प्रेम कुमार

ओडिशा हाईकोर्ट ने कहा है कि बगैर जांच के प्रदेश में किसी को नहीं लाया जाए, इस आदेश के साथ ही प्रवासी मजदूरों के अपने प्रदेश को लौटने का सपना धराशायी हो गया, काश! ऐसा ही आदेश हिन्दुस्तान की सरकार के लिए भी होता कि बगैर जांच के किसी विदेशी को भारत आने नहीं दिया जाएगा! काश! यही आदेश विदेशों से स्पेशल हवाई जहाज में आने वाले एनआरआई के लिए भी दिया गया होता! सवाल यह है कि क्या देश भर में अपने प्रांतों में लौट रहे प्रवासी मजदूरों की यात्राएं रद्द हो जाएंगी? अगर नहीं, तो सिर्फ ओडिशा में ऐसा क्यों? अगर हां, तो कुछ बातों पर गौर करना बहुत जरूरी है,

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केवल मुंबई में उत्तर प्रदेश के 18 लाख लोग रहते हैं, पूरे महाराष्ट्र में यह संख्या दुगुनी है, उद्धव ठाकरे और योगी आदित्यानाथ की सरकारों में इसी बात पर सहमति नहीं बन पा रही थी कि जो लोग यूपी लौटना चाहते हैं उन्हें टेस्ट कराकर भेजा जाए या उनका टेस्ट यूपी में पहुंचने के बाद हो, दोनों ही राज्य सरकारें इस आबादी को बोझ की तरह देख रही हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है, मगर, व्यवहारिक सवाल यह है कि जब पूरे देश में अब तक 15 लाख लोगों के टेस्ट भी नहीं हो पाए हैं ऐसे में ‘टेस्ट कराकर वापस भेजने’ का मतलब और मकसद क्या है? न मुंबई में 18 और महाराष्ट्र में 36 लाख यूपी के लोगों का टेस्ट होगा और न वे लौट पाएंगे,

बिहार के साथ भी यही बात है जहां से 27 लाख मजदूर महाराष्ट्र और दूसरे दक्षिण के राज्यों में हैं, देशभर में बिहार के 3 करोड़ लोग प्रदेश से बाहर रहते हैं, ओडिशा के 3 लाख प्रवासी मजदूर अकेले सूरत शहर में फंसे हैं, रोजगार खत्म, किराया देने को पैसे नहीं, खाने-रहने को पैसे नहीं, सरकार की मदद दिखावा साबित हो रही है, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, तेलंगाना हर प्रदेश में प्रवासी मजदूर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं, मजदूरों के गुस्से को देखते हुए ही नियमों में ढील दी गयी और स्पेशल ट्रेन चलने शुरू हुए,

ओडिशा हाईकोर्ट के फैसले के बाद प्रवासी मजदूर हताश और निराश होंगे, अब यह सवाल भी उठेगा कि क्या इन मजदूरों ने जो गुस्सा दिखाया, वह गलत था? पैदल चलकर अपने घर को लौटने का उनका इरादा गलत था? टेस्टिंग कराने के लिए अगर हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिए होते, तो बात समझ में आती, मगर, ऐसा कोई निर्देश भी नहीं दिया गया, ऐसे में राज्य सरकार क्यों गरीब मजदूरों की टेस्टिंग पर पैसा बर्बाद करेगी? प्राइवेट टेस्टिंग पर 4500 रुपये को अदालत ने ही सही ठहराया था, इतने पैसे अगर राज्य सरकारें खर्च करने को तैयार हो जाएं, तो मजदूर पलायन ही क्यों करें?

बिहार सरकार हो या उत्तर प्रदेश सरकार या फिर दूसरे प्रांतों की सरकारें ये अपने प्रदेश में लौट रहे गरीबों को क्वॉरंटाइन तक करा पाने में मुश्किलें देख रही हैं, इस दौरान कोई इलाज नहीं कराना है, बस किसी स्कूल के अहाते में छोड़ देना है, भोजन की व्यवस्था कर दी, तो गरीब मजदूरों की किस्मत, नहीं की, तो उनकी गरीब मजदूरों की आवाज बाहर आने में भी वक्त लगता है, ऐसी सरकारों से क्या कोई टेस्टिंग कराने और फिर सर्टिफिकेट देकर दूसरे प्रदेशों में भेजने की उम्मीद कर सकता है? भले ही ये सरकारें महाराष्ट्र, गुजरात और अन्य अमीर प्रांतों की ही क्यों न हों?

तो क्या माना जाए? अब मजदूरों को घर में भूखे बैठ जाना चाहिए? अपने प्रदेश लौटने की जिद छोड़ देनी चाहिए? यह कोई मजदूरों का पर्यटकीय शौक नहीं है, घूमने-फिरने की इजाजत वे नहीं मांग रहे हैं, उनके पास अब कोई चारा नहीं है, अपने घर लौटने को वे उम्मीद भरा रास्ता मानते हैं, हालांकि यह भी कोई रास्ता नहीं है

उम्मीद केंद्र सरकार से की जानी चाहिए, देश के तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ एक बैठक की जाए, गरीब मजदूरों को जो जहां हैं, वहीं पर पूरी लॉकडाउन खत्म होने या फिर दोबारा नौकरी की सूरत बनने तक खाने-पीने और रहने की व्यवस्था करनी चाहिए, इस काम में अगर सरकार के पास धन की कमी हो रही है तो केंद्र सरकार उसे पूरा करे, इसके बावजूद अगर मजदूर पैदल घर से निकलते हैं तो इसका मतलब यह है कि उनके रहने की व्यवस्था में कमी है,

उन्हें घर लौटने से जबरन रोकने का कोई मतलब नहीं है, न कोई अदालत और न कोई सरकार मजबूर और लाचार लोगों पर हुकुम चलाए क्योंकि ये हुकुम माने नहीं जा पाएंगे, केंद्र सरकार ने 29 अप्रैल को अपने हुकुम को हल्का किया, लोगों को आवाजाही के लिए हामी भरी, मगर, अब ओडिशा हाईकोर्ट का फैसला आ गया है, इस फैसले को मजदूरों के हक में बदलने का काम केंद्र और राज्य सरकार मिलकर कर सकती है, क्या ऐसा हो पाएगा?

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