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बीते 40 साल से ईरान अपनी इस्लामी क्रांति की रक्षा के लिए कुरबानी दे रहा है, जानिये क्यों?

डॉ अकबरी

मैं अपनी बात को तीन बिन्दुओं पर स्थिर करना चाहता हूँ। पहली बात अमेरिका हर स्तर पर शक्ति प्रदर्शन का इच्छुक है। वह फौजी ताकत के आधार पर ग़ुलाम बनाने का आदी है। मेरी बात का दूसरा पहलू बड़ी शक्तियों का साथ देने वाले कमज़ोर राष्ट्रों की स्थिति से जुड़ा है और तीसरी और अहम बात ईरान अपनी सम्प्रभुता और स्वतंत्रता को नष्ट नहीं कर सकता।

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अल्लाह ने जिस मानवता की रचना की है। अल्लाह की मेहरबानी होगी इस व्यक्ति के साथ जो अत्याचार का विरोधी है। आप देखिए कि अमेरिका भी ब्रिटेन से स्वतंत्र होने पर गर्व करता है। फ्रांस को अपनी क्रांति पर गर्व है और आज भी वहां की जनता प्रदर्शन के सहारे अपनी क्रांति पर गर्व को जताते हैं। आज फ्रांस को तेल अवीव, लंदन और वॉशिंगटन मिलकर दबाना चाहते हैं मगर फ्रांस की जनता को यह मंज़ूर नहीं। चीनी अपनी क्रांति और रूसी बोल्शेविक की क्रांति पर गर्व महसूस करते हैं। भारतीय महात्मा गांधी के संघर्ष और स्वतंत्रता संग्राम पर गर्व करते हैं। इन देशों ने जान और माल की क़ुरबानी देकर स्वतंत्रता और सम्प्रभुता की रक्षा की है।

ऐसा ही नाज़ ईरानियों को अपनी इस्लामी क्रांति पर है। हम पिछले 40 साल से अपनी क्रांति की रक्षा के लिए कुरबानी दे रहे हैं। ईरान की सरकार इस्लाम के मूल्यों पर आधारित है। हम जनता की पसंद के आधार पर सरकार का गठन करते हैं और हमारे चुनाव निष्पक्ष होते हैं। हमारी सरकार इस्लामी बुनियाद पर ही निर्भर करती है। ईरान विस्तारवादी शक्तियों का विरोधी है। अमेरिका से हमारा विरोध फिलस्तीन पर ज़ुल्म के मुद्दे पर है। अमेरिका ईरान से चाहता है कि हम ज़ायोनी एजेंडे पर राज़ी हो जाएं और समझौता कर लें मगर ईरान जानता है फिलस्तीन एक मानवीय मसला है। अगर ईरान फिलस्तीन की स्वतंत्रता की रक्षा नहीं करता है तो हम इस्लामी क्रांति के सिद्धांतों की दुहाई नहीं दे सकते। हमारा विश्वास है, ना अत्याचार करेंगे और ना ही सहन करेंगे।

इराक़ ने हम पर आठ वर्ष तक हमला किया और हम निहत्थे इस ज़ुल्म से लड़े। हम ही कामयाब रहे। आज एक भी देश हमारे विरुद्ध प्रतिबंधों का विरोधी नहीं है क्योंकि हमारा विरोध विचारधारा का है। हमने कभी भी पहले हमला नहीं किया और आज भी हम युद्ध के हामी नहीं हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा मानते थे कि ईरान परमाणु बम नहीं बना रहा लेकिन हमारी आर्थिक नाकेबंदी की तैयारी कर दी गई। जब 5+1 देशों से हमने बातचीत शुरू की थी तो हम जानते थे कि अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता। ईरान की ही मंशा थी कि अमेरिका के अलावा वीटो शक्ति देश और यूरोपीय यूनियन इस समझौते में पार्टी बने। यह ईरान की उस प्रतिबद्धता का प्रचार था कि हम परमाणु बम नहीं बना रहे। आज अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस समझौते को जहाँ पहुँचा दिया है वह ईरान के नहीं, ओबामा के विरोध में किया है। ईरान आज भी समझौता का लिहाज करता है लेकिन यूरोपीय यूनियन को नहीं पता कि इस समझौते में वह कैसे आगे बढ़े।

हमने इस्लाम को एक घर माना है। मिस्र के साथ हमारे शुरूआती कूटनीतिक समझौते इसलिए नहीं रहे क्योंकि उसने ज़ायोनी इजराइल के साथ अपने संबंध स्थापित कर लिए थे। मिस्र में क्रांति के बाद सत्ता में आए मुहम्मद मुरसी को हमने समझाया था कि वह एहतियात बरतें लेकिन वह गच्चा खा गए औऱ बर्बाद हो गए। मेरा मानना है कि मुस्लिम ब्रदरहुड का आंदोलन एक संवेदनशील आंदोलन है।  मुस्लिम ब्रदरहुड के संस्थापक हसन अलबन्ना का उद्देश्य था इस्लामी विश्व का एकीकरण। ईरान में मुस्लिम ब्रदरहुड की राजनीतिक गतिविधियाँ चलती हैं।

आज फिलस्तीन इसलिए परेशान है क्योंकि मुसलमानों के अंदरूनी मसले बहुत हैं। खाड़ी में 50 हज़ार अमेरिकी सैनिक खड़े हैं और बहुत से देश ज़ायोनी ताक़तों का साथ दे रहे हैं। यह देश अमेरिका के दबाव में निर्णय लेते हैं। सऊदी अरब के साथ हम बेहतर संबंध चाहते हैं। सऊदी अरब के साथ हमारा कोई सीमा विवाद नहीं है। हम सऊदी अरब की जनता के साथ हैं। हमें इस बात का दुख है कि सऊदी अरब को दबाव में लाकर अमेरिका ने उसे 50 अरब डॉलर के हथियार बेच दिए। जिस घड़ी अरब पर अलसऊद ने सत्ता संभाली अमेरिका ने उन्हें अधीन लेने का वादा किया था लेकिन आज यह वादा सिर्फ सलमान के साथ रह गया है। आज अमेरिका और सऊदी अरब के बीच चार वादे रह गए हैं- पहला इजराइल से सऊदी अरब पूरी दोस्ती निभाएगा, दूसरा अमेरिका को सऊदी अरब 15 अरब डॉलर का भुगतान करेगा, तीसरा ईरान से जंग होने पर सऊदी अरब अमेरिका का साथ देगा और चौथा लीबिया, सीरिया, यमन, बहरीन और मिस्र में अमेरिकी नीतियों का सऊदी अरब समर्थन करेगा।

(डॉ अकबरी ने ये बातें भारतीय पत्रकारों को तेहरान में बताईं हैं, डॉ अकबरी ईरान के पूर्व कूटनीतिज्ञ और चिन्तक हैं। उन्होंने खाड़ी और क्षेत्रीय राजनीति पर 15 पुस्तकें लिखी हैं)

अरब रोज़ाना दो करोड़ बैरल तेल टैंकरों में भरकर रवाना करता है। अरब चाहे तो 10 दिन तेल बंद करके दुनिया से अपनी मांगें मनवा सकता है। आज पांच साल हो गए यमन सऊदी अरब के ज़ुल्म से तंग है। सऊदी अरब की विचारधारा और दुर्दान्त आतंकवादी संगठन आइएसआइएस में कोई अन्तर नहीं।

 (डॉ अकबरी ने ये बातें भारतीय पत्रकारों को तेहरान में बताईं हैं,  डॉ अकबरी ईरान के पूर्व कूटनीतिज्ञ और चिन्तक हैं। उन्होंने खाड़ी और क्षेत्रीय राजनीति पर 15 पुस्तकें लिखी हैं)

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