“मैं आपको एक ही मंत्र देता हूं ‘करो या मरो।’ आज़ादी डरपोकों के लिए नहीं है। जिनमें कुछ कर गुजरने की ताकत है, वही जिंदा रहते हैं।’ 8 अगस्त 1942 की रात्रि को कांग्रेस महासमिति के समक्ष ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के प्रस्ताव पर बोलते हुए…
तबलीगी जमात के मामले में कई मीडिया संस्थानों की गलत रिपोर्टिंग पर सवाल उठाने वाली जमीयत उलेमा ए हिंद की याचिका पर सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की कि सरकार तब तक हरकत में नहीं आती जब तक कि कोर्ट उन्हें निर्देश नहीं…
आनंद कुमार यह सर्वविदित है कि भारत दो सौ बरस तक ब्रिटेन के अधीन रहा और भारत के लोगों को अंग्रेजी राज से अपनी आज़ादी हासिल करने के लिए १८५७ से १९४७ तक लंबा अभियान चलाना पड़ा. लेकिन विदेशी राज से मुक्ति के सात दशकों…
“अगर तुमने अपनी माँ का दूध पिया है तो … ” अक्सर पुरानी फिल्मों में यह संवाद मिल जाया करता था जिसका अभिप्राय यह होता था कि यदि तुम में जोश , हिम्मत और साहस हो तो मुक़ाबले के लिए आओ। भारतीय परम्पराओं में एक…
पाटेश्वरी प्रसाद राजनीति में पता नहीं क्यों राजनेताओं के चेहरे से सच्चाई और मासूमियत कहीं खो जाती है। नेताओं के होंठों की मुस्कान कुटिल दिखने लगती है। कम ही ऐसे नेता होते हैं जिनको देख कर मन सम्मान और प्रेम से भर पाता है। उन…
अनिल जैन गंगा की निर्मलता और अविरलता के लिए 112 दिन तक अनशन करके 11 अक्टूबर, 2018 में अपने जीवन का अंत कर लेने वाले स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद ने अपनी मृत्यु से पहले प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्रों में उन्हें गंगा की अवहेलना करने, उसके…
रवीश कुमार रोज़ाना मैसेज आते हैं कि सर, हमारी परीक्षा रद्द करवा दें। कोरोना का ख़तरा है। वे जानते हैं कि मैं शिक्षा मंत्री नहीं हूं। न ही यू जी सी हूं। फिर भी लिखते हैं। छात्र सुप्रीम कोर्ट भी गए थे कि परीक्षा न…
ध्रुव गुप्त हिंदी फिल्मों की संगीत यात्रा में मरहूम मोहम्मद रफ़ी एक ऐसा पड़ाव है जहां कान तो क्या, कुछ देर के लिए रूह भी ठिठक जाया करती है। वे संगीत की वह अज़ीम शख्सियत थे जिनकी आवाज़ की शोख़ियों, गहराईयों, उमंग और दर्द के…
हफ़ीज़ किदवई आज के दिन बताइये रोएँ या खुश होएं।एक तरफ है एक कलम जो दुनिया में दस्तक देने आ रही तो दूसरी तरफ चली हुई कलम की आवाज़ की रूह दुनिया को अलविदा कह जा रही। एक तरफ क़िस्से खुद को कहने की क़तार…
रवीश कुमार सरकारी प्रबंधन एक जटिल काम है। इस काम को आम जनता समग्रता में नहीं देख पाती। प्रशासनिक निर्देश की अलग अलग ख़बरों से पता नहीं चलता कि किस तरह से तैयारी की जा रही है। स्थानीय अख़बारों में तो काफ़ी कुछ छपता है…
