नई दिल्लीः पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी मीडिया की साख पर कई बार सवाल खड़े हुए हैं। इसी के चलते कुछ राजनीतिक दलों ने न्यूज़ चैनल्स पर अपने प्रवक्ता भेजना बंद कर दिया था। दरअस्ल मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकार से सवाल नहीं पूछ रहा है बल्कि सवाल करने वालों पर ही सवाल दाग रहा है। ऐसे में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने हिन्दी मीडिया पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा है कि हिन्दी में मीडिया और प्रचार-संचार के अन्य माध्यमों का 95 फीसदी से ज्यादा हिस्सा आज अंधविश्वास, तर्कहीन पौराणिकता, धर्मांधता, निरंकुशता, सैन्यवाद और नकली राष्ट्रवाद के प्रचारक या कम से कम उन्हें बढ़ावा देने में जुटा है।

उर्मिलेश ने सोशल मीडिया पर टिप्पणी करते हुए कहा कि तर्कशीलता, वैज्ञानिक मिजाज़ व मूल्यों, लोकतंत्र व सेक्युलर संवैधानिकता के पक्ष में ज्यादातर चीजें अंग्रेजी मीडिया/लेखन के एक हिस्से में ही जगह पाती हैं! हिन्दी में ऐसे लेखन/प्रसारण के लिए मुख्यधारा के मीडिया में सारी जगहें सिकुड़ती गई हैं(सिर्फ एक उदाहरण ही काफी होगा।

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उन्होंने कहा कि  बंगाल स्थित सदर-मुकाम वाले एक बड़े मीडिया समूह का सीमित प्रसार वाला अंग्रेज़ी अखबार शानदार शीर्षकों के साथ सेक्युलर डेमोक्रेसी और संवैधानिकता के पक्ष में लिखता रहता है पर उसी समूह द्वारा संचालित एक बड़ा हिंदी चैनल रोजाना समाचार और विचार के नाम पर ‘कचरा’ उगलते दिखता है! इस मीडिया-शास्त्र का अर्थ समझना मुश्किल नहीं!)

वरिष्ठ पत्रकार ने पाठकों से अपील करते हुए कहा कि  सोचिए, धर्मांधता, तर्कहीन पौराणिकता, निरंकुशता और नकली राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा आधार आज हिन्दी क्षेत्र है! फिर अंग्रेजी में लिख, बोलकर या छपकर चाहे आप जितनी ‘बौद्धिक क्रांति’ कर लें, दिल्ली-मुंबई या कोलकाता के भद्रलोक में वाहवाही लूट लें पर भारत का मिज़ाज कैसे बदल सकते हैं? हिन्दी क्षेत्र में जनता का कौन और कितना सा हिस्सा अंग्रेजी में लिखे श्रेष्ठ लेखन या प्रसारण को पढ़ता/ देखता है?

उर्मिलेश के मुताबिक सिर्फ कुछ समझदार और संवेदनशील पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी और कार्यकर्त्ता उसे पढ़ते/देखते हैं। उससे शिक्षित होते हैं। पर जनता के बीच वे अपनी बात नहीं पहुंचा पाते क्योंकि संवाद और संप्रेषण के तमाम माध्यमों पर एक ही तरह के लोगों का कब्जा हो चुका है! फिर आप ही बताइए, कैसे बचेगा लोकतंत्र और संविधान?

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