गिरीश मालवीय

देश में आर्थिक गतिविधियो में लगातार कमी आती जा रही है नतीजा यह है कि एक बड़ा इकनॉमिक स्लो डाउन देखने में आ रहा है बिजनेस सेंटीमेंट पर खराब असर पड़ा है देश की आर्थिक वृद्धि पर उल्टा प्रभाव पड़ रहा है इन सबका एक बहुत बड़ा कारण है और वह है दोषपूर्ण जीसटी व्यवस्था। ठीक यही बात CAG भी मान रहा है नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि जीएसटी, जिसे देश के इतिहास के सबसे बड़े सुधारों में से एक माना जा रहा था, वह वांछित तरीके से काम नहीं कर रहा है। क्या आप यकीन करेंगे कि शुरुआत के दो साल बाद भी सिस्टम की वैधता वाला इनपुट टैक्स क्रेडिट का इनवॉइस से मिलान अब तक नहीं हो पा रहा है।

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CAG भी वही बात कह रहा है जो हम शुरू से कह रहे हैं कि सरकार ने जीएसटी को लाने से पहले इसका टेस्ट नहीं किया ओर यह व्यवस्था बेहद जल्दबाजी में लागू कर दी गयी CAG ने वित्त मंत्रालय के तहत आने वाले राजस्व विभाग, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) और जीएसटी नेटवर्क को उनकी असफलता को लेकर लताड़ा हैं जो GST को लागू होने के पहले पर्याप्त व्यवस्था नहीं कर सके।

और यह लताड़ इसलिए लगाई है क्योंकि रिटर्न व्यवस्था और तकनीकी व्यवधान की जटिलता की वजह से बिल मिलान, व्यवस्था जनित इनपुट टैक्स क्रेडिट की धोखाधड़ी सामने आई है। जबकि बिल मिलान को इसके सबसे बड़ा प्लस पॉइन्ट माना गया था 2 साल बीत जाने के बाद देश भर में लाखों फर्जी बिल सामने आए हैं अब पता चला है कि कई कंपनियां देश भर में कई फर्जी ट्रेडिंग कंपनियों के नाम पर बिल काटकर जीएसटी व इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) की चोरी कर रही थीं.

अब हुआ यह है कि जहाँ पहले सरकार जीएसटी को सुगम सुचारू बनाने में जुटी थी वही अब सरकार अब इस बात पर नजर रख रही है कि कर अधिकारियों को ज्यादा अधिकार कैसे दिए जाएं। यह जीएसटी की मूल भावना के प्रतिकूल है। इससे देश मे नया टेक्स टेररिज्म का माहौल बनता जा रहा है।

जीएसटी जिसे सरल टेक्स व्यवस्था कहा जा रहा था उसमें जीएसटी सालाना रिटर्न-9 भरने के लिए जो रिटर्न फॉर्म बनाया गया है उसमें 10 पेज के 66 कॉलम में 6 भाग हैं, जिनमें लगभग 468 जानकारियां मांगी हैं। इसमें सालभर पुरानी जानकारी भी शामिल है।यह फार्म देखकर व्यापारी तो छोड़िए CA भी अपना माथा ठोक रहे हैं।

क्या कहती है सरकार?

सरकार कहती है कि लाखों नए व्यवसायी जीएसटी से जुड़ रहे हैं लेकिन हकीकत क्या वह समझिए! करीब सवा करोड़ कारोबारियों को जीएसटी के दायरे में ले आने का दावा करने वाली सरकार को अब इसकी जमीनी हकीकतपता चली है. आंकड़े बताते हैं कि करीब 21% जीएसटी रजिस्टर्ड कारोबारियों ने एक भी पैसा टैक्स नहीं दिया है, जबकि 10% ने तो कभी रिटर्न ही नहीं भरा है। लेकिन इनके चलते सिस्टम पर लोड और सरकार की टैक्स कलेक्शन की लागत जरूर बढ़ गई है। इसके चलते अब कई व्यवसायी तो अपना GST रजिस्ट्रेशन सरेंडर कर रहे है.

इन सारी बातों का जो सम्मिलित परिणाम सामने आया है वह व्यापारियों के लिए आर्थिक मंदी है और सरकार के लिए बढ़ता हुआ राजस्व घाटा है. केंद्र सरकार जीएसटी के दो साल पूरे होने का जब जश्न मना रही है तो उसे इस कम राजस्व वसूली ने सबसे ज्यादा चिंतित किया है. राज्य भी अलग परेशान हैं जीएसटी ने राज्यों के लिए टैक्स लगाने के विकल्प सीमित कर दिए हैं जीएसटी लागू होने के बाद राज्य का राजस्व घाटा बढ़कर 20 प्रतिशत पर पहुंच गया है.

देश में जब जीएसटी लागू हुआ तो दलील दी जा रही थी कि इससे मैन्युफैक्चरिंग वाले उत्पादक राज्यों को भले ही कुछ राजस्व हानि हो लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उपभोग वाले राज्यों के राजस्व में उछाल आएगा। अब तक का अनुभव बताता है कि न सिर्फ उत्पादक राज्यों में जीएसटी संग्रह अनुमान से कम रहा है बल्कि उपभोग वाले राज्यों का हाल भी खराब है.

क्या है सीएजी का ख़ुलासा?

CAG जो अपनी रिपोर्ट में सबसे बड़ा खुलासा किया है वह यह है कि जीएसटी लागू होने के पहले साल के दौरान केंद्र सरकार का इन डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन 2017-18 में सुस्त होकर 5.80 प्रतिशत रह गया, जो 2016-17 में 21.33 प्रतिशत था। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है टैक्स कनेक्ट एडवाइजरी सर्विस के को फाउंडर विवेक जालान ने तो जीएसटी संग्रह में कमी को देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक करार तक दिया है।

अब कई व्यापारियों उद्योगपतियों को लगता है कि सरकार उनके उत्पादो पर GST घटा दे लेकिन अगर सरकार ऐसा करती है तो राजस्व संग्रह तो ओर भी कम हो जाएगा इसलिए सरकार के सामने अब साँप छछून्दर वाली स्थिति है ऐसी दोषपूर्ण टैक्स व्यवस्था लागू कर देश को बहुत बड़े गड्ढे की ओर धकेल दिया गया है. CAG की रिपोर्ट से यह साफ हो जाता है.

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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