आम चुनाव में भाजपा जीती जरूर लेकिन चुनाव नतीजों में भविष्य के झंझावात की एक आहट-सी छिपी हुई है, भाजपा के तिलिस्म का टूटने का संकेत मिल गया है, इसकी शुरुआत बिहार से होगी, कोरोना संकट से सबसे ज्यादा बिहार और उत्तर प्रदेश के मतदाता प्रभावित हुए है, कई सौ किलोमीटर पैदल चलकर अपने वतन लौटने वालों के कदम बूथ तक जरूर पहुंचेंगे, उनके पैरों की बिवाई इस बात सबूत दे रही है.

मतदाताओं ने परिपक्वता का परिचय देते हुए देश को अनिश्चित भविष्य की ओर धकेले जाने से बचाने का संकल्प ले लिया है, जनादेश के जरिए भाजपा और उसके घटक दल कई राज्यों में सत्ता पर जरूर है लेकिन उन सरकारों की कारगुजारी इस बात का सबूत दे रही है कि ज़िंदा कौमें पांच साल का इंतज़ार नही करती है.

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जब 1967 में डॉ. लोहिया ने तात्कालिक रणनीति के दौर पर गैरकांग्रेसवाद का नारा दिया, तब लोहिया जी के इस नारे ने खूब रंग दिखाया, समाजवादियो ने जनसंघ के साथ मिलकर बिहार में भी गैरकांग्रेसी सरकार बनाई, इस सबसे यह भी साबित हुआ कि अलग-अलग विचारधाराओं की वकालत करने वाले गैरकांग्रेसी दलों ने शायद अपनी विचारधारा से ज्यादा व्यावहारिकता को अहमियत दी.

इसीलिए कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट, जनसंघी और स्वतंत्र पार्टी वाले सबके सब एक मंच पर आकर गैरकांग्रेसी संविद सरकारें बनाने को तैयार हुए, उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र ‘ऑर्गेनाइजर’ में उसके तत्कालीन संपादक केआर मलकानी ने लिखा था कि संविद सरकारें कांग्रेस की सरकारों से अच्छी साबित होंगी, क्योंकि हम कम्युनिस्टों को राष्ट्रवाद सिखा देंगे और उनसे हम समाजवाद और समानता का दर्शन सीख लेंगे.

लेकिन कई वर्षों बाद जब गैरकांग्रेसी सरकारें सत्ता पर काबिज हुई तो उनका व्यवहार और कार्यशैली कांग्रेस से भी बदत्तर रही, जो डॉ लोहिया की नीतियों का मखौल उड़ाती दिखी, सत्ता की चाहत और वर्चस्व की राजनीति ने समाजवादी सोच को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक दिया,

बिहार का यह चुनाव गैरभाजपावाद बनाम गैरकांग्रेसवाद का है, इस बार जनता अपने मताधिकार का प्रयोग सत्ता विस्थापन के लिए करेगी या सत्ता पुनरावृति के लिए करेगी, यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन राजनीति के चाणक्य डॉ लोहिया की नीति कहती है कि सत्ता तावे पर पड़ी रोटी के सामान है जिसे पलटते रहना चाहिए, रोटी एक तरफ रहेगी तो जल जायेगी और यदि पलटी जाएगी तो रोटी पककर स्वादिस्ट होगी.

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