कृष्णकांत

क्या ये व्यवस्था आपको अटपटी और अन्यायपूर्ण नहीं लगती? 88 हजार करोड़ के कर्जदार पूंजीपति पर कार्रवाई तक नहीं होती, लेकिन महज 88 हजार के कर्जदार किसान को खुदकुशी क्यों करनी पड़ती है? मध्य प्रदेश के किसान मुनेंद्र पर 88 हजार बिजली का बिल बाकी था। उसे विभाग ने इतना परेशान किया कि उसने खुदकुशी कर ली। किसान ने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि “बकाया बिजली बिल के लिए विभाग के कर्मचारी लगातार परेशान कर रहे हैं। यहां तक कि मेरी बाइक भी उठा ले गए। मेरे मरने के बाद मेरा शरीर सरकार को सौंप दिया जाए और मेरे शरीर का एक-एक अंग बेचकर बिजली विभाग का बकाया कर्ज चुका दिया जाएगा।”

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दूसरी तरफ तीन बैंकों ने अनिल अंबानी की तीन कंपनियों को फ्रॉड घोषित किया है। आरोप है कि उनकी कंपनियों ने बैंकों से 86,188 करोड़ रुपए कर्ज लिया और नहीं लौटाया. ये राशि विजय माल्या की तुलना में 10 गुना ज्यादा है. इसके बावजूद अनिल अंबानी की कंपनियों पर अब तक कोई कार्रवाई शुरू नहीं की गई है. उल्टा करीब-करीब दिवालिया हो चुके अनिल अंबानी को राफेल सौदे में ठेका दिया गया। उनकी बोगस कंपनी को रक्षा सौदे में शामिल करके देश की सुरक्षा से खिलवाड़ किया गया।

आत्महत्या करने से पहले मुनेंद्र ने तीन खत लिखे थे। एक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को, दूसरा मध्य प्रदेश सरकार को और तीसरा खत किसान भाइयों को। पूंजीपतियों के लिए देश का सब संसाधन मौजूद है। सरकार का वश चले तो पूरा दो-चार पूंजीपतियों को सौंप दे’ लेकिन किसानों को कुछ हजार रुपये के लिए जान गंवानी पड़ती है? पूरा देश अनाज खाता है, लेकिन किसानों को सब्सिडी देने में लाख नाटक हैं। कार, मोटर, जहाज, कोयला, बिजली, वायुयान और फैक्टरियां कोई नहीं खाता लेकिन कॉरपोरेट के लिए हर साल लाखों करोड़ सब्सिडी दी जाती है। लाखों करोड़ का कर्ज राइट ऑफ किया जाता है।  आप कभी भी गूगल पर किसान आत्महत्या टाइप करें, आपको हर दिन कई-कई खबरें मिलेंगी। क्या गरीब, मेहनतकश किसान के जान की कोई कीमत नहीं है?

(लेखक पत्रकार एंव कथाकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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