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‘मोदी जी’ कोरोना जैसी महामारी में भी क्यों जारी है नफ़रत और घृणा का खेल

देश में कोरोना महामारी तीसरे स्टेज में पहुँच गयी है। सरकार ने भले ही इसकी आधिकारिक घोषणा न की हो लेकिन उसके कर्ताधर्ताओं की तरफ़ से आए कुछ वक्तव्यों ने इस बात को साफ़ कर दिया है। नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत के नेतृत्व में गठित एम्पावर्ड ग्रुप ने जब मीडिया को यह बताया कि अगले दो महीनों के लिए लाखों जाँच किट और 50 हज़ार से ऊपर वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ेगी तो यह सब कुछ उसी की तरफ़ इशारा था। इसके साथ ही छह अप्रैल को पार्टी कार्यकर्ताओं को दिए गए पीएम के संबोधन में भी यह बात बिल्कुल साफ़ दिखी। जिसमें उन्होंने कहा कि कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई लंबी है और इसे पूरी ताक़त और मज़बूती के साथ लड़ना होगा।

बहरहाल कोरोना के ख़िलाफ़ युद्ध में पूरा देश सरकार के साथ है। लेकिन इस मामले में सरकार की तरफ से जिस परिपक्वता, धैर्य, बड़प्पन, निष्पक्षता, समावेशिता और तैयारी की उम्मीद की जानी चाहिए उसका घोर अभाव है। एक ऐसी महामारी जिसने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले रखा है। और बड़ी से बड़ी महाशक्ति को भी घुटनों के बल ला दिया है। उसके ख़िलाफ़ जितना पहले और जितनी एकजुटता और तैयारी के साथ काम किया जाना चाहिए था सरकार उसमें नाकाम रही है। इस मामले में सरकार की पूरी कार्यशैली ही सवालों के घेरे में है। पहली बात तो समय पर पहल नहीं की गयी। और जब पहल की गयी तो लिया जाने वाला फ़ैसला और उसके तरीक़े ने बिल्कुल उल्टा रिज़ल्ट दिया। लॉक डाउन के फ़ैसले पर किसी को भला क्यों एतराज़ होगा। वह एक ज़रूरी फैसला था जिसे लिया ही जाना चाहिए था। लेकिन शायद देश बंदी करने से पहले नोट बंदी का सबक़ सरकार भूल गयी।

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नतीजतन चार घंटे में देश को ठप करने का मोदी का अचंभित करने वाला फ़ैसला उल्टा पड़ गया और लागू होने के तीसरे दिन प्रवासी मज़दूरों के पेट की भूख और भविष्य की अनिश्चितता सड़कों पर उनकी भीड़ के रूप में दिखने लगी। लिहाज़ा अब तक बाहर से आया कोरोना अगर कुछ शहरों और बाहर से आए लोगों के इर्द-गिर्द घूम रहा था तो इस फ़ैसले ने उसे पूरे देश में फैलने का मौक़ा दे दिया। पीएम तो युद्ध की बात ज़रूर कर रहे हैं लेकिन इसके अग्रिम मोर्चे पर लड़ने वाले कमांडर और सैनिक डाक्टरों तथा स्वास्थ्यकर्मियों के पास लड़ाई के न ज़रूरी हथियार हैं और न ही अपनी रक्षा के लिए पीपीई सरीखा ढाल। लेकिन उनको युद्ध में कूद जाने के लिए कहा जा रहा है। ऊपर से दाद में खाज यह है कि सरकार ने इन उपकरणों का निर्यात जनता कर्फ़्यू की घोषणा के एक दिन बाद तक जारी रखा था। चीन और तमाम देशों से दान हासिल करने के बाद भी इनका संकट बना हुआ है।

पूरे प्रकरण में पीएम मोदी का व्यवहार संवैधानिक देश के कार्यकारी अध्यक्ष से ज़्यादा किन्नर देश के किसी राजा सरीखा है। जिसमें विपक्ष की बात तो दूर अपनी कैबिनेट तक को वह शामिल नहीं करना चाहते हैं। स्वास्थ्य मंत्री तो पूरे सीन से ही नदारद हैं। और पूरी कमान पीएमओ ने अपने हाथ में ले रखी है। अब तक तीन बार मोदी जी टीवी के पर्दे पर नमूदार हो चुके हैं लेकिन उनके संबोधन में कोरोना से लड़ने की तैयारियों के तरीक़े और विवरण सिरे से नदारद रहे। पूरी क़वायद प्रवचन तक सीमित रही। उससे आगे बढ़ी तो एक बार थाली, ताली तो दूसरी बार दीया-दिवाली तक जा पायी। दरअसल कोरोना के खिलाफ इस लड़ाई में भी पीएम मोदी और उनके पितृ संगठन आरएसएस का पूरा ज़ोर अपनी राजनीति और विचारधारा के दायरे में काम करने पर है। एक ऐसे समय में जबकि यह कहा जा रहा है कि ‘धर्म छुट्टी पर, विज्ञान ड्यूटी’ पर है। यह घोषणा अपने आप में धर्म के लिए किसी ख़तरे की घंटी से कम नहीं थी। 

लिहाज़ा विज्ञान के काम करने के दौरान भी आस्था और अंधविश्वास को बनाए रखना मोदी और संघ के लिए सबसे आवश्यक कार्यभारों में एक हो गया। लिहाज़ा सत्ता प्रतिष्ठान इस नतीजे पर पहुँचा कि विज्ञान यानी स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल को सीमित दायरे में ही काम करने दिया जाएगा। और इस बीच धर्म की धौंकनी को तेज़ करना होगा। इसके लिए जो रास्ता अपनाया गया वह बेहद दिलचस्प है। इसके तहत सरकार की भूमिका को कम करने पर मौन सहमति बनी। क्योंकि कोई सहायता की उम्मीद न होने पर लोग स्वाभाविक तौर पर भगवान के भरोसे जाने के लिए मजबूर होंगे। टीवी पर रामायण और महाभारत का प्रसारण इसी कड़ी का हिस्सा था। तो देश में थाली और दीवाली उसका अगला चरण। जिसमें शंख से लेकर घंटा तक और जय श्रीराम से लेकर वंदे मातरम तक के हिंदू राष्ट्र को स्थापित करने वाले नारे लगे। लेकिन इन सब चीजों का कोई फ़ायदा नहीं मिलता अगर उसमें कोई घृणा और नफ़रत की चासनी नहीं मिलायी जाती। 

इस मामले में निज़ामुद्दीन में हुआ तबलीगी मरकज़ी सम्मेलन बिल्ली के भाग से छींका सरीखा रहा। इस बात में कोई शक नहीं कि आयोजकों को इस पर ज़रूर गौर करना चाहिए था। इससे जुड़ा एक दूसरा सच भी है लेकिन मुख्यधारा के मीडिया और आईटी सेल की बमबारी ने लोगों के कान सुन्न कर उस दिशा में सोचने ही नहीं दिया। मसलन 13-15 मार्च को आयोजित इस सम्मेलन से एक दिन पहले भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय का एक बयान आता है जिसमें वह कोरोना को लेकर किसी आपात स्थिति के न होने की घोषणा करता है। और ठीक उसी दौरान और लॉकडाउन लागू होने से पहले तक इसी तरह के देश में तमाम आयोजन और सम्मेलन होते रहे। अगर सरकार चाहती तो 25 मार्च को आयोजकों द्वारा लोगों को निकालने के आवेदन पर अमल कर सभी को जाँच के बाद क्वारंटाइन करने के ज़रिये आराम से चुपचाप बग़ैर मुद्दा बनाए उनके गंतव्यों तक पहुँचा सकती थी। जैसा कि उसने वैष्णो देवी से लेकर हरिद्वार में फँसे हज़ारों गुजराती लोगों के साथ किया। 

आगे बढ़ने से पहले यहाँ यह बात जान लेना ज़रूरी है कि बाहर के देशों में कोरोना की स्थिति और उसकी गंभीरता का मूल्यांकन देश में किसी नागरिक से ज्यादा सरकार और उसके विदेश मंत्रालय को होना चाहिए था। और अगर उसको इसमें कोई ख़तरा दिखा था तो उसे तत्काल बाहर से आने वाले सभी लोगों का वीज़ा रद्द कर देना चाहिए था। घर में बुलाने के बाद उन्हें तरह-तरह से अपमानित और जलील करने का जो रास्ता सरकार ने चुना वह किसी भी सभ्य और आधुनिक देश के लिए शोभा नहीं देता है।  ऐसा नहीं है कि सरकार को तबलीगी के इस आयोजन के बारे में नहीं पता था। अगर उनको निकालने की कोई व्यवस्था नहीं की गयी तो यह एक सोची समझी रणनीति थी। गृहमंत्री अमित शाह ऐसे ही नहीं अंडरग्राउंड थे। उस समय गृहमंत्रालय में उन्हीं सारी चीजों पर काम हो रहा था। और फिर तबलीगी विस्फोट हुआ। पूरा लैपडाग मीडिया से लेकर आईटी सेल तक कोरोना को मुस्लिम बनाने में जुट गए। और जिस सरकार को देश के बाहर से आए 15 लाख लोगों की टेस्टिंग की कोई फिक्र नहीं थी उसने खोज-खोज कर तबलीगियों की टेस्टिंग का राष्ट्रव्यापी अभियान छेड़ा दिया।

माहौल इस तरह से बनाया गया जैसे तबलीगी न केवल कोरोना बाहर से ले आए बल्कि देशभर में उसको फैलाने का भी उन्होंने ही काम किया। सच तो यह है कि सरकार ने टेस्टिंग ही बहुत कम की है। यह सब कुछ इसलिए किया गया जिससे आँकड़े को नियंत्रित किया जा सके। ऊपर से एक दौर में जब केवल तबलीगी लोगों की ही घेर-घेर कर टेस्टिंग की जाएगी तो स्वाभाविक तौर पर उनकी संख्या ज़्यादा निकलेगी। लेकिन लोग इस बात को नहीं समझ पाते। क्योंकि उन्हें जो दिखाया जाता है वो उतना ही देख पाते हैं।  अब जबकि देश में एक स्तर पर सरकार और उसका गोदी मीडिया इस बात को तक़रीबन स्थापित करने में सफल रहा कि तबलीगी ही कोरोना के लिए असल ज़िम्मेदार हैं तो अब सरकार ने टेस्टिंग तेज़ कर दी है। और आने वाले दिनों में अगर यह संख्या आगे बढ़ती भी है तो उसे मुसलमानों के मत्थे मढ़ने की पूरी कोशिश की जाएगी।

मुस्लिम तबके के ख़िलाफ़ नफ़रत और घृणा का यह अभियान यहीं तक सीमित नहीं रहा। बाद में उनके अस्पतालों में बंद रहने से लेकर राह चलते उनके व्यवहार संबंधी जो तमाम तरह की अश्लील और अमानवीय हरकतें प्रचारित की गयी उससे उनके ख़िलाफ़ इस घृणा को और ऊँचाई देने का मौक़ा मिला। इसमें अस्पताल में नर्सों के साथ व्यवहार लेकर सब्ज़ियों और नोटों को थूक लगाकर देने जैसी तमाम चीजें शामिल थीं। यहां तक कि इलाहाबाद में एक हिंदू शख़्स की मुसलमानों द्वारा हत्या तक की ख़बर चला दी गयी जिसका बाद में पुलिस ने खंडन किया।  दरअसल आरएसएस मुस्लिम तबके को उसके घुटनों के बल ला देना चाहता है। इस कड़ी में वह सामाजिक और राजनीतिक तौर पर उन्हें हाशिये पर फेंकने में सफल रहा है। लेकिन उसे आख़िरी तौर पर यह सफलता तभी मिलेगी जब वह उनको आर्थिक रूप से भी पंगु बना दे। उसके बाद विभिन्न कालोनियों और लोगों द्वारा मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार का जो आह्वान सामने आया वह इसी श्रृंखला का एक हिस्सा था। किसी को लग सकता है कि यह सब कुछ स्वत:स्फूर्त ढंग से होता है। लेकिन हमें इतना भोला नहीं होना चाहिए।

अगर यह सब कुछ अपने आप होता तो लिंचिंग पूरे देश में अभी जारी रहती। और गोहत्या का प्रश्न भी उसी तरीक़े से बना रहता जैसा कि आज से कुछ महीनों पहले था। यह बात अब दिन के उजाले की तरह साफ़ हो गयी है कि किस समय क्या एजेंडा और उसे कैसे चलाना है यह सब कुछ इन दक्षिणपंथी एजेंसियों द्वारा तय किया जाता है और फिर उनके हाइड्रा संगठन उस काम में जोर-शोर से जुट जाते हैं। संकट और महामारी के इस दौर में भी आरएसएस अपने एजेंडे के साथ सक्रिय है। मोदी और संघ दोनों आपसी सहमति से कार्यक्रम बना रहे हैं। संघ पर्दे के पीछे ज़मीनी स्तर पर सक्रिय है तो मोदी उसका चेहरा हैं। यह कार्य विभाजन कोई नया नहीं है पिछले छह सालों से यही सिस्टम चल रहा है। आम तौर पर विचारधाराओं का लक्ष्य मानवता का कल्याण होता है। लेकिन यह विचारधारा किस तरह से मानव विरोधी है उसका यह एक उदाहरण है। एक ऐसे समय में जबकि मानवता पर चौतरफा संकट आया हुआ है तो वह सभी को एक इंसान की जगह धर्म के सांप्रदायिक चश्मे से देख रही है।

मदद करने की जगह आर्थिक बहिष्कार करवा रही है। दरअसल इनका किसी धर्म से कुछ लेना-देना नहीं है। यह एक फ़ासिस्ट ताक़त है जो धर्म का अपने पक्ष में इस्तेमाल कर रही है। और कम से कम हिंदू धर्म का हित चाहने वालों को ज़रूर एक बार सोचना चाहिए कि अगर उनके धर्म की उसके साथ पहचान जुड़ गयी तो फिर उसका क्या नतीजा होगा। वह न केवल मानव विरोधी घोषित हो जाएगा बल्कि संकट और विपत्ति की स्थिति में भी घृणा और नफ़रत का वाहक करार दिया जाने लगेगा। इससे संघ का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा लेकिन हिंदू धर्म का बहुत बड़ा नुक़सान होगा जिसकी भरपाई कर पाना हिंदू धर्म की आने वाली कई पीढ़ियों के लिए मुश्किल हो जाएगा।

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