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लेख : भावुकता और अंधसमर्थन की आड़ में बहस नहीं होनी चाहिए : रवीश कुमार

रवीश कुमार

महबूबा मुफ़्ती की रिहाई पर मैंने प्राइम टाइम किया था। यू ट्यूब में जो कमेंट आए थे उसे देखकर कश्मीरनामा और कश्मीर और कश्मीरी पंडित के लेखक अशोक पांडे जवाब देना चाहते थे। उनके इस जवाब को मैं यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ। अशोक कुमार पांडे ट्विटर पर भी हैं और सवालों के जवाब देते हैं।

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मेरा मानना है कि कश्मीर के बारे में उत्तर भारत के इलाकों में धारणाओं के आधार पर बहस होती है। बहुत कम लोग ऐसे टकराते हैं जिनका अध्ययन गहरा है और सवाल मुश्किल। अशोक कुमार पांडे ने दो किताबें लिखीं हैं वो संदर्भ सहित हैं। मेहनत से लिखी गई है। हिन्दी में होने के कारण आप पढ़ सकते हैं और उसके बाद अंग्रेज़ी की किताबों को भी पढ़ने का एक बैकग्राउंड बन जाएगा। फिर बहस होनी चाहिए। अध्ययन के बाद बहस से समाज बेहतर है। नागरिक आश्वस्त होता है। भावुकता और अंधसमर्थन की आड़ में बहस नहीं होनी चाहिए।

अशोक कुमार पांडे का जवाब –

भाई रवीश कुमार ने कश्मीर पर एक प्राइम टाइम किया. मेहबूबा मुफ़्ती की रिहाई के बहाने उन्होंने कश्मीर में 370 हटाये जाने के बाद के हालात, मुख्यधारा के नेताओं की लम्बी-लम्बी घोषित/अघोषित गिरफ्तारियां, बर्बाद अर्थव्यवस्था, नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोपों वगैरह पर एक रिपोर्ट के साथ उन्होंने मेहबूबा की बेटी इल्तिज़ा से भी बातचीत की. पिछले दिनों माँ की गिरफ़्तारी के बाद इल्तिज़ा ने जिस साहस से ट्विटर से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मोर्चा सम्भाला था, वह आश्चर्य में डालता है और उनकी परिपक्वता बयान करता है.

यू ट्यूब पर वीडियो आते ही कमेंट्स की बाढ़ आ गई. ट्रॉल्स की तो खैर बात ही क्या करना लेकिन कई जेनुईन लोगों ने कुछ सवाल किये. मन तो था कि वहीँ सबका जवाब दिया जाता लेकिन यह संभव नहीं तो यहाँ एक साथ देने की कोशिश करता हूँ.

1- सबसे ज़्यादा लोग बाक़ी सब से तो सहमत थे लेकिन 370 हटाया जाने का कोई विरोध बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे.

यह मज़ेदार है और प्रोपेगेंडा की ताक़त का भी प्रमाण है. सत्तर सालों से लगातार यह प्रोपेगेंडा चलाया गया कि 370 कोई भारत-विरोधी चीज़ है, जैसे कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है और उसके हटने से हो जायेगा.  किसी ने यह सवाल नहीं पूछा कि जिस आर्टिकल की पहली धारा यह हो कि ‘जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है’ वह भारत-विरोधी कैसे हो सकता है? बता दूं कि 370 की यह धारा अब भी संविधान का हिस्सा है. ज़ाहिर है कि 370 वह अनुच्छेद था जो कश्मीर को भारत से जोड़ता था और साथ ही उसे एक स्वायत्तता देता था. इस तरह की व्यवस्था तो नागालैंड जैसे राज्यों में भी है और दुनिया के कई देशों में राज्यों को ऐसी स्वायत्तताएँ दी गई हैं. फिर अकेले कश्मीर से दिक्कत क्यों?

इतिहास का कोई भी विद्यार्थी जानता है कि 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह और भारत के बीच जब समझौता हुआ तो कश्मीर एक आज़ाद देश था. जहाँ बाक़ी रजवाड़े 15 अगस्त 1947 के पहले भारत से शामिल हो गए थे हरि सिंह आज़ाद देश का ख़्वाब देख रहे थे और क़बायली हमले के बाद ही मज़बूरी में भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार किया. हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर तीन ऐसे राज्य थे जहाँ जनता की बहुसंख्या और राजा के धर्म अलग-अलग थे. तय हुआ था कि ऐसे केसेज में जनमतसंग्रह होगा. जूनागढ़ में हुआ और लोगों ने भारत के पक्ष में मतदान किया. हैदराबाद का क़िस्सा आपसब जानते हैं. जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तानी हमले के बाद कभी जनमतसंग्रह की स्थितियाँ बन ही नहीं पाईं. 370 इसी कश्मीर और भारत के बीच में समझौता था, जो एकतरफ उसे भारत से जोड़ता था दूसरी तरफ़ सीमित आज़ादी देता था. अगर कभी जनमतसंग्रह हो पाता और कश्मीरी भारत के पक्ष में वोट करते तो इसकी ज़रुरत ख़त्म हो जानी थी. यह तो सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था कि इसे एकतरफ़ा नहीं हटाया जा सकता. राज्यपाल को कश्मीर की विधानसभा का प्रतिनिधि बनाकर जिस तरह इसे हटाया गया वह कितना संवैधानिक था यह तो सुप्रीम कोर्ट ही बताएगा लेकिन ज़रा सोचिये उत्तर प्रदेश के विभाजन, या उसके लिए किसी ख़ास क़ानून का निर्णय अगर केंद्र सरकार ले और उसमें उस प्रदेश के किसी नागरिक, किसी नेता, किसी जनप्रतिनिधि को शामिल न करे तो वहाँ क्या प्रतिक्रिया होगी? इस प्रतिक्रिया के डर से छोटे-बड़े हर नेता को गिरफ़्तार कर ले तो क्या होगा? ज़रा-ज़रा से मुद्दे पर गाड़ियाँ फूंक देने वाले लोग कश्मीर की जनता के प्रतिरोध पर इतने संवेदनशील क्यों हो जाते हैं?

असल में दुष्प्रचारों का असर गहरा है. एक साहब लिखते हैं – पहले भारतीय ही कश्मीर नहीं जा पाते थे! सोचिये मैं सात बार कश्मीर जा चुका हूँ. पर्यटन विभाग के आंकड़े देख ले कोई कि हर साल हज़ारों लोग कश्मीर घूमने जाते हैं. ज़मीन ख़रीदने पर जो पाबंदी थी वह तो हिमाचल और उत्तराखंड के कुछ इलाक़ों में भी थी. उद्योग-व्यापार के लिए 99 साल की लीज़ की व्यवस्था पहले भी थी कश्मीर में. 2010 में दिलीप पडगांवकर की अध्यक्षता में 3 वार्ताकारों का जो समूह गया था उसकी रिपोर्ट देखिये, 370 के ज़यादातर प्रावधान धीरे-धीरे ख़त्म कर दिए गए थे. सुप्रीम कोर्ट हो कि भारत के महालेखाकार, सबको वहाँ वही अधिकार थे जो दूसरे राज्यों में. अपनी दोनों किताबों में मैंने विस्तार से बताया है यह. जो 370 बचा था वह कश्मीरियों के लिए स्वाभिमान का मसला था. हर प्रदेश का होता है ऐसा स्वाभिमान कोई न कोई. होता तो हर व्यक्ति का है. आप बातचीत करके समझा लें तो ठीक, डंडे के ज़ोर पर जो करेंगे वह दबा भले दे, लेकिन इस दबने में जो गुस्सा दबेगा वह कभी उसे आपका दोस्त नहीं बनने देगा. एक साहब पूछते हैं कि क्यों कश्मीर में मुख्यमंत्री कश्मीर का ही हो? बताइए भला! किस प्रदेश में मुख्यमंत्री किसी और प्रदेश का होता है?

जिन्हें लगता है मुफ़्ती या अब्दुल्ला देश तोड़ने वाले हैं उन पर हँसा भी नहीं जा सकता. कश्मीर में आतंकवादी और उनके समर्थक इन्हें भारत का एजेंट कहते हैं, यहाँ आप देश तोड़ने वाला कहिये. यही हैं जिन्होंने हर पंद्रह अगस्त 26 जनवरी को तिरंगे को सलाम किया है. कितने लोग जानते हैं कि जब वहाँ बचे हुए कश्मीरी पंडितों ने दशहरा मनाने का फ़ैसला किया तो मुफ़्ती साहब और मेहबूबा ने न केवल समर्थन किया बल्कि समारोह में शामिल भी हुए. भारत माता की जय का नारा लगते फ़ारूक़ के जाने कितने वीडियो मिल जाएंगे. उनके पिता ने पाकिस्तान परस्त लोगों को 1947 में देशनिकाला दिया था तो पी एस ए ऐसे ही लोगों को गिरफ़्तार करने के लिए बनाया था, आपने उन्हें ही उस क़ानून में गिरफ़्तार कर लिया और फिर बिना किसी मुक़दमे के रिहा भी कर दिया. कहाँ जाएँ ये लोग? आज पाकिस्तानपरस्त लोग उन पर हँस रहे हैं कि देखो भारत का साथ देकर तुम्हें क्या मिला. जिन्हें साथ लेना था उन्हें दुश्मन बना दिया आपने. बताइये क्या रास्ता है उनके पास?

यह जो दिनरात नफ़रत फैलाने वालों ने झूठ और ज़हर भरा है आपके भीतर उसे परे रखकर शांत दिमाग से सोचिये. तीस साल से सेना के भरोसे क्या मिल गया? 5 अगस्त के बाद से कौन सी शान्ति स्थापित हुई वहाँ? आज लद्दाख में असंतोष है, जम्मू में असंतोष है, एक कश्मीरी पंडित वापस नहीं लौटा, किसी को ज़मीन ख़रीदने की हिम्मत नहीं हुई, वहाँ छठ मनाने की घोषणा करने वाले चुपचाप अपने शहर में बहंगी लादे त्यौहार मना रहे हैं, व्यापार से लेकर टूरिज्म तक ठप पड़ा है, लोग नाराज़ हैं और दुखी, राजनीतिक गतिविधियाँ ठप पड़ी हैं, चीन लद्दाख पर दावे कर रहा है और सब चुप हैं…तो ज़रा सोचिये मिला क्या.

कश्मीर 370 के साथ भी भारत का अभिन्न अंग था, अब भी है. सवाल तो यह है कि वह दिन कब आएगा जब कश्मीरी शान से कहेंगे कि हाँ हम भारतीय हैं. वह दिन जब आएगा तो बहुत से सवाल बेमानी हो जायेंगे. वह दिन जब भी आएगा डंडे के ज़ोर से नहीं आएगा. याद रखिये डर वाली मुहब्बत आपके मज़बूत होने तक चलती है. दिल वाली मुहब्बत आपको रोज़ मज़बूत करती चली जाती है.

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