हिमांशू कुमार

प्रकृति ने जो हर इंसान को अधिकार दिए हैं वही संविधान और कानून में मानव अधिकारों के रूप में ले लिए गए हैं. प्रकृति ने हर इंसान को क्या अधिकार दिया है. ध्यान दीजिए हर इंसान का पहला अधिकार है जिंदा रहने का अधिकार, संविधान में इसे ही राइट टू लाइफ कहा गया है. यानी आपका जिंदा रहने का अधिकार, हर इंसान का जिंदा रहने का अधिकार इसलिए जब कभी पुलिस या राज्य का कोई भी बंदूकधारी प्रतिनिधि किसी नागरिक को मारता है तो इस अधिकार का हनन होता है.

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दूसरा अधिकार है बराबरी का अधिकार. संयुक्त राष्ट्र संघ के मानव अधिकारों की घोषणा की पहली लाइन है हर मनुष्य समान है उसके अधिकार उसका सम्मान और अवसर बराबर है. लेकिन जब कभी कोई समाज कहता है कि मुसलमान के मुकाबले हिंदू बेहतर है या एक दलित के मुकाबले ब्राह्मण बेहतर है तो वह असल में मानव अधिकार का हनन कर रहा है. इसलिए सांप्रदायिकता और जातिवाद मानव अधिकारों का हनन है, इसके साथ साथ ही न्याय का अधिकार हर व्यक्ति का मानव अधिकार है। संविधान ने तीन तरह के न्याय की पहचान करी है। पहला है आर्थिक न्याय, यानी हर एक को उसकी मेहनत का फल उसी को मिलना चाहिए, ऐसा नहीं होना चाहिए कि मेहनत मजदूर करें और अमीर अंबानी बने, यह अन्याय है। यह आर्थिक अन्याय है। आजादी के वक्त से ही यह वादा किया गया था कि कमाने वाला खाएगा लूटने वाला जाएगा। लेकिन अभी लूटने वाले ही सर्वशक्तिमान बने बैठे हैं।

दूसरा न्याय है सामाजिक न्याय, अर्थात समाज में स्त्री और पुरुष समान हों जाति के आधार पर कोई छोटा-बड़ा न समझा जाए मजहब के आधार पर कोई छोटा-बड़ा ना समझा जाए। शहर में रहने या आदिवासी इलाके में रहने की वजह से कोई भेदभाव ना किया जाए। विकलांग होने के कारण या आपकी लैंगिक स्थिति के कारण चाहे आप ट्रांसजेंडर हो या कोई और आपके साथ भेदभाव ना किया जाए। तीसरा है राजनीतिक न्याय, हर व्यक्ति को राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने की आजादी वोट देने की आजादी होनी चाहिए राजनैतिक फैसलों में हर नागरिक की भागीदारी और सहमति होनी चाहिए. लेकिन अभी तो चुने हुए प्रतिनिधि अपनी मर्जी से फैसला लेते हैं और चुनाव में पैसे का इस्तेमाल किया जाता है अब तो ईवीएम भी इस्तेमाल करी जा रही है और राजनैतिक न्याय की अवधारणा खतरे में पड़ती जा रही है. इन अधिकारों का हनन होने पर व्यक्ति न्यायालय में जाकर अपने मानव अधिकारों की रक्षा के लिए शिकायत कर सकता है. भारत में न्यायालय को सरकार से आजाद रखा गया है. बड़े ही दुख की बात है कि अब न्यायालय सरकारों से डरकर काम कर रहे हैं.

इसके अलावा बहुत सारे जज अमीर और बड़ी जातियों के हैं वह सामाजिक न्याय और आर्थिक न्याय की अवधारणा की इज्जत नहीं कर रहे हैं. इसलिए आज आदिवासियों को धड़ल्ले से मारा जाता है दलितों की बस्तियां जला दी जाती है मुसलमानों को सबके सामने मार दिया जाता है लेकिन न्यायालय कभी भी पुलिस या सरकार को इसके लिए दंडित नहीं करते, इसी वजह से आज भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव अधिकार के मामले में बहुत ही खराब स्थिति है। हम अगर देश के किसी भी एक इंसान के मानव अधिकारों के हनन को स्वीकार कर लेते हैं तो इसका मतलब है हम हर एक के मानव अधिकारों का हनन स्वीकार कर रहे हैं। और यही हो रहा है जब आदिवासियों के मानव अधिकारों का हनन होता है तो मुसलमान चुप रहते हैं जब मुसलमानों के मानव अधिकारों का हनन होता है तो हिंदू चुप रहते हैं जब दलितों के मानव अधिकारों का हनन होता है तो आदिवासी चुप रहते हैं।

इस तरह बारी-बारी सबके मानव अधिकारों का हनन होता है और मिलकर कोई आवाज नहीं उठ पाती है। आज बहुत सारे मानवाधिकार कार्यकर्ता जेलों में पड़े हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी जाति धर्म आर्थिक स्थिति पर आधारित सोच को छोड़ा और देश के दलितों आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के संविधान तथा कानून और इंसानियत के पक्ष में आवाज उठाई। इन लोगों को जेल में डाल कर भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह एक जातिवादी सांप्रदायिक क्रूर तथा बदमाश सत्ता द्वारा शासित देश है। भारत देश को अगर अपनी छवि सुधारनी है तो भारत की जनता को जाति सांप्रदायिकता आर्थिक वर्ग भेद से ऊपर उठकर हर इंसान के मानव अधिकार के हनन पर आवाज उठानी होगी अन्यथा किसी के भी मानव अधिकार नहीं बच सकते। अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस पर आपको कम से कम इतना तो करना ही चाहिए।

(लेखक सोशल एक्टिविस्ट एंव मावाधिकार कार्यकर्ता हैं)

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