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प्रवासी मजदूर: SC ने सवाल पूछा मोदी सरकार से, भार डाला राज्य सरकारों पर

जेपी सिंह

-प्रवासी श्रमिकों के लिए ट्रेन या बस से कोई किराया नहीं लिया जाएगा। रेलवे का किराया राज्यों द्वारा साझा किया जाएगा।

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-प्रवासी श्रमिकों को संबंधित राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों द्वारा उन स्थानों पर भोजन और भोजन उपलब्ध कराया जाएगा, जहां वे ट्रेन या बस में चढ़ने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

-रेल यात्रा के दौरान, राज्य भोजन और पानी उपलब्ध कराएंगे।

रेलवे को प्रवासी श्रमिकों को भोजन और पानी उपलब्ध कराना चाहिए। बसों में भोजन और पानी भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

-राज्य प्रवासियों और राज्यों के पंजीकरण की देखरेख करेंगे ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पंजीकरण के बाद, उन्हें जल्द से जल्द परिवहन मुहैया कराया जा सके।

-जिन प्रवासी श्रमिकों को सड़कों पर चलते हुए पाएं, उन्हें तुरंत आश्रयों में ले जाएं और उन्हें वहां भोजन और सभी सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए।

– जब राज्य सरकारें ट्रेनों के लिए अनुरोध करें, तो रेलवे उन्हें प्रदान करे।

उक्त निर्देश देते हुए उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह केंद्र सरकार नहीं बल्कि राज्य सरकारों को निर्देश जारी कर रही है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अखबारों में छपी खबरें और मीडिया रिपोर्ट लगातार लंबी दूरी तक पैदल और साइकिल से चलने वाले प्रवासी मजदूरों की दुर्भाग्यपूर्ण और दयनीय स्थिति दिखा रही हैं। जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने कहा कि भले ही इस मुद्दे को राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर देखा जा रहा हो, लेकिन प्रभावी और स्थिति को बेहतर बनाने के लिए केंद्रित प्रयासों की आवश्यकता है।

बहस के दौरान पीठ ने केंद्र से कई तीखे सवाल पूछे। सुनवाई के दौरान सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने आज भी उच्चतम न्यायालय को भरमाने की पूरी कोशिश की और कहा कि कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हुई हैं। उन्हें बार-बार मीडिया में दिखाया गया। ऐसा नहीं कि सरकार कदम नहीं उठा रही है। जिस पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हम यह नहीं कह रहे कि सरकार कुछ नहीं कर रही है लेकिन ज़रूरतमंदों तक मदद पहुंच नहीं पा रही है।

सरकार की तरफ से दलील रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कुछ खास जगहों पर कुछ वाकये हुए जिससे प्रवासी मजदूरों को परेशानी उठानी पड़ी है। हम इस बात के शुक्रगुजार हैं कि आपने इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया। मेहता ने कहा कि सरकार ने मजदूरों के लिए 3700 ट्रेनों का संचालन किया। उनके लिए खाने-पीने का बजट बनाकर राशि भी मुहैया कराई गई। इस पर अदालत ने कहा कि सरकार ने तो कोशिश की है लेकिन राज्य सरकारों के जरिए जरूरतमंद मजदूरों तक चीजें सुचारू रूप से नहीं पहुंच पा रही हैं।

पीठ ने सवाल किया कि प्रवासी मजदूरों को टिकट कौन दे रहा है, उसका भुगतान कौन कर रहा है? पीठ ने कहा कि टिकट के पेमेंट के बारे में कंफ्यूजन है और इसी कारण मिडिल मैन ने पूरी तरह से शोषण किया है। सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि मैं इसका विस्तृत जवाब दूंगा। या तो यात्रा का शुरुआती राज्य या अंतिम राज्य पैसे दे रहा है। पीठ ने सवाल किया कि ऐसी घटनाएं हुई हैं कि राज्य ने प्रवासी मजदूरों को प्रवेश से रोका है। तब सॉलिसिटर ने कहा कि राज्य सरकार लेने को तैयार है।

कोई भी राज्य प्रवासी के प्रवेश रोक नहीं सकता। वह भारत के नागरिक हैं। पीठ ने सवाल किया कि जब पहचान सुनिश्चित हो जाती है कि प्रावसी मजदूर हैं तो उन्हें भेजने में कितना वक्त लगता है। उन्हें हफ्ते 10 दिन में भेजा जाना चाहिए। इस पर केंद्र के वकील ने कहा कि अभी तक एक करोड़ से ऊपर प्रवासी मजदूर भेजे जा चुके हैं। जो पैदल जा रहे हैं वह अवसाद और अन्य कारणों से ऐसा कर रहे हैं।

इस पर सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि दो कारणों से लॉकडाउन को लागू किया गया था। पहला कोरोना वायरस संक्रमण की कड़ी को तोड़ना तो दूसरा अस्पतालों में समुचित इंतजाम करना था। जब लाखों की तादाद में मजदूरों ने देश के विभिन्न हिस्सों से पलायन करना शुरू किया तो उन्हें रोकने के दो कारण थे। पहला प्रवासियों को रोककर संक्रमण को शहरों से गांवों तक फैलने से रोकना और दूसरा यह कि वे रास्ते में एक-दूसरे को संक्रमित न कर पाएं।

सॉलिसीटर जनरल ने कहा केंद्र सरकार ने तय किया है कि प्रवासी मजदूरों को शिफ्ट किया जाएगा, सरकार तब तक प्रयास जारी रखेगी जब तक एक भी प्रवासी रह जाता है। पीठ ने पूछा कि मुख्य समस्या श्रमिकों के आने-जाने और भोजन की है, उनको खाना कौन दे रहा है? जवाब में मेहता ने कहा कि सरकार दे रही है। तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र सरकार ने अभी 3700 ट्रेनें प्रवासी मजदूरों के लिए चला रखीं है, अभी तक 91 लाख प्रवासी मजदूर अपने गांव जा चुके हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पड़ोसी राज्यों के सहयोग से 40 लाख को सड़क से शिफ्ट किया गया है। मेहता ने कहा कि एक मई से लेकर 27 मई तक कुल 91 लाख प्रवासी मजदूर शिफ्ट कर दिए गए हैं।

पीठ ने मेहता से कहा कि यह सुनिश्चित करें कि श्रमिक जब तक अपने गांव न पहुंच जाएं उनको भोजन-पानी और अन्य सुविधाएं मिलती रहनी चाहिए। इसके बाद अदालत ने कहा कि श्रमिकों को अपने गृह राज्य पहुंचने में कितने दिन लगेंगे। जवाब में सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि यह राज्य बताएंगे। जिन दूर दराज के इलाकों में स्पेशल ट्रेन नहीं जा रहीं, वहां तक रेल मंत्रालय मेमू ट्रेन चलाकर उनको भेज रहा है।

पीठ ने कहा कि हमने नोटिस किया है कि प्रवासी मजदूरों के रजिस्ट्रेशन, परिवहन और उन्हें खाना-पानी देने की प्रक्रिया में बहुत कमी रही। कोर्ट ने कहा कि जो भी मजदूर पैदल घर जा रहे हैं उन्हें तुरंत खाना और रहने की जगह उपलब्ध कराई जाएगी। इसी के साथ कोर्ट ने इस मामले पर अगली सुनवाई 5 जून को तय की। मेहता ने दलील दी कि उच्चतम न्यायालय  को राजनीतिक मंच नहीं बनाया जाना चाहिए। इस पर याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि यह मानवीय आपदा है। तब मेहता ने पूछा कि आप का इस आपदा से निपटने के लिए क्या योगदान है। फिर सिब्बल बोले। 4 करोड़ रुपये। ये मेरा योगदान है।

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि सिर्फ 3 फीसदी ट्रेनों का इस्तेमाल हो रहा है और ट्रेनें चलाई जानी चाहिए। ताकि प्रवासी मजदूरों को घर भेजा जा सके। एक अन्य वकील वरिष्ठ इंदिरा जयसिंह ने कहा कि सिर्फ 3 फीसदी ट्रेनों का इस्तेमाल हो रहा है और चार करोड़ मजदूर हैं। ज्यादा ट्रेन चाहिए। सिब्बल ने कहा पिछली जनगणना में 3 करोड़ प्रवासी मजदूर थे। अब 4 करोड़ हो चुके हैं। सरकार ने 27 दिन में 91 लाख भेजे हैं। इस तरह तो चार करोड़ को भेजने में तीन महीने और लगेंगे। सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सिब्बल कैसे कह सकते हैं कि सभी जाना चाहते हैं। तब सिब्बल ने कहा कि आपको कैसे पता कि नहीं जाना चाहते?

प्रवासी मजदूरों के मामले में रणदीप सिंह सुरजेवाला की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए। केंद्र सरकार ने इसका विरोध किया और कहा कि इसका राजनीतिकरण किया जा रहा है। पीठ ने कहा वह सिर्फ कुछ सुझाव सुनेगा इसके अलावा कुछ नहीं। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में मंगलवार को स्वत: संज्ञान लिया था और कहा था कि मजदूरों की हालत खराब है। उनके लिए सरकार ने जो इंतजाम किए हैं वे नाकाफी हैं। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर 28 मई तक जवाब मांगा था।

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