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विक्रम जोशी: पुलिस और अपराधियों की गठजोड़ से डूब गया पत्रकारिता का सितारा

शमशाद रज़ा अंसारी

जनपद पुलिस की नाकामयाबी में हमेशा के लिए उस समय एक काला अध्याय और जुड़ गया जब गोली लगने से घायल हुये पत्रकार ने बुधवार सुबह यशोदा अस्पताल में दम तोड़ दिया। पोस्टमार्टम के बाद बुधवार दोपहर दो बजे उनका शव हिंडन घाट पर पंचतत्व में विलीन कर दिया गया। इस दौरान सभी पत्रकारों ने साथी पत्रकार को नम आँखों से अंतिम विदाई दी। पत्रकार की हत्या से तमाम पत्रकार जगत में दुःख और गुस्सा पनप रहा है। पुलिस की लापरवाही से हुये इस हत्याकांड में सरकार ने पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का आश्वासन तो दिया है। लेकिन पत्रकारों के साथ भविष्य में इस तरह की वारदात रोकने के लिए कोई कदम नही उठाया है।

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विक्रम की हत्या से योगी सरकार द्वारा पत्रकारों की सुरक्षा के लिए किये जा रहे दावों की भी पोल खुल गयी है। पुलिस के आकंठ भ्र्ष्टाचार में डूबे होने के कारण अपराधियों और पुलिस में चोली दामन का साथ हो गया है। पुलिस पत्रकारों को गुंडे और अपराधियों को अपना पालनहार समझती है।

ज्ञात हो कि सोमवार की रात ग़ाज़ियाबाद के विजयनगर इलाक़े में पत्रकार विक्रम जोशी पर जानलेवा हमला किया गया था। सीसीटीवी फ़ुटेज में साफ़ दिख रहा है कि विक्रम जोशी बाइक पर अपनी दो पुत्रियों के साथ जा रहे हैं। तभी उन पर हमला करके उनकी बाइक को गिरा दिया जाता है। उसके बाद कई लोग विक्रम जोशी को पीट रहे हैं। इसी दौरान एक व्यक्ति उनके सिर में गोली मार देता है।

विक्रम जोशी ज़मीन पर गिर जाते हैं और उनके गिरते ही हमलावर भाग जाते हैं। उनकी पुत्री उनके पास खड़ी बदहवासी की हालत में चीख पुकार मचा रही है। विक्रम जोशी पर हमला उस समय हुआ, जब वे अपनी बहन के यहाँ से मोटरसाइकिल पर आ रहे थे। उनके साथ उनकी दो नाबालिग़ पुत्रियाँ भी थी। हमले के बाद विक्रम जोशी को ग़ाज़ियाबाद के यशोदा अस्पताल में भर्ती कराया गया था। लेकिन बुधवार सुबह करीब चार बजे डॉक्टर ने परिजनों को उनकी मौत की सूचना दी।

इस बारे में विक्रम जोशी के भांजे का बताया कि कुछ लड़के उनकी बहन को छेड़ते थे। मामा विक्रम जोशी ने चौकी तथा थाने में उन लोगों के ख़िलाफ़ तहरीर दी थी। लेकिन पुलिस ने कोई कार्यवाई नही की। उनके मामा विक्रम जोशी पर इन्हीं लोगों ने हमला किया है।

ग़ाजियाबाद के डीएम अजय शंकर पांडे ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विक्रम जोशी के परिवार को 10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता, पत्नी को सरकारी नौकरी तथा बच्चों को मुफ़्त शिक्षा की घोषणा की है। सरकारी वादे करके सरकार ने तो अपना काम कर दिया। लेकिन ये भरोसा किसी ने नहीं दिलाया कि ऐसी घटना फिर नहीं होगी। पुलिस में शिकायत करने पर फिर किसी विक्रम जोशी की जान नहीं जाएगी।

यदि पुलिस की लापरवाही की बात करें तो शिकायत के बाद भी कार्यवाई न करने पर केवल एक सप्ताह के भीतर दो जानें जा चुकी हैं। लोनी थाना क्षेत्र के निवाड़ी में हलवाई मोनू ने भी बदमाशों के विरुद्ध कुछ दिन पहले ही शिकायत की थी। लेकिन पुलिस की ढिलाई के चलते मोनू को अपनी जान गंवानी पड़ी। कुछ दिन बाद ही रक्षाबन्धन का पर्व आने वाला है। ऐसे में मोनू और विक्रम जोशी की बहन हाथ में राखी और आँखों में आँसू लेकर उस भाई की राह देखेंगी जो अब कभी लौट कर नही आएगा।

पत्रकारों में ग़म और गुस्सा

पत्रकार विक्रम जोशी के साथ हुई इस वारदात के बाद केवल जनपद ही नही, बल्कि जनपद के बाहर के पत्रकारों में भी ग़म और गुस्सा है। पत्रकारों का यह गुस्सा स्वभाविक भी है। पत्रकार अपनी जान पर खेल कर पत्रकारिता करता है। वह समाज में होने वाली बुराइयों को उजागर करता है। अपराधियों के विरुद्ध लिख कर उन्हें बेनक़ाब करता है। पत्रकार की इन खबरों से समाज में उसके दुश्मन बनते हैं। जिनकी शिकायत लेकर वह पुलिस के पास जाता है तो पुलिस पत्रकार का मुकदमा लिखने में लापरवाही दिखाती है। पुलिस उल्टा सदैव पत्रकार के विरुद्ध मुकदमा लिखने को आतुर रहती है और पत्रकार की तरफ से मुकदमा करने पर पुलिस को सौ क़ानून याद आजाते हैं। पुलिस के इस रवैये के कारण पत्रकारों में रोष है। क्योंकि किसी की हत्या के बाद शासन द्वारा मुआवज़े का ऐलान और चन्द पुलिसकर्मियों पर कार्यवाई करके मामले की इतिश्री कर दी जाती है। जबकि मुआवज़ा मिलने से किसी की ज़िन्दगी की कमी पूरी नही होती। विक्रम जोशी के परिजनों को मुआवज़ा मिल गया लेकिन उस मुआवज़े से न विक्रम की विधवा का सुहाग वापस आएगा, न बच्चों को उनका बाप वापस मिलेगा और न भाई बहनों को उनका भाई मिलेगा।

पुलिस की बात करें तो पुलिसकर्मी इस अकड़ में रहते हैं कि ज़्यादा से ज़्यादा तबादला/निलंबन ही तो हो जायेगा। स्थानांतरण/लाइन/निलंबन को तो पुलिसकर्मी नियति मान चुके हैं। कितनी भी बड़ी लापरवाही कर दो निलंबन से ज़्यादा कुछ नही होगा। जैसा इस मामले में हुआ। प्रताप विहार चौकी इंचार्ज को निलम्बित कर दिया गया। जो कार्यवाई एसएसपी स्तर पर होनी चाहिए थी वह चौकी स्तर पर ही होकर रह गयी। ऊँट के मुँह में जीरा सरीखी इस कार्यवाई से पुलिस की कार्यशैली में कोई सुधार आने की गुंजाइश नही है। इसलिये सरकार को ऐसे ठोस कदम उठाने चाहियें जिससे भविष्य में किसी विक्रम जोशी के साथ इस तरह की कोई वारदात न हो।

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