तालिबान से बात करने का निर्णय देर से लिया गया अच्छा क़दम है

  • विदेश नीति को वोट बैंक राजनीति का हिस्सा न बनाया जाए

उबैद उल्लाह नासिर
अफगानिस्तान पर तालिबान का क़ब्ज़ा बिलकुल साफ़ दिखाई दे रहा था भले ही यह क़ब्ज़ा कुछ दिनों या कुछ हफ़्तों पहले हो गया हो लेकिन मोदी सरकार इस सम्बन्ध में न तब कोई स्पष्ट नीति बना सकी थी और न कब्जे के बहुत दिनों बाद भी कोई साफ़ स्टैंड ले पायी है I लेकिन यह क़ब्ज़ा बीजेपी के लिए एक सियासी उपहार बन गया जिसका प्रयोग वह मुसलमानों को कट्टरपसंद साबित करने और अफगानिस्तान की तरह कश्मीर पर भी तालिबान के कब्जे या हमले का अंदेशा दिखा कर उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में अपनी नाव पार कराने की योजना बना चुकी है I इसके लिए टी वी चेनलो सोशल मीडिया व्हात्ट्स अप्प आदि का प्रयोग शुरू हो गया है I एक ओर आज हुई सर्वदलीय बैठक जिसके बुलाने में ही सरकार ने कई दिन लगा दिए उसमें  भी प्रधान मंत्री शरीक नहीं हुए इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर प्रधान मंत्री को खुद आगे आ के विपक्ष को विश्वास में ले कर कोई नीति  अपनानी चाहिए थी , इस मीटिंग में  विदेश मंत्री कह रहे हैं कि वह देश हित में तालिबान से बात करेंगे (ध्यान रहे कि काबुल पर तालिबान के कब्जे से पहले ही इस लेखक ने अपने एक लेख यह मशविरा दिया था )  देश हित में लिया गया यह बहुत अच्छा निर्णय है।

उबैद उल्लाह नासिर

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 दूसरी ओर देश में उसे आतंकवादी संगठन कह के भी प्रचारित किया जा रहा है हालांकि भारत सरकार ने अभी तक ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया है लेकिन चेनलों और सोशल मीडिया में युद्ध स्तर पर यह प्रचार किया जा रहा है जिसका एक मात्र मकसद इशारों इशारों में मुसलमानों को आतंकवादी बताना होता है I इशारों इशारों में बहुत दूर की बात कहने और उससे राजनैतिक फायदा उठाने में बीजेपी माहिर है मसलन जब वह कहते है की यदि बीजेपी हार गयी तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे तो इस्का मतलब होता है बीजेपी की हार पर मुसलमान खुश होंगे बीजेपी ने कट्टरता आतंकवाद पाकिस्तान आदि सब को मिला के मुसलमान बना दिया है उधर कुछ अदूरदर्शी कथित मुस्लिम नेता भी बेवक्त की रागनी छेड़ कर पहले ही चारों ओर से घिरे मुसलमानों के लिए कठिनाइयाँ पैदा करते रहते है मसलन आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के प्रवक्ता को तालिबान को मुबारकबाद देने की क्या आवश्यकता थी यह बोर्ड का काम ही नहीं है I बोर्ड का गठन संविधान के तहत मिली अपने पर्सनल ला पर अमल करने की आज़ादी की कानून के दायरे में रक्षा करना है राजनैतिक विशेषकर विदेश मामलों में आपको बोलने का कोई अधिकार नहीं है एक वरिष्ट सांसद है शफिकुर रहमान बर्क वह भी कोई न कोई बखेड़ा खडा करते रहते हैं जैसे सदन में वन्दे मातरम गायन के समय उठ के चल देना, यह कौन सी अक़ल्मंदी थी सिवाय इसके की इससे आपको नकारात्मक मीडिया कवरेज मिले आप पढ़ लेते तो आपका इस्लाम खतरे में नहीं आ जाता नहीं पढना था तो अन्य सांसदों की तरह चुप चाप खड़े रहते उठ कर जाने का क्या तुक था?

आपने भी तालिबान के कब्जे पर पीठ थपथपाना शुरू कर दिया क्यों आपकी निजी राय कुछ भी हो सकती है लेकिन आपको कम से कम सरकार के क्लियर स्टैंड का इन्तिज़ार तो कर लेना चाहिए था साफ़ ज़ाहिर है अपने धर्म की कट्टरता आपको पसंद है दुसरे की नहीं इस डबल स्टैण्डर्ड से तो काम नहीं चलेगा I मुनव्वर राणा उर्दू शायरी का बड़ा नाम है पूरी दुनिया में उन्हों ने देश का नाम रोशन किया है उनकी शायरी का टॉपिक ही मान और भारत मां होता है उनसे चानेल वालों ने कुछ घुमा फिरा के पूछा और फिर आगे पीछे की बातें काट कर जिसमें संघी एक्सपर्ट होते हैं उनका चरित्र हनन ही नहीं शुरू कर दिया बल्कि लखनऊ और भोपाल में उनके खिलाफ मुक़दमा भी दर्ज करा दिया गया I असाम के मुख्य मंत्री हेमंत बिस्वाल सरमा नए नए हिन्दू ह्रदय सम्राट बन्ने के लिए हाथ पैर मार रहे हैं वहां भी 14 मुस्लिम लड़कों पर तालीबान की प्रशंसा करने के जुर्म में देश द्रोह समेत विभिन धाराओं में मुक़द्मा दर्ज किया गया है कुछ लड़कों को गिरफ्तार भी कर लिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट अनेकों बार देश द्रोह की धाराओं के बेजा प्रयोग पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर चुका है लेकिन पुलिस फाॅर्स को सुप्रीम कोर्ट की नहीं अपने सियासी आकाओं की ख़ुशी दरकार होती है I
यहाँ सवाल यह उठता है की भारत सरकार तालिबान को किस श्रेणी में रख रही है यदि वह आतंकवादी संगठन है तो क्या वह आतंकवादियों से बात कर रही है और यदि नहीं क्योंकि अभी तक सरकार ने ऐसा कोई एलान नहीं किया है तो फिर मुसल्मानों को तालिबान के नाम पर प्रताडित क्यों किया जा रहा है ?नेपाल में जब माओ वादी सत्ता मे आये थे तो बहुत लोगों ने उनकी हिमायत की थी लेकिन किसी पर कोई केस नहीं दर्ज किया गया था जबकि नक्सल और माओ वादी भारत में प्रतिबंधित संगठन है “बर्क (बिजली )गिरती है तो बेचारे मुसलमानों पर “ I दूसरी ओर मुस्लिम नेताओं को भी देश के मौजूदा हालात को समझते हुए एक एक शब्द बहुत नाप तौल के और एक एक क़दम बहुत फूँक फूँक के रखना चाहिए क्योंकि आपके एक एक शब्द को ध्रुवीकरण के लिए इसतेमाल किया जा सकता है I
सत्ता रूढ़ दल और सरकार को सोचना चाहिए की विदेश नीति को वोट बैंक राजनीति का हिस्सा बनाना  देश हित में नहीं है सरकारें आती जाती रहती है लेकिन सरकार और उसकी विदेश नीति चलती रहती है विदेश नीति में दल नहीं देश का हित सर्वोपरि होना चाहिए लेकिन पहले पाकिस्तान और अब अफगानिस्तान को इस वोट बैंक सियासत का हिस्सा बनाया जा रहा है ध्यान रहे की अफगानिस्तान को ले कर भारत सरकार पहले ही धोका खा चुकी है उसने खरबों डालर वहां लगा दिए लेकिन जब वहां के भविष्य के फैसले का समय आया तो रूस चीन और पाकिस्तान ने नेक्सस बना लिया और भारत को अलग थलग कर दिया गया इसका कारण शायद भारत का अमरीका के साथ चिपके रहना भी हो सकता है जबकि आवश्यकता थी चीन और पाक्सितान के नापाक गठजोड़ की काट के लिए भारत रूस को विश्वास में रखना, अमरीका तो किसी भी तरह वहां से अपनी जान बचा के भागने के फ़िराक में है उसे न अफगानिस्तान के हित से कोई मतलब था न ही भारत के न किसी अन्य देश के।


बेशक तालिबान एक कट्टर पसंद प्रतिगामी महिला विरोधी संगठन है जिसकी विचारधारा और क्रूरता का पूरी  ताक़त से विरोध किया जाना चाहिए लेकिन यह विरोध  अपने ही देश में अशांति पैदा करने, किसी वर्ग को निशाना बनाने और सियासी रोटियाँ सेंकने के लिए नहीं किया जाना चाहिए दुसरे तालिबान जब तक अफगानिस्तान के शासक है तब तक भारत को अपने हित में उन से अच्छे सम्बन्ध स्थापित करने की भी कोशिश करते रहना चाहिए ताकि चीन और पाकिस्तान उन्हें हमारे खिलाफ न इस्तेमाल कर सकें।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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