ख़ुर्शीद अह़मद अंसारी

मुल्क की तक़सीम का दर्द और खानदान की किफ़ालत ने सम्पूर्ण सिंह कालरा को मुम्बई आने को मजबूर किया। छोटी छोटी नौकरी करने वाले लड़के ने बेलासिस रोड के विचार गैरेज में भी नौकरी की।लेकिन बाद में सिनेमा से ऐसा गहरा रिश्ता बना कि उसकी सिनेमा को दिया गए ख़िदमात के लिए सबसे बड़े एजाज़ दादा साहब फ़ाल्के से नवाज़ा गया।क्यों कि अब वो सम्पूर्ण सिंह कालरा तहज़ीब ओ सकाफ़त की अपनी मुन्फरीद कोशिश से “गुलज़ार” कर चुका था। 18 अगस्त 1934 को गुलज़ार साहब जिनका नाम सम्पूर्ण सिंह कालरा है का जन्म दीना,लाहौर पाकिस्तान में हुआ।

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दिल में मासूम माचिश लिए सम्पूर्ण सिंह गुलज़ार साहब ने वक़्त के मौसम की किताब पर मिर्ज़ा ग़ालिब लिख दिया और न जाने कितने बहुरूपिये बदकिस्मत अल्फ़ाज़ को ज़िन्दगी बख्श दी। वो जिसकी ज़बां उर्दू की तरह शीरीं और वो जिसे क़ुतुब मीनार की खडरों पर उकेरे गयी बेलों में अरबी की आयतें नज़र आयीं। सर पे न साया कोई न ही कोई सांई रे का रुदाली से जो रिश्ता रहा वही रिश्ता दिल तो बच्चा होने का इज़हार गुलज़ार साहब की क़लम और नग़मों में नज़र आया..फिर कैसे कह सकते हम कि तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी हैरान हूँ मैं..हो सकता है गुलज़ार साहब के मेरे अपने उनके इर्द गिर्द हों उनके जन्मदिन के अवसर पर.मगर हम भी शरीक ए मुसर्रत से कह देते हैं हे! पुखराज जय हो..नीले नीले आसमानों के नीचे मुसाफिर हूँ मुझे बस चलते जाना…
और नसीरुद्दीन शाह साहब को ग़ालिब की शक्ल में अमरत्व देने वाले गुलज़ार साब को उनके जन्म दिन पर ढेरो सारी शुभ कामनाये।

(इस लेख में गुलज़ार साहब की कुछ फिल्मों के नाम और कुछ बेहद मश्हूर मारूफ़ नग़मों के बोल का इस्तेमाल किया गया है..)

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