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इस्लाम और देशभक्ति: एक व्यापक और संतुलित दृष्टिकोण

इस्लाम और देशभक्ति: एक व्यापक और संतुलित दृष्टिकोण

लेखन: ए. बी. नदवी
इस्लामिक स्कॉलर

इंसान का उस मिट्टी से प्यार करना एक स्वाभाविक बात है जहाँ वह पैदा होता है, जहाँ का पानी पीता है और जहाँ उसका बचपन गुज़रता है। इस्लाम, चूँकि एक प्राकृतिक धर्म (दीन-ए-फ़ितरत) है, इसलिए वह इंसान की इस स्वाभाविक भावना को न केवल स्वीकार करता है बल्कि उसका शुद्धीकरण और मार्गदर्शन भी करता है। इस्लाम में देशभक्ति महज़ एक खोखला नारा नहीं है, बल्कि यह ईमान, नैतिकता और सामाजिक ज़िम्मेदारियों का एक ख़ूबसूरत संगम है।हदीसों में आम इंसानों से लेकर पड़ोसियों तक, बल्कि जानवरों तक के साथ अच्छे व्यवहार (हुस्न-ए-सुलूक) और वचन निभाने (ईफ़ा-ए-अहद) की ताकीद (कड़ी हिदायत) बहुत सख़्ती के साथ बयान की गई है।
एक सच्चा मुसलमान अपने देश का सबसे बेहतरीन और वफ़ादार नागरिक होता है।
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का मक्का मुकर्रमा से प्रेम इस बात का शानदार उदाहरण है। जब आप (ﷺ) हिजरत (प्रवास) के समय मक्का से निकल रहे थे, तो आपने मक्का की तरफ़ मुड़कर देखा और फ़रमाया:
> “तू कितना पवित्र शहर है और मुझे कितना प्रिय है। अगर मेरी क़ौम मुझे यहाँ से न निकालती, तो मैं तेरे सिवा कहीं और निवास न करता।” (जामी अत-तिर्मिज़ी)

यह हदीस-ए-मुबारका इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि अपने पैतृक देश से प्रेम करना सुन्नत-ए-रसूल (ﷺ) और इस्लामी शिक्षाओं के बिलकुल अनुकूल है।
इस्लामी विचारों में देश से प्रेम एक दिली और आध्यात्मिक भावना है। जब नबी करीम (ﷺ) ने मदीना मुनव्वरा की तरफ़ हिजरत की और वहाँ स्थायी निवास अपनाया, तो आपने मदीना के लिए यह दुआ फ़रमाई:
> “ऐ अल्लाह! मदीना की मुहब्बत हमारे दिलों में उसी तरह डाल दे जिस तरह मक्का की मुहब्बत है, बल्कि उससे भी ज़्यादा।” (सहीह बुख़ारी)

देश से प्रेम का अर्थ यह है कि इंसान उसकी तरक़्क़ी, ख़ुशहाली और शांति व व्यवस्था के लिए सच्चे दिल से दुआ करता रहे और उसकी रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहे।

नागरिक ज़िम्मेदारियाँ (Civic Responsibility)

इस्लाम में किसी भी राज्य या देश का नागरिक होने का अर्थ यह है कि आपने उस राज्य के साथ एक सामाजिक और क़ानूनी समझौता किया है। और इस्लाम में समझौतों के पालन पर बहुत ज़ोर दिया गया है।
क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला का इर्शाद है:
> “يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَوْفُوا بِالْعُقُودِ” (सूरह अल-माइदा: 1)
> अनुवाद: “ऐ ईमान वालो! अपने वादे और समझौते पूरे करो।”

एक नागरिक के तौर पर, ईमानदारी से टैक्स अदा करना, ट्रैफ़िक नियमों का सम्मान करना, पर्यावरण को साफ़ रखना और राज्य की संपत्तियों की रक्षा करना, ये सब हमारे ईमानी कर्तव्यों का हिस्सा हैं। एक मुसलमान नागरिक कभी भी अपने देश के संसाधनों को नुक़सान नहीं पहुँचाता।
किसी भी देश की व्यवस्था और प्रशासन उसके संस्थानों (जैसे न्यायपालिका, सेना, पुलिस, स्वास्थ्य, और शिक्षा विभागों) और क़ानूनों पर टिका होता है। इस्लाम में सामाजिक अनुशासन और क़ानून के शासन को अत्यंत महत्व प्राप्त है। अराजकता और धरती पर फ़साद (अशांति) फैलाने की सख़्ती से मनाही की गई है।
क़ुरआन करीम में इर्शाद-ए-बारी तआला है:
> “أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ مِنْكُمْ” (सूरह अन-निसा: 59)
> अनुवाद: “अल्लाह की आज्ञा का पालन करो और रसूल की आज्ञा का पालन करो और उन लोगों की जो तुम में से साहिब-ए-अम्र (शासक/क़ानून लागू करने वाले) हों।”

अपने राष्ट्रीय संस्थानों का सम्मान करना, उनके साथ सहयोग करना और देश के क़ानूनों का पालन करना वास्तव में इसी क़ुरआनी आदेश की व्यावहारिक व्याख्या है।
यह याद रखना भी ज़रूरी है कि व्यावहारिक क़दमों के ज़रिए समाज की सेवा करना और अपनी क्षमता के अनुसार देश और राष्ट्र की भलाई के लिए नेक कामों में हिस्सा लेना भी देशभक्ति का प्रमाण है।
देशभक्ति सिर्फ़ झंडा फहराने या राष्ट्रगान गाने का नाम नहीं है, बल्कि यह समाज की व्यावहारिक सेवा की माँग करती है। एक मेहनती छात्र, एक ईमानदार व्यापारी, एक कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक और एक देशभक्त मज़दूर अपनी-अपनी जगह पर देश की सेवा कर रहे हैं।
नबी करीम (ﷺ) का इर्शाद-ए-गिरामी है:
> “خَيْرُ النَّاسِ أَنْفَعُهُمْ لِلنَّاسِ” (अल-मोजम अल-औसत लित-तबरानी)
> अनुवाद: “लोगों में सबसे बेहतर वह है जो लोगों के लिए सबसे ज़्यादा फ़ायदेमंद हो।”

अपने देशवासियों की मदद करना, ग़रीबों की भलाई और कल्याण के लिए काम करना, ज्ञान फैलाना और अर्थव्यवस्था को मज़बूत करना—ये सब वे व्यावहारिक क़दम हैं जो देशभक्ति की वास्तविक माँगें हैं।
निष्कर्ष:
इस्लाम का देशभक्ति का दृष्टिकोण अत्यंत संतुलित और व्यापक है। यह हमें सिखाता है कि देश का प्रेम अंधी कट्टरता (Chauvinism) में नहीं बदलना चाहिए जहाँ इंसान सत्य (हक़) और असत्य (बातिल) का फ़र्क़ भूल जाए, बल्कि यह प्रेम रचनात्मक होना चाहिए। एक सच्चा मुसलमान, इस्लामी शिक्षाओं पर अमल करके, अपने देश का सबसे बेहतरीन, शांतिप्रिय और उपयोगी नागरिक बन जाता है। ईमान और देशभक्ति जब एक हो जाते हैं, तो वे किसी भी राष्ट्र की तरक़्क़ी की सबसे बड़ी ताक़त बन जाते हैं।

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