लेखक……….डॉ. माजिद देवबंदी,महासचिव, साहित्यिक संस्था “मीजान”, दिल्ली

सारे आलम के खुदा ने मनुष्य को सबसे महान बनाया और उसे वह सब कुछ दिया जो फ़रिश्ते भी नहीं पा सकते थे। वजह यह है कि फरिश्ता पाप नहीं कर सकता, मनुष्य पाप कर सकता है और अल्लाह के डर से नहीं करे, यही उसकी श्रेष्ठता है। अल्लाह ने 6 दिन में सृष्टि की रचना की, यही उसकी मसलहत है, साथ ही उसने मनुष्य को श्रेष्ठ बनाया, यही उसकी ताक़त भी है जो तब भी मौजूद थी, जब संसार की रचना नहीं हुई थी यानिरहमतुल लिल आलामीन पैगम्बर अहमद मुजतबाहजरत मुहम्मद मुस्तफा के नूर की रोशनी, जिनकी शख्सियत ने हमें एक विश्वासऔर महान आशीर्वाद के साथ-साथ अच्छे और बुरे का भेद बताया। और उसकी अहमियत को समझाया। यह सब क्यों हो रहा था। क्या खुदा को हमारी जरूरत थी ?क्या खुदा को हमारी इबादत और रोज़ेकी जरूरत थी?नहीं, बिल्कुल नहीं।उसे बताना था कि तुम्हारे(इंसान)के लिए एक ऐसे व्यक्ति को दुनिया में भेजना है जो स्पष्ट रूप से खाएगा, पीएगा, आपकी तरह शादी करेगा, वह सब कुछ करेगा जो एक इंसान करताहै,

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लेकिन उसे एक विशेषता दी कि “वही” उसके पास आएगी जो इसके अलावा किसीदूसरे पर नहीं आएगी।एक लाख चौबीस हजार पैगंबर जिसकी उम्मत में रहने की इच्छा रखते थे, हम इंसानों को उसकी उम्मत में होने का गौरव प्राप्त हुआ। वह इंसान हमारे जैसा नहीं, जेसे पानी, नाला, नदी, समुद्र का है लेकिन यह पानी जमजम जैसा नहीं हो सकता। एक खुदा, एक किताब, एक रसूल की आज्ञा का पालन करना आवश्यक है, अन्यथा हम ईमान से गिर जाएंगे। आक़ा ने एक जगह कहा, “मैं क़यामत के दिन तक दो चीज़ें छोड़ रहा हूँ, एक हदीस और दूसरी क़ुरआन।” हमने दोनों को छोड़ दिया, दुनिया ने हमें छोड़ दिया मैं अक्सर कहता हूँ कि अल्लाह ने हमें दो क़ुरआन दिए। एक लिखा जाता है और दूसरा पढ़ा जाता है।कुरान हमें इल्म सीखने काहुक्म देता है। खुदा ने अपनी किताब कुरान में पहली आयत के साथ शुरुआत की, जिसका अर्थ है “खुदा के नाम पर पढ़ो जिसने दुनिया को बनाया।” दूसरा कुरान कहता है: “अपनी माँ की गोद से कब्र तक इल्महासिल करो।चाहे चीन ही जाना पड़े”। यहां चीन जाने का मतलब शिक्षा का महत्व था, यह कहना कि उस समय चीन जाना असंभव नहीं लगता था। इल्म हासिल करने पर हुज़ूर ने बहुत जोर दिया। ऐसा इसलिए है क्योंकि यदि इल्म के साथ कोई अमल नहीं है, तो वह बेकार है।किसी भी मामले में, इल्मऔर अमल एक दूसरे काहिस्सा हैं।

इल्म पर अपने वो पागल नाज़ करता है बहुत।
अब अगरहद से बढ़ा शैतान होता जाएगा ।

कहने का मकसद यह है कि इल्म इंसान को हर तरह से महान बनाता है शर्त यह है कि वह सही सोच और अमल के साथ हो, वरना ज़िंदगी बेकार हो जाएगी ।आज दुनिया चांद पर पहुच गई है इसी से अंतरिक्ष में खोज हो रही है। चाँद की मिट्टी भी पृथ्वी पर आ गई है, चन्द्रमा की मिट्टी जिसे मेरे सआक़ा ने एक इशारे से दो भागों में बाँट दिया था। जब इस इल्म को आखरी सांस तक अनिवार्य कर दिया गया है, तो जिस पर कुरान उतारा गया था और जिसने इस इल्म से सीखना फ़र्ज़ कर दिया, उस पर अमल करने वाले क्यों नहीं हैं? भारत में ३० करोड़ मुसलमान जइल्म सीखने का हुक्म और उस पर जोर देने वाले सबसे अज़ीम और महान व्यक्ति के हुक्म पर अमल क्यों नहीं करते? अगर उन्हें यकीन होता तो वे इल्म के क्षेत्र में आगे होते और दुनिया उनके कदमों में होती। काश ऐसा होता और हम इल्म के पैगंबर की उम्मत को इल्म हासिल करते हुए देख सकते।
इन सब कमियों के बावजूद अगर कोई व्यक्ति मुसलमानों के वर्तमान पतन और अज्ञानता का शोक मनाता है और चाहता है कि यह क़ौम इल्म की ओर आकर्षित हो, तो उसकी सराहना की जानी चाहिए। क्या देश को आज इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए? बेशक दिया जा रहा है,

लेकिन ऐसे ईमानदार लोगों की सराहना करने के बजाय हम इसके खिलाफ मोर्चा बनाने में माहिर हैं। वे लोग न खुद इल्म हासिल करते हैं औरन इल्म फैलाने की कोशिश करने वालों का समर्थन करते हैं। लेकिन अभी भी कुछ लोग हैं जो क़ौम के बच्चों को पढ़ने-लिखने और कुछ बनाने के लिए जुनूनी हैं। मुझे लगता है कि हमें जवाबदेह होना होगाऔर जो इल्म फैलाने की कोशिश कर रहे हैं उनका समर्थन करके हमें खुद को और आने वाली पीढ़ियों को सुधारना है। आइए ऐसे लोगों को ढूंढे जो ऐसे लोगों के लिए हमदर्दी रखते हैं और उनके साथ चलते हैं, और कुछ ऐसा करते हैं कि हमारे बाद भी उनका इल्म उन्हें प्रेरित करता रहे । अच्छे लोगों और राष्ट्र के लिए कुछ बेहतर करने के लिए यह काम कुरान और हदीस की शिक्षाओं का प्रसार करने और पुरस्कार प्राप्त करने के समान है। देश की आजादी के 70 साल बाद भी अगर हम शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ रहे हैं तो यह हमारे लिए चिंतन का विशय है।क्यावजह हैं कि हम दिन-ब-दिन इस सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी से छुटकारा पा रहे हैं। क्या हम जीवन भर सोचते करते रहेंगे?

नहीं। हमें आज ही सोचना होगा और इंशा अल्लाह एक दिन यहख्वाब पूरा होगा और इस इल्म के प्रकाश से हम और हमारा राष्ट्र प्रगति की ओर बढ़ते हुए अपनी पहचान बनाने में सफल होंगे। मैंने यह सब प्रस्तावना केवल इसलिए बनाई क्योंकि मुझे एक अज़ीम इंसान और माहिरे तालीम जफर सरेशवाला के बारे में कुछ लिखना है। काश मैं सफल हो पाता।मनुष्य की अपनी सफलता उसके अपने कार्यों से बहुत प्रभावित होती है। इसमें कोई शक नहीं कि परिवार और मेहनत उन्हें महान बनाती है। उनके परिवार ने गुजरात में हदीस के ज्ञान को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके दादा मुहम्मद हबीब और पिता ने उन्हें एक धार्मिक माहौल में पाला। धार्मिक मन और धर्म का प्रचार करने की रुचि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके घरअज़ीम मजहबी लोग और बुजुर्ग आते-जाते रहते थे।हजरत मौलाना हुसैन अहमद मदनी उनके घर आए थे। इनके अलावा हज़रत मदनी के साले मौलाना राशिद-उद-दीन, मौलाना तलहा, मौलाना जकरिया, मौलाना यूसुफ, मौलाना इनाम-उल-हक, अमीर तब्लीग जमात और काजी मुजाहिद-उल- इस्लाम, महान बुज़ुर्गों और सबसे महत्वपूर्ण और मुस्लिम भारतकी सब से बड़ी मुस्लिम हस्ती हजरत मौलाना अली मियां और उनके बाद हजरत मौलाना राबे हसनी बनफ्से नफीस के अलावा आपके घर आते थे और यह सिलसिला अभी भी चल रहा है।

हजरत मौलाना अली मियांउन्होंने अपनी जीवनी में यहां तक लिखा है कि “अल-सफर वसीला अल-जफर” यानी गुजरात का सफर ज्यादातर जफर सुरेशवाला की वजह से है। इससे उनके धार्मिक और विद्वानों के साथ संबंध और अक़ीदत का अंदाजा लगाया जा सकता है। हदीस और फ़िक़्ह के इल्म को फैलाने में उनके परिवार ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह शायद लोगों को पता नहीं होगा कि उनका परिवार गुजरात के सबसे सम्मानित और धार्मिक और उपदेशक व्यक्तित्वों में से एक है। जफर सुरेशवाला स्वयं अभी भी नियमित रूप से धर्म प्रचार के कार्य में लगे हुए हैं। यूं भी भारत में हजारों मदरसों को पूरी दुनिया में गुजरात के लोगों का समर्थन प्राप्त है।

अमीरउलमोमिनीन हजरत उमर के अनुसार, किसी के बारे में निर्णय लेने से पहले, उसके साथ यात्रा करें, भोजन करें और बैठक करें, फिर फैसला लिया जाना चाहिए। हमारी समस्या यह है कि हम केवल आलोचना करते हैं। किसी व्यक्ति को करीब से देखना, समझना और एक साथ बैठकर निर्णय लेना बेहतर होता है। हम दूर से कोई निर्णय नहीं ले सकते। हो सकता है कि हम बिना किसी पुष्टि के गलत तरीके से उसे पेश करदें और जिसके लिए अल्लाह को जवाब देना होगा। पिछले सात या आठ वर्षों से मुझे जफर सुरेशवाला को करीब से देखने का अवसर मिला है। उनके बारे में कई ग़लत बातें मशहूर हैं कि वह एक खास व्यक्ति से जुड़े हैं जो मुसलमानों का दुश्मन है। वे जब भी मुझ से मिलते,केवल मुसलमानों की ही बात करते। वह बार-बार मुसलमानों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाना चाहते, और इस संबंध में वह कुछ न कुछ करते रहते हैं।

वह देश भर में हर साल एक या दो शैक्षिक सम्मेलन आयोजित करते हैं। एक हफ्ते पहले, जयपुर(राजस्थान) मंत उन्होंने एक विशाल शैक्षिक सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें देश के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक और शैक्षिक क्षेत्र की महत्वपूर्ण हस्तियों ने भाग लिया और राष्ट्र के भविष्य को रोशन किया। यह एक सपना सच होने जैसा है। उनके परिवार ने धर्म के अलावा उर्दू के लिए भी बहुत कुछ किया है। ऐसे समय में जब गुजरात से उर्दू गायब हो रही थी, उनके दादा मुहम्मद हबीबने 1971 में अहमदाबाद एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना की और इसके माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में महान कार्य किए गए। एक अंतरराष्ट्रीय मुशाइरेआयोजित किए गए जिसमें जगन जगन्नाथ आजाद, अली सरदार जाफरी, जाँनिसारअख्तर सहित भारत के सबसे मशहूर
शाएरो ने भाग लिया।जानीसार अख्तर, मजरूह सुल्तान पुरी, केफी आज़मी, जिगर मुरादाबादी जैसे बड़े नाम शामिल थे। काश यह सिलसिला चलता रहे और आज फिर गुजरात में जफर सुरेशवाला उर्दू के बारे में गंभीरता से सोचते रहें कि एक खास सोच के कारण यह भाषा खत्म हो रही है। मैं अक्सर कहता हूं कि मुसलमानों की स्थिति उर्दू जैसी ही है। काश जफर सुरेशवाला दोनों के बारे में सोचें, तो यह देश और खास तौर से मुसलमान उनकी सराहना करेगा।

बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारियां होने के बावजूद, जफर सरेशवाला राष्ट्र और शिक्षा के लिए सोचते रहे, खासकर मुसलमानों के लिए। मौलाना आजाद उर्दू विश्वविद्यालय के चांसलर होतेहुए वहां भीयह बहुत महत्वपूर्ण सेवा करतेरहे, अन्यथा आज के चांसलरको विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं करने दिया जाता। अपने ज़माने में विश्वविद्यालयके चांसलर रहते हुएअपना खर्च वे खुद उठाते थे और विश्वविद्यालय से आने-जाने का खर्च भी नहीं लेते| थे। इस लगन और सोच वाले लोग आज की दुनिया में संभव नहीं लगते।

इस्लामिक फाइनेंस के तत्वावधान में, उन्होंने १९५९ में दुनिया का पहला इक्विटी इस्लामिक फंड स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठायाजिससे विश्वविद्यालय अकादमिक रूप से प्रगति करेऔर कल हमारे देश का नामऊंचा हो ।मैंने उन्हें बार-बार नमाज़ की व्यवस्था करते और उन जगहों पर भी धर्म की बात करते देखा है जहाँ मुसलमानों को नष्ट करने की साजिश रचीजाती है। काश अल्लाह मुसलमान क़ौम के लिए उनसे कुछ सेवा ले ले यही मेरी कामना है। माना कि बहुत सी कठिनाइयाँ हैं और आज एक वर्ग हमें मिटाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन हर हाल में शिक्षा प्राप्त करने का प्रयास करना सभी का कर्तव्य है, और निश्चित रूप से कोशिश करने वाले असफल नहीं होते हैं।

कामयाब होते हैं ऐसे लोग भी माजिद
जो दिलों मे रखते हैं दर्द इस जमाने का

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