जितेंद्र चौधरी

सैनिक क्या है इस बात को एक छोटी सी कविता से शुरू करता हूं;

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किसी गजरे की खुशबु को महकता छोड़ आया हूँ,

मेरी नन्ही-सी चिड़िया को चहकता छोड़ आया हूँ,

मुझे छाती से अपनी तू लगा लेना ऐ भारत माँ,

मैं अपनी माँ की बाहों को तरसता छोड़ आया हूँ..!!

राजनीतिक लोग सिर्फ सैनिक की शहादत का फायदा उठाना जानते हैं। दूसरी तरफ यह इतने निष्ठुर हो जाते हैं कि भारत-चीन सीमा पर भारत माता की रक्षा के लिये अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले शहीद कुंदन कुमार के परिवार से अंतिम संस्कार के इंतज़ाम में लगे टेंट आदि का पैसा भी माँग लेते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की एक बात से मैं बिल्कुल सहमत हूं जब 2013 में अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था; “देश संकटो के बीच खड़ा है। पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा। चीन आँख दिखा रहा है, हमारी जमीन में घुस रहा है। इतना ही नहीं देश के जवानों को शहीद भी किया है। अभी पड़ोसी देश हमें परेशान कर रहे है, इसमें सेना की कमजोरी नहीं हैं। मित्रों, समस्या सीमा पर नहीं दिल्ली में है।” 

समस्या आज भी दिल्ली में ही है। कुछ भी नहीं बदला है बल्कि हालात और खराब हुए हैं। आज नेपाल भी चीन जैसी हरकतें कर रहा है। पहली बार सीमा पर नेपाल ने अपनी फौज लगाई है।  दिल्ली की आंखें लाल नहीं हो रही है। भूटान भी आंखें दिखा रहा है। दिल्ली बोल रही है, ‘करारा जवाब दिया’। लेकिन वह करारा जवाब किसको दिया और कैसे दिया यह किसी को नहीं मालूम है।

सीमा पर सैनिक जान से हाथ धो रहे हैं और दिल्ली जिम्मेदारियों से हाथ धो रही है।

एक सैनिक भारत मां का सच्चा सेवक है और राजनेता रिश्वत और  छल बल पर खड़े हैं।

राजनेता बेशर्मी की हद तक जाकर सैन्य अभियानों का श्रेय ले लेते हैं। यहां तक की वह भारतीय सशस्त्र सेना को “मोदी जी की सेना” बताने से भी नहीं हिचकते।

सीमा पर सैनिक अपना सर्वोच्च बलिदान देता है और दूसरी तरफ बेशर्म राजनेता सिर्फ झूठ और झूठ बोलते हैं। दुश्मन देशों से दोस्ती निभाते हैं, वहां की यात्राएं करते हैं, उनकी दोस्ती का दंभ भरते हैं।

सैनिक अपनी मातृभूमि को बचाने के लिए विपरीत परिस्थितियों में दिन रात काम करता है, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए हमेशा झूठ बोलती है। झूठे मामलों को उठाकर देश की भोली-भाली जनता को गुमराह और भ्रमित करती है।

हमारे वीर सैनिक, चाहे तापमान जीरो डिग्री हो या 50 डिग्री, भारत माता का मस्तक नहीं झुकने देते। दूसरी तरफ दिल्ली सारी सुख सुविधाओं का मजा लेते हुए केवल गाल बजाती रहती है।

सैनिक सीमा पर सच्ची राष्ट्रभक्ति दिखाता है और दिल्ली झूठे राष्ट्रवाद का गुणगान करती है।

यदि हमारे वीर सैनिक दुश्मन की चौकियों को नष्ट कर दे तो  दिल्ली सर्जिकल स्ट्राइक का नाम  देकर अपनी पीठ थपथपा लेती है। परंतु जब हमारे जवान चाइना बॉर्डर पर शहीद हो जाते हैं तो दिल्ली सेना में कमी ढूंढती है।

गरीब किसान के बच्चे देश की सेवा के लिए सेना में जाते हैं किसी भी  राजनेता के बच्चे सेना में नहीं जाते। राजनेताओं के बच्चे पढ़ाई करने विदेश जाते हैं और बेहतरीन कॉर्पोरेट कल्चर में जीवन बिताते हैं। जब सेना के जवान पराक्रम दिखाते हुए सीमाओं पर शहीद होते हैं तो राजनेता उनकी अर्थी को कंधा देने का ही काम करते हैं, कोरोना काल में तो वह भी नहीं कर रहे।

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