डॉ ख़ुर्शीद अहमद अंसारी

कल फिर आएंगे अहल ए चमन पर भूल न पाओगे हमको ख़ुर्शीद

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1997 में , चांसलर हाउस, जामिया हमदर्द से मेरे एक बुज़ुर्ग मित्र जैसे सरपरस्त सैयद औसाफ़ साहब का फ़ोन आया था।”ख़ुर्शीद  साहब ज़रा सा वक़्त हो तो 1 बजे चांसलर लॉज, जामिया हमदर्द तशरीफ़ लाइये, हकीम साहब मिलना चाहते हैं”.यूँ तो जामिया हमदर्द में तब तक मैंने लगभग 8 साल गुज़ारा था लेकिन कभी भी मैं उस घर जिसे मैं अमूमन बदर अफाक़ उस्मानी साहब जो फैक्लटी के लाइब्रेरियन थे ,उनसे बैत उल अकबर कहा करता था, देखने का इत्तेफ़ाक़ नही हुआ था। हालांकि मुझे हकीम साहब ने एक बार ग्रेड्यूएशन मे और एक बार एम डी में टॉप करने के लिए सम्मानित किया था पर मैं ज़रा खड़ूस आदमी रहा हूँ अपनी दुनिया मे मस्त-बिंदास।

1258 पर ही मैं बैत उल अकबर में हाज़िर था औसाफ़ साहब से आग़ाज़ ए गुफ़्तगू सलाम दुआ हुई,  उन्होंने मुझे इक ज़ाती मेहमान खाने में बैठने की हिदायत दी। मेरी धड़कने बढ़ रही थीं ठीक 1 बजे एक पतला दुबला  सा हाड़ मांस का बना हुआ मुजाहिद और मुम्बा ए इल्म ओ फ़न ए तिब मेरे सामने बिना कुशन की लकड़ी की कुर्सी पर बहुत सुरुअत से तशरीफ़ फ़रमा हुआ। यह हमारे ही नही लगभग 200 तालीमी इदारों।की परवरिश करने वाले पद्मभूषण, पद्मश्री हकीम अब्दुल हमीद साहब थे। 2 मिनट मेरे क़याम की मुद्दत में हकीम साहब की गहरी बीनाई का मैं मरकज़ था।

औसाफ़ साहब ने मेरे बारे में बताया उन्हें कि मैं एम डी के आख़िरी साल में हूँ पढ़ा लिखा आदमी हूँ टॉपर रहा हूँ ,इन्हें ही वो काम देने के लिए बुलाया है” हकीम साहब की बेधने वाली आंखे मुझ पर टिकीं उन्होंने सिर्फ़ दो लफ़्ज़ कहे थे याद है मुझे”अच्छा है” “काम करिए”- मेरा वक़्त पूरा हो चुका था क्योंकि हकीम साहब फिर सुरुअत से उठे और दूसरे रूम में जा चुके थे।मुझे बताया गया कि इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका यूनानी तिब पर एक आलेख चाहता है, जिसकी ज़िम्मेदारी आप को दी जाती है। मैंने उसे क़ुबूल किया फिर अक्सर दसतावेज और मुसव्विदात के साथ बैत उल अकबर आना जाना रहा कभी उनसे ज़ाती मुलाक़ात नही हुई। मेरा लेख छपने के बाद मुझे एक और काम दिया गया था मैक ग्राव हिल प्रकाशन की तरफ़ से जिसकी कहानी का ज़िक्र यहां बे मानी हैं

 हकीम अब्दुल हमीद ,14 सितम्बर 1908 में दिल्ली की संकरी गलियों में हाफिज़ अब्दुल मजीद साहेब के आंगन में पैदा हुए। शुरू से ही वालिद के सनअत और हिकमत से दिलचस्पी रही सो एक हकीम, चिकित्सक की तरह ता।उम्र अपनी ख़िदमात वो इंसानो के सेहत और उसके इलाज में सर्फ करते गए। जब हिंदुस्तान में बंटवारे का दर्द अपनी शिद्दत से था और छोटे भाई पाकिस्तान में हिजरत कर रहे थे तो हकीम साहब ने अपने देश हिंदुस्तान में ही रहने के फैसले पर ब ज़िद रहे। मैं उनको 1985 से जानता हूँ देखा भी हमने। ख़ामोश, दूरदर्शी , बला की फुर्ती और दूरअंदेशी इस क़दर कि उन्होंने 1965 में हमदर्द लेबोरेट्री वक़्फ़ की बुनियाद डाली तो वहीं उन्होंने तुग़लकाबाद के गुँजान और बंजर ज़मीनों पर इल्म ओ तहक़ीक़ की ऐसी शमा जलाई जिसकी ताबनाकी और फन्नी जौहर को वहां के फ़ारिगीन ने दुनिया ए इल्म ओ तहक़ीक़ के मैदान में गोशे गोशे में जलाया। हिंदुस्तान और बैरन ए मुल्क के सैकड़ों मशहूर ओ मारूफ़ लोग हकीम अब्दुल हमीद साहेब के मरीज रहे जिनमे प्रिंस चार्ल्स, दिलीप कुमार, राजबब्बर, वग़ैरह जिनकी आमद मेरे दौर ए तालीम में ही हुई। उनकी सादा लौही का यह आलम कि ऊनके लिबास, और उनकी बहुत पुरानी फ़िएट अपनी दास्तान ख़ुद कहती थी। हकीम साहब तिब ए यूनानी को ,दौर ए हाज़िर के इलाज और तहक़ीक़ की रोशनी में देखने के आदी थे इसके लिए उन्होंने रिवायती इलाज को तहक़ीक़ की ग़रज़ से कई तजरबाग़ाहें बनवाईं और हिंदुस्तान के शुहरा आफाक साइंसदानों और मुहक़्क़ीक़ीन को दावत दी।

तालीम ए निस्वान के ज़बरदस्त पैरोकार इस अज़ीम इंसान ने जिस बूद ओ बॉश और ज़हानत का इज़हार अपने दनीश्वराना सलाहियत से किया उसकी मिसाल ख़ास तौर से नार्थ इंडिया में शाज़ ओ नादिर ही दिखाई देती है। 1989 में तत्कालीन प्रधानमामंत्री श्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने हकीम अब्दुल हमीद साहब की फ़िएट चलाते हुए लिखा है विज़िटर बूक में “मुझे हकीम साहब का ड्राइवर बनने में गर्व की अनुभूति है”और उन्होंने तुग़लकाबाद की दश्त ओ सहरा में तालीम ओ तहक़ीक़ के इस बेमिसाल इदारे को डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया और आज हकीम अब्दुल हमीद के ख्वाबो का यह समर हिंदुस्तान और दुनिया के बेहतरीन इदारों की फिहरिस्त में खड़ा न सिर्फ़ देश की तरक़्क़ी में अपनी ख़िदमात दे रहा है बल्कि उन्हें ख़िराज ए अक़ीदत पेश कर रहा है।हकीम साहब की तिब, फ़ार्मेसी, औऱ सनअत कारी के बेमिसाल ख़िदमत का ऐतराफ़ करते हुए हुकूमत ए हिन्द ने पद्म भूषण से नवाज़ा।

1999 में 22 जुलाई मैं भूल नही सकूंगा क्योंकि उसी दिन राजस्थान लोक सेवा आयोग की परीक्षा का परिणाम आया था और मेरे एक साथी ने अख़बार लाके दिया था कि मैंने उस परीक्षा में 52 परीक्षार्थियो में टॉप किया था, पर 2- 2.30  बजते बजते एक जा ब हक़ करने वाली ख़बर ने मुझे उन खुशियों से एहतिराज़ कर डाला था क्योंकि आज़ाद हिंदुस्तान में तालीम की मशाल जलाने वाला यह शुमाली हिंदुस्तान का चिराग़ 22 जुलाई 1999 को अपनी रौशनी खो चुका था और हम सब को दर्द व ग़म के अंदोहनाक अंधेरों में ग़र्क़ कर गया था, और मैं अपनी ज़िंदगी के कुछ मिनट के बैत उल अकबर में बिताए लम्हों के समंदर में हिचकोले खा रहा था।

आज उनकी बरसी है , अल्लाह उनको जन्नत उल फिरदौस में बुलंद दरजात अता करे और उनकी मग़फ़िरत फ़रमाये। आमीन

(मैंने हकीम साहब के ऊपर दो आर्टिकल लिखे हैं जो हकीम अब्दुल हमीद साहब के सवानह हयात में पब्लिश है और मुम्बई की एक मैगज़ीन यूनानी मेडिकोज़ में “द मैन हू सा टुमारो” नाम से छपा था- दोनों अंग्रेज़ी में)

डॉ ख़ुर्शीद अहमद अंसारी, असोसिएट प्रोफ़ेसर, यूनानी संकाय, जामिया हमदर्द, नई दिल्ली

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