर रहे हैं? क्या उन्हें इस भ्रष्टाचार की जानकारी है? ऐसा हो नहीं सकता है कि जिस क्षेत्र के वो पार्षद हैं वहां के रेस्तरां के मालिकों ने उन्हें न बताया हो कि किस तरह से लाइसेंस के नाम पर दलाली चल रही है। अगर लाइसेंस के नाम पर दलाली चल रही है तो आदेश गुप्ता उसे रोकना क्यों नहीं चाहते। क्या उनके ऊपर उनके पार्षदों और एमसीडी के अधिकारियों का कोई दबाव है।

वहीं, सौरभ भारद्वाज ने एमसीडी के डॉक्टरों के वेतन को लेकर भी एक प्रेस कांफ्रेंस की। उन्होंने कहा कि ऐसी खबरें आ रही हैं कि उत्तरी नगर निमग के कई अस्पतालों के डॉक्टर हड़ताल पर हैं। यह बहुत शर्म की बात है कि जो पार्टी डॉक्टरों के लिए ताली और थाली बजाने का नाटक और ढोंग करती है वही पार्टी एमसीडी के अंदर डॉक्टरों का वेतन नहीं दे पा रही है। जिन कोरोना योद्धाओं को फूलों की माला पहनाकर उनका वेतन देना चाहिए। उनका सम्मान करते हुए उनके वेतन में वृद्धि करनी चाहिए, लेकिन उन्हीं डॉक्टरों को कई महीनों से वेतन नहीं दिया जा रहा है। वो अपने बच्चों की स्कूल फीस और घर का किराया तक नहीं दे पा रहे हैं।

उन्होंने आगे कहा कि वह डॉक्टर क्या किसी की मदद करेगा जिसके घर में खुद खाने के लिए कुछ नहीं है। मैं जानना चाहता हूं कि आज एमसीडी का हाल इतना बुरा क्यों है। हर राज्य के अंदर नगर निगम हैं और सबके राजस्व के एक ही साधन हैं। सबके राजस्व के साधन प्राॅपर्टी और रोड टैक्स, पार्किंग फीस और विज्ञापन ही हैं। मुझे लगता है कि प्रोपर्टी में दिल्ली से ज्यादा टैक्स कहां आता होगा, दिल्ली से ज्यादा विज्ञापन का पैसा कहां आता होगा, देश में पार्किंग फीस सबसे ज्यादा दिल्ली में है। यहां 20 रुपये प्रति घंटा पार्किंग शुल्क लिया जाता है। कमाई के सारे साधन एमसीडी के भी अन्य राज्यों के नगर निगमों जैसे हैं लेकिन फिर भी इनकी हालत इतनी खस्ता क्यों है।

यह भी उसी दिल्ली में सरकार चलाते हैं जिसमें केजरीवाल अपनी सरकार चलाते हैं। पांच साल में हमारा राजस्व 30 हजार करोड़ रुपये से बढ़कर 60 हजार करोड़ रुपये हो गया, लेकिन इनका राजस्व बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहा है। इनके नेता अमीर होते जा रहे हैं। जब  इनका कोई नेता पार्षद बनता है तो वो स्कूटी से आता है। लेकिन अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करने से पहले ही उसके पास फॉर्च्यूनर और स्कॉर्पियो जैसी महंगी गाड़ियां आ जाती हैं। एमसीडी कंगाल, पार्षद मालामाल। इसके दो ही कारण हो सकते हैं या तो यह बेईमान और भ्रष्टाचारी हैं, एमसीडी को लूट-लूट कर खा रहे हैं। या फिर यह नालायक हैं, इनको काम करना नहीं आता। इनको एमसीडी चलाने का कोई हक नहीं है, वो इस्तीफा देकर इसे छोड़ दें। जैसे हम दिल्ली सरकार चला रहे हैं उसी तरह हम उतने ही बजट में बिना टैक्स बढ़ाए एमसीडी को अच्छे से चलाकर दिखाएंगे।

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