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नज़रियाः धारा 370, 35 ए हटने के बाद जम्मू और कश्मीर और देश पर एक नज़र

अविनाश कुमार पांडेय समर

जम्मू और कश्मीर से धारा 370 और 35 ए हटाने के साथ साथ उसका राज्य का दर्जा ख़त्म कर दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट देने के बाद मौसम में बहुत कुछ है। जीत के तमाम उद्घोष हैं। जिस देश में अपनी ही जाति में शादी प्रेम विवाह कर लेने पर घर से निकाल दिए जाने के साथ साथ असम्मान हत्याओं तक की संभावनाएं बन जाती हों उसमें बारात ले जाकर कश्मीरी ‘कलियों’ से ब्याह की दुंदुभियाँ हैं। जहाँ दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में प्लाट नहीं बिक पा रहे, वहाँ कश्मीर में घर खरीदने के सपने हैं। जिस देश में महाराष्ट्र और असम से लेकर गुजरात तक बात बेबात उत्तर भारतीयों पर हमले होते रहते हों, उसमें कश्मीर को मुख्या धारा में ले आने के दावे हैं।

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जो नहीं हैं वो हैं खुद कश्मीरियों की राय, कश्मीर ही नहीं पूरे देश के संघीय ढांचे सहित तमाम सांविधानिक सवाल, कूटनीतिक प्रभाव, वैश्विक प्रतिक्रिया, पाक अधिकृत कश्मीर, गिलगिट बाल्टिस्तान और चीन के कब्जे वाले अक्साई चिन का भविष्य। यह फैसला एक झूठे आख्यान को पेश कर लिया गया- आतंकी हमलों की संभावना बता अमरनाथ यात्रा अचानक रोक कर और कश्मीर में सुरक्षाबलों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि कर, वहाँ 2-2 पूर्व मुख्यमंत्रियों सहित भारत की मुख्यधारा से सहमत, भारतीय संविधान को मान कर संसदीय राजनीति करने वाले तमाम बड़े नेताओं को नज़रबंद कर जबकि राज्यपाल बोलते रहे कि ऐसा कुछ होने नहीं जा रहा। अभी पूरा जम्मू कश्मीर कर्फ्यू में है- माने कश्मीर के सवाल पर कश्मीरियों से कोई राय नहीं ली गई! बेशक इस मुद्दे के तमाम पक्षकार इसे अदालत ले जायेंगे और वहाँ भी कुछ होगा ही होगा- पर वह वैधानिक सवाल है, और लंबी प्रक्रिया का भी। अभी थोड़ा इस निर्णय से उठे फौरी सवालों और भारत पर असर की बात देखते हैं।

क्या होगी सूरत ए हाल

सबसे पहला और बड़ा सवाल- अनुच्छेद 35ए के रद्द होने के बाद बेशक तमाम बड़ी कंपनियां अपने सुरक्षा संसाधनों की वजह से कश्मीर में जाकर जमीन खरीद पाएंगी, अडानी से लेकर वेदांता और एस्सार तक तमाम बड़ी कंपनियां पहले भी माओवादी हिंसा प्रभावित इलाकों में काम करती ही रही हैं। पर क्या इस फैसले के बाद कश्मीरी पंडित घाटी लौट सकेंगे? अपने पुराने घरों को तो बेहतर ही होगा, पर कम से कम खासतौर पर सुरक्षा घेरे में बनाये गए इलाकों में ही सही। लौट आये तो क्या उन्हें ज़रूरी सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी? सुरक्षा की ज़रूरत कब तक ख़त्म हो जाएगी? एक साल? पांच? दस? कब तक?

पर एक मिनट के लिए कश्मीर छोड़ते हैं और देश के संघीय ढाँचे से शुरू करते हैं। भारत का संविधान बेशक संसद को राज्यों की सीमा बदलने का अधिकार देता है। पर संसद इस अधिकार का प्रयोग राज्य की चुनी हुई विधायिका की सलाह (बाध्यकारी नहीं) के बाद ही ले सकती है। अभी जम्मू कश्मीर में विधायिका है ही नहीं, सरकार ने उसे बिना चुने हुए राज्यपाल की सहमति से बदल दिया।

अब ऐसे में देखें- मान लें कि केंद्र सरकार किसी और राज्य- विपक्ष शाषित या केंद्र में सत्तारूढ़ दल शासित ही- राज्य के साथ ऐसा करे! जैसे पंजाब- दोनों सदनों में बहुमत है- राज्य सभा में नहीं है पर वह है जैसा ही है। सो एक दिन सरकार उठे और बोले कि पंजाब को तीन हिस्से में बाँट कर तीनों को केंद्र शासित क्षेत्र बना देंगे? जी- कश्मीर के उदाहरण के बाद यह बिलकुल संभव है!

हिन्दी पट्टी के राज्यों में क्या होगा असर

अब इस असीमित अधिकार का भारत पर फ़र्क़ क्या पड़ेगा? यह कि हिंदी पट्टी से सांस्कृतिक रूप से भिन्न प्रदेश तो असहज होंगे ही, लंबे समय से उग्रवाद से प्रभावित  सीमवर्ती राज्यों- जैसे नागालैंड- कैसा महसूस करेंगे? बात समझ न आई हो तो ऐसे देखें: यही केंद्र सरकार नागालैंड के प्रमुख अलगाववादी दाल नेशनल सोशलिस्ट कॉउंसिल ऑफ़ नागालिम (आइजैक मुवैया) [एनएससीएन (आईएम)] से शांति वार्ता कर रही है। बावजूद कि कि उस वार्ता की तमाम बातें सामने नहीं आई हैं पर उत्तर पूर्व के तमाम प्रतिष्ठित मीडिया समूहों के मुताबिक [एनएससीएन (आईएम)] का दावा है कि सरकार उनके लिए अलग संविधान, झंडे और पासपोर्ट- माने भारतीय संघ के अंदर बड़ी स्वायत्तता देने पर तैयार है। कश्मीर पर की गई इस कार्रवाई के बाद एनएससीएन (आईएम) और नागालैंड की आम जनता का भारत पर विश्वास बढ़ेगा या कम होगा? वहां शांति की संभावना और पूरे उत्तर पूर्व की भारत की मुख्यधारा में लौटने की उम्मीद ज़्यादा होगी या कम?

मसले और भी हैं। अब तक जम्मू कश्मीर की विधानसभा में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) की सीटें रिक्त होती थीं, उनका क्या होगा। कश्मीर को भारत की ‘मुख्यधारा’ में ले आने के बाद भारत सरकार पीओके, गिलगिट बाल्टिस्तान और चीन के कब्जे वाले अक्साई चिन को वापस हासिल करने के प्रयास करेगी या यथास्थिति पर छोड़ देगी। अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान से लगातार हट रहे होने, और इसीलिए पाकिस्तान के करीब जाने के बाद दक्षिण एशिया की बदलती हुई भूराजनीति पर क्या असर होगा। वैश्विक तथाकथित इस्लामिस्ट आतंकवाद ने हमेशा कश्मीर को अपना एक मुद्दा बताया है पर वे कभी बहुत सफल नहीं हुए क्योंकि फिलिस्तीन और ईराक़ जैसे देश हमेशा भारत के साथ खड़े रहे थे। अब, जब भारत इजराइल के बहुत करीब हो रहा है- उनका समर्थन भारत के साथ रहेगा या नहीं और नहीं रहा तो उसका कश्मीर पर क्या प्रभाव पड़ेगा।  बेशक अगर अफगानिस्तान से अमेरिका के निकल जाने के बाद बेरोजगार हो गए वैश्विक इस्लामिस्ट आतंकवादियों ने कश्मीर की तरफ रुख किया तो हमारी सेना और सुरक्षाबल उनसे निपटने में संभव हैं। पर फिर भी उसकी कीमत क्या होगी- कश्मीर घाटी 90 के भयावह दशक से बहुत आगे बढ़ आई थी, इतना कि वहाँ पर्यटक लौट आये थे। अब वहाँ क्या स्थिति होगी?

अंतर्राष्ट्रीय स्थिती क्या होगी?

एक मसला अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया का भी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प इस बीच लगातार भारत की कश्मीर पर स्थाई स्थिति को चुनौती देते हुए मध्यस्थता करने जैसे बयान देते रहे हैं। अमेरिका, फिर से, अफगानिस्तान से हटने की मज़बूरी में पाकिस्तान के करीब गया है, और जायेगा और चीन तो पाकिस्तान का हमेशा का मित्र ठहरा ही। अमेरिका के करीब आने की वजह से रूस भी अब हमारा वैसा करीबी नहीं रहा, वह भी पाकिस्तान के साथ सैन्य अभ्यास कर रहा है और उसे हथियार बेच रहा है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इस फैसले के बाद भारत की स्थिति और उसके लिए समर्थन कैसा होगा। याद करें कि आर्गेनाईजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) ने अपने पिछले शिखर सम्मेलन में भारत की तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को बुलाने के बावजूद और कश्मीर पर ‘भारतीय कब्जे” और “मानवाधिकारों के उल्लंघन” की कड़ी निंदा की थी। ओआईसी ने फिर पुलवामा हमले के बाद भी भारत द्वारा नियन्त्र रेखा पार कर पार कर ओआईसी संस्थापक सदस्य पाकिस्तान पर बम बरसाने की कड़ी निंदा की थी।

आइये उम्मीद करें कि हमारी सरकार इन सब मुद्दों से निपट लेगी। आइये उम्मीद करें कि कश्मीर में शांति भी लौटे और पंडित भी। आइये उम्मीद करें कि सब सवालों के बावजूद सुबह रौशन होगी, काले बादलों भरी नहीं!

(लेखक एशियन ह्यूमन राईट कमीशन के प्रोग्राम कॉर्डिनेटर हैं)

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