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रवीश का लेख : छुट्टी पर जाने से पहले यूपी के उन चार लाख युवाओं से सवाल जिन्हें सरकारी नौकरी मिली है

यूपी के युवाओं के लिए अच्छी ख़बर है। हालाँकि यह बात युवाओं ने नहीं बताई है।आज पता चला कि योगी सरकार ने चार लाख नौकरियाँ दी हैं। एक अख़बार में चार साल पूरे होने पर बक़ायदा विभाग के अनुसार ब्रेक अप दिया था कि किस विभाग में कितनी हज़ार नौकरियाँ दी गईं।

अगर योगी सरकार सरकारी नौकरी दे रही है तो आपको यह भी बोलना चाहिए। हमारे पास इन दावों की जाँच के लिए संसाधन नहीं हैं और न ही दस्तावेज़ों तक अब वैसी पहुँच रह गई है। तभी तो आप भीतर की ख़बरों को कम देखते पढ़ते होंगे। सरकार ने जो दावा किया वही छप गया और वही मान लिया गया।

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योगी सरकार ने पूरी दिल्ली में विज्ञापन लगा रखा है। आज के टाइम्स आफ इंडिया के कवर पर विज्ञापन था कि चार लाख नौकरियाँ दी गई हैं। सरकारी। जिस किसी को नौकरी मिली है, उन सभी को आगे आकर बताना चाहिए कि मैं उस चार लाख में से एक हूँ। इससे सरकार का उत्साह बढ़ेगा और वो अधिक से अधिक भर्तियाँ निकालेगी।

कम से कम जिसे नौकरी मिली है वो तो कहे। जिसे नहीं मिली वो लड़ता रहे और उसके लिए भी यह अच्छी बात है। जब बेरोज़गार युवाओं ने नौकरी को लेकर ट्विटर पर लाखों ट्विट किए तब इन यूपी में नौकरी पाने वाले चार लाख युवाओं को कुछ तो बोलना चाहिए था।

एक दूसरा नज़रिया मिलता। खैर आप नहीं बताना चाहते हैं तो कोई बात नहीं, आपको नौकरी मिली है बधाई। अगर वाक़ई चार लाख सरकारी नौकरी दी गई है तो इसके लिए योगी जी को बधाई। बाक़ी भर्तियाँ भी जल्दी पूरी कर दें।

कोरोना के कारण परीक्षा हो या न हो, अब यह सवाल हमारे दायरे से बाहर जा चुका है। पिछले साल यह सवाल सुप्रीम कोर्ट में गया और परीक्षा कराने के आदेश हुए। इस बात को लेकर अभी भी मध्य प्रदेश से लेकर बिहार तक के छात्र लिखने लगते हैं। युवाओं की इतनी विश्वसनीयता रह गई है कि लोग कहते हैं कि क्रिकेट का मैच देखने के लिए कोरोना नहीं है, परीक्षा के लिए है।

इस धारणा का नुक़सान उन छात्रों को हो जाता है कि गंभीर हैं और कुछ कोरोना से संक्रमित भी।उनकी परीक्षा छूट जाती है। उसकी भरपाई कैसे होगी किसी को नहीं पता। देश इस वक़्त किसी और दौर से गुज़र रहा है। तो आपने देखा होगा कि मैंने इस विषय से दूरी बना ली है। आप लोगों ने बहुत मैसेज किया लेकिन नहीं किया क्योंकि यह अनंत है।

हर परीक्षा को लेकर यही सवाल है। बेहतर है आप इसके लिए अपने जनप्रतिनिधि से संपर्क करें। मुझे नहीं लगा कि इस समस्या को दूसरी समस्या के आगे तरजीह हूँ इसलिए नहीं किया। हो सकता है मेरा फ़ैसला ग़लत हो लेकिन मेरे ज़हन में जो बात है उसे रख रहा हूँ।

और अब नौकरी और परीक्षा की सभी स्टोरी करना संभव नहीं है। उतने संसाधन नहीं हैं। आप लोगों को भी इसके लिए संपर्क नहीं करना चाहिए। कितनी बार तो लिख चुका हूँ। फिर भी मेरी परीक्षा का दो लाइन बोल दीजिए तो तीन लाइन बोल दीजिए। ऐसे नहीं होता है।

दो हफ़्ते तक छुट्टी पर हूँ। पहली अप्रैल से आऊँगा। इसलिए इस दौरान बेवजह पूछ पूछ कर तंग न करें। मुझे मैसेज न करें। कोई अच्छा गाना हो वो ज़रूर करें। कविता नहीं। कहानी नहीं। उसके लिए वक़्त नहीं होता। अपनी पसंद का ही पढ़ता हूँ।

हाल ही में गोलेंद्र पटेल को पढ़ कर मज़ा आ गया। मैं इस विषय का पारखी तो नहीं लेकिन लगता है कि गोलेंद्र में कुछ बात है। नाम गोलेंद्र है लेकिन बात सीधी करते हैं। शानदार। मुझे एकांत पसंद है। शादी ब्याह में जाना पसंद नहीं।

किसी से ताल्लुकात बनाते समय इसी का डर रहता है कि शादी ब्याह में तो नहीं बुला लेगा। वैसे शादी ब्याह का खाना खूब मिस करता हूँ। ख़ासकर पाँत में बैठक आलू दम और पूड़ी। लेकिन क्या करें।

अब हम उम्र की उस दिशा की तरफ़ अग्रसर हैं जहां से लोग ख़ुद को किनारे करने लगते हैं। आँगन से निकल कर ड्राइंग रुम या बैठक खाने में जगह बनाने लगते हैं। मुझे इस कल्पना से बहुत सुख मिलता है। ख़ुद को फिर से अंजाने होते देखना चाहता हूँ।

पार्क की किसी बेंच पर अकेला बैठा हुआ। बस आमदनी का मासिक प्रवाह बना रहे। पेंशन मिलती तो क्या ही बात होती। इसलिए काम तो करना ही होगा। भागने के बाद भी लौटना होगा। कोई पेंशन की व्यवस्था करना चाहता है तो उसका स्वागत!

वैसे थक तो गया हूँ। हर दिन छह हज़ार शब्द लिखना, उसके लिए पढ़ना, एक निश्चित समय में आसान नहीं होता है। एक शो ख़त्म नहीं होता कि दूसरे शो का काम शुरू हो जाता है। पहला कैसा था यह भी सोचने का समय नहीं मिलता है। दिमाग़ के लिए ज़रूरी है कि ख़ाली जगह मिले। मेरा काम बाक़ी एंकरों से अलग है।

आप ख़ुद भी किसी एंकर के शो को लेकर तुलनात्मक अध्ययन कर सकते हैं। डिबेट शो में कोई काम नहीं होता है। दो लोग आते हैं वो अपनी बात कहते हैं। एंकर कुछ कुछ बोलता रहता है बिना पढ़े लिखे। अगर डिबेट में झगड़ा हो गया तब तो क्या ही बात है। उस एंकर का पूरा टाइम आसानी से कट जाता है।

आप जब भी डिबेट शो देखें,किसी का भी तो मेरी बात को मिलाइयेगा। यह फार्मेट लाया ही गया पत्रकारिता और दर्शकों को बर्बाद करने के लिए। कम खर्चे में टीवी के ख़ाली जगह को बकवास से भरने के लिए। अब तो लोग ही बोलते हैं कि इस पर डिबेट कीजिए। उनके ज़हन में न्यूज़ का मतलब बदल चुका है।

दूसरी तरफ़ मेरा काम गहन अध्ययन पर आधारित होता है। तीस मिनट की डाक्यूमेंट्री जैसा शो अच्छे अच्छे नहीं कर पाएँगे वो भी साल दर साल और दिन ब दिन।मैं सारी चीज़ें ख़ुद लिखता हूँ। बेशक दो काबिल लोग उस पर निगाह रखते हैं कि कहीं कोई गलती तो नहीं कर रहा। उन्हें भी साँस लेने की फ़ुरसत नहीं होती। जो मैं पढ़ता हूँ उसे वो भी पढ़ते हैं और जो वो पढ़ते हैं उसे मैं भी पढ़ता हूँ।

हम पावर प्वाइंट चार्ट बनाकर काम नहीं करते इसलिए हमारा काम थोड़ा भारी है। थोड़ा ब्रेक चाहिए होता है। ऐसा बहुत दिन तक नहीं हो सकता कि आप हर दिन सुबह उठते ही छह बजे लैपटाप खोल लें।कार्यक्रम के रिसर्च को लेकर लोगों से लंबी लंबी बातें करें।

मैं इन सबसे ज़रा भी दुखी नहीं हूँ। दुखी होता तो सात आठ साल से हर दिन यह जीवन नहीं जी रहा होता। मुझे अपने काम में मज़ा आता है। लेकिन थकना भी स्वाभाविक है। रोज़ टाइप करते करते अंगुलियाँ दर्द करने लगती हैं।

कमर में दर्द होने लगता है। टीवी में अच्छे अच्छे लोग मेरी तरह सघनता से काम करने में दांत चियार देंगे। चार दिन में ही। मेरा ही शो अच्छा है मैं नहीं कह रहा। आप इसके पीछे की मेहनत का अध्ययन करें।

कौन सी कहां से आई, कैसे लाई गई होगी, कितना पढ़ा गया होगा, कैसे लिखा गया होगा, बीस काटते हैं मिटाते हैं फिर लिखते हैं। एक ग़लती होती है तो हज़ारों फ़ोन आते हैं फिर रात भर नींद नहीं आती। आँखें जलने लगती हैं।

क्या मैंने ख़ुद को महान बताने के लिए लिखा? बिल्कुल नहीं। आपने ऊपर पढ़ा कि मैं अब अपने लिए एकांत चाहता हूँ। सारी बातें पहले भी लिख चुका हूँ और फिर से इसलिए लिखा कि एक दर्शक और पाठक के तौर पर आप आज की पत्रकारिता को समझे। गोदी मीडिया का जन्म ही डिबेट से होता है।

इस पत्रकारिता के ज़रिए लोकतंत्र की हत्या हो चुकी है और हो रही है। जिसके लिए हमारे आपके पुरखों ने कितनी लंबी लड़ाई लड़ी। जान दी। आप भले कुछ नहीं करना चाहते हैं, लेकिन घर बैठे समझने में क्या दिक़्क़त है।

जिस भी हाल में हैं, ख़ुश रहिए। जल्दी मिलता

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